Home India शुरू हुआ श्राद्ध, तिथि के अनुसार करें पितरों का श्राद्ध

शुरू हुआ श्राद्ध, तिथि के अनुसार करें पितरों का श्राद्ध

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आज से श्राद्ध शुरू हो रहा है. इसको पितृ पक्ष के नाम से भी जाना जाता है. जिन व्यक्तियों के स्वजन स्वर्ग सिधार गए हैं, उनकी आत्मा की प्रसन्नता के लिए परिवार के व्यक्ति श्राद्ध करते हैं. वास्तव में श्राद्ध अपने पितरों के प्रति श्रद्धा पूर्वक किया गया तर्पण है, जिससे हमारे पितर खुश हो जाते हैं. प्राचीन काल से ही यह परंपरा चली आ रही है. हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि मृत्यु के बाद मनुष्य की आत्मा भटकती है. समय-समय पर मृतक या मृत आत्मा स्वजनों के घर पहुंचकर उनका हालचाल जानती है. साल में 15 दिन भद्रमास पूर्णिमा से क्वार अमावस्या तक पितृपक्ष रहता है. इस समय यमराज जीवात्मा को मुक्त कर देते हैं और अपने स्वजनों के यहां जाने की अनुमति प्रदान कर देते हैं. शास्त्रों में बताया गया है कि जीव सूक्ष्म रूप धारण करके श्राद्ध के समय अपने स्व जनों के घर पहुंचते हैं तथा उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते हैं. इस समय पितरों के प्रति श्रद्धा तर्पण करना आवश्यक होता है. जो लोग इस समय अपने पितरों को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं तथा श्रद्धापूर्वक उनका तर्पण करते हैं, पितर देखकर प्रसन्न हो जाते हैं और उन्हें अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं. वही घर फलता-फूलता है जिस घर में पितरों के प्रति श्रद्धापूर्वक अनुष्ठान किया जाता है. आज से श्राद्ध शुरू हो रहा है जो 8 अक्टूबर तक रहेगा. उसी दिन महालया है. महालया के दिन ही पितरों को

तर्पण व श्राद्ध किया जाता है. वास्तु शास्त्र की पुस्तकों में बताया गया है कि जिस व्यक्ति का स्वर्गवास जिस तिथि को होता है ,पितृपक्ष के दौरान उसी तिथि को उनका तर्पण करना चाहिए क्योंकि ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष के दिन ही हमारे पूर्वज पृथ्वी पर सूक्ष्म रूप में आते हैं और अपने परिजनों के तर्पण को स्वीकार करते हैं. जिन लोगों को अपने पितरों की श्राद्ध तिथि याद नहीं हो, ऐसे लोगों को महाल्या के दिन अपने पितरों का तर्पण करना चाहिए. जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को करना चाहिए. शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि पिता का श्राद्ध अष्टमी को और माता का श्राद्ध नवमी तिथि को करना चाहिए. हमारे शास्त्रों में पंडितों व आचार्यों ने जीवन जीने की कला सिखाई है. पृथ्वी पर रहने वाले सभी व्यक्तियों को चाहिए कि वे अपनी परंपरा, बड़े बुजुर्गों की बात तथा संस्कृति के अनुसार आचरण करें और पितरों का तर्पण उचित समय पर ही करें. अगर पितर खुश होंगे तो वे अपना आशीर्वाद प्रदान करेंगे और आपका कारोबार फल फूल सकेगा.