Home Entertainment रावण तो मरा, लेकिन भीतर का रावण कब मरेगा?

रावण तो मरा, लेकिन भीतर का रावण कब मरेगा?

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सिलीगुड़ी तथा आसपास के क्षेत्रों में चलाए जा रहे मसाज सेंटर की चर्चा आए दिन होती रहती है| चर्चा मसाज सेंटर की खूबियों के कारण नहीं बल्कि मसाज सेंटर के भीतर चल रहे गोरखधंधे और दूसरे अप्राकृतिक कार्यों के कारण होते रहते हैं| पिछले 1 महीने में सिलीगुड़ी और माटीगाड़ा के कई मसाज सेंटर सुर्खियों में आ चुके हैं| पुलिस ने इन मसाज सेंटरों पर रेड डाल कर कई ऐसे तत्वों को धर दबोचा है, जो मसाज के नाम पर ग्राहकों को भटकाने का काम कर रहे थे| शुक्रवार ठीक दशहरे के दिन सिलीगुड़ी पुलिस ने माटीगाड़ा के दो मसाज सेंटरों पर छापा मारा और सील कर दिया| पुलिस ने दावा किया है कि लाइसेंस तो मसाज सेंटर के नाम पर है लेकिन यहां मसाज नहीं बल्कि इसकी आड़ में देह व्यापार होता है| अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि पुलिस ने किन कारणों से मसाज सेंटर के मालिकों को तलब नहीं किया है| यह ठीक है कि जब हम किसी कार्य के लिए लाइसेंस लेते हैं तो उसमें कुछ शर्तें भी होती है और उन शर्तों के आलोक में ही जब हम उस पर सहमति जताते हैं तभी हमें उस कार्य के लिए लाइसेंस मिलता है, लेकिन कभी-कभी व्यापारी अधिक से अधिक कमाई करने के लिए उसकी आड़ में अपना धंधा चलाने लगते हैं, जिसके लिए वे अधिकृत नहीं होते| ऐसे में पुलिस का छापा और मसाज सेंटर का सील होना काफी महंगा पड़ जाता है| शहरी क्षेत्रों में मसाज सेंटर खोलने के लिए नगर निगम की कुछ शर्ते होती है जिनका हमें पालन करना पड़ता है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में मसाज सेंटर खोलने पर वहां की नगर पालिका अथवा पंचायत की अनुमति लेनी पड़ती है|  साथ ही कारोबार से जुड़े नियम और शर्तों का पालन भी करना पड़ता है| अब यह देखना होगा कि एक मसाज सेंटर जो शहर में चलाया जा रहा है और एक दूसरा मसाज सेंटर जो ग्रामीण क्षेत्रों में चलाया जाता है, दोनों के प्रावधान क्या एक जैसे हैं? या उनमें असमानता होती है| यह देखना कानून का काम है, लेकिन अगर नैतिक रूप से हम इस पूरे मामले को देखें, तो कई सवाल उठ खड़े होते हैं| सबसे बड़ी बात हमारी नैतिकता की है| हमारा समाज कहां जा रहा है, यह देखने वाला कोई नहीं है| बस लोगों को मुनाफा चाहिए, दौलत चाहिए, भले ही हमारी आने वाली पीढ़ी इसका परिणाम भुगतने के लिए तैयार हों, लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता| वर्तमान समाज भौतिकता की अंधी चादर में लिपट गया है| इस को जगाने के लिए विवेक व अपनी शक्तियों की जरूरत है| एक दशहरे पर रावण को मारा जा चुका है, लेकिन वही एक रावण आज भी हमारे भीतर मौजूद है| आवश्यकता तो इस बात की है कि हम अपने भीतर के रावण को मारे, तभी हमारे समाज में एक संतुलन, सार्वभौमिकता और संपूर्णता स्थापित हो सकेगा|

 

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