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गरीबों की सुनो….

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Tea garden workers pluck tea leaves at a tea garden estate in Poteya village, about 75 km from Siliguri April 26, 2006. REUTERS/Rupak De Chowdhuri/Files

आमतौर पर गरीबों की कोई नहीं सुनता .बहुत पहले पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर ने कहा था कि गरीबी एक अभिशाप है .उन्होंने बहुत सही बात कही थी .हालांकि इस सच को कहने का साहस बहुत कम लोगों में देखा जाता है. यह बिल्कुल सच है कि गरीब व्यक्तियों की कोई नहीं सुनता. हम बात कर रहे हैं उत्तर बंगाल के चाय बागानों में काम करने वाले गरीब श्रमिकों की, जो आज भी ₹150 से लेकर 174 रुपए दिहाड़ी मजदूरी पर काम कर रहे हैं. इनके हक  में आवाज उठाने वाले अनेक संगठनों ने वेतन वृद्धि अथवा दिहाड़ी मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर कई बार चाय बागान प्रबंधन व सरकार से मांग की और इस तरह पिछले 2 महीने से बैठके  चलती रही हैं .जब- जब बैठक होती है चाय श्रमिकों का विश्वास बढ़  जाता है, उनकी उम्मीद बढ़ जाती है. उनकी आंखों की रोशनी बढ़ जाती है कि इस बार बैठक का नतीजा उन के हक में होगा लेकिन ऐसा होता नहीं है. सरकार के साथ ,चाय प्रबंधन के साथ, अगस्त महीने में या इससे पहले जुलाई महीने में कई दौर की बैठक हुई ,लेकिन नतीजा नहीं निकला. ऐसा लग रहा है कि चाय श्रमिकों की गरीबी का मजाक उड़ाया जा रहा है. ना तो सरकार और ना ही श्रमिक संगठन समस्या का निदान करने के लिए तत्पर दिख रहे हैं. इस महीने एक बार फिर से 20 अगस्त को कोलकाता में चाय श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी निर्धारण करने को लेकर एक बैठक होने वाली है. इसमें राज्य के श्रम मंत्री मलय घटक भी शामिल होंगे .वह कुछ ट्रेड यूनियन संगठनों के साथ बैठक करेंगे. उन्होंने हालांकि कहा है कि अगर किन्ही कारणों से यह बैठक स्थगित हो जाती है अथवा बैठक में कोई नतीजा नहीं निकलता है तो सितंबर महीने से चाय श्रमिकों की मजदूरी ₹10 बढ़ा दी जाएगी. देखा जाए तो जॉइंट फोरम भी चाय श्रमिकों की बदहाली के लिए जिम्मेवार है. ज्इंट फोरम  की मांग बागान प्रबंधन मांगने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है. क्योंकि फोरम के हिसाब से अगर मजदूरी बढाई जाती है तो बागान मालिक या प्रबंधक उसे झेल नहीं सकते. ऐसे में बागान बंद करना भी पड़ सकता है. यह चाय श्रमिकों के लिए और भी खतरनाक बात होगी. सरकार वोट बैंक की नीति पर चल रही है. ट्रेड  यूनियनों को नाखुश भी करना नहीं चाहती और ना ही चाय श्रमिकों का भला करना चाहती है. सरकार चाहती है कि कोई बीच का रास्ता निकले ताकि बागान प्रबंधक और चाय श्रमिक दोनों के लिए अच्छा हो. जुलाई महीने में न्यूनतम मजदूरी को लेकर सिलीगुड़ी में कई बैठक हुई थी. एक बैठक में चाय श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी 172 रुपए करने के प्रस्ताव को जॉइंट फोरम ने ठुकरा दिया था. इसके बाद फिर से चाय श्रमिकों ने हड़ताल व धरना प्रदर्शन का सिलसिला शुरु कर दिया. पिछली सारी घटनाओं को देखते हुए राज्य के श्रम मंत्री मलय घटक ने निश्चय कर लिया है कि आगामी 20 अगस्त को होने वाली बैठक में चुनिंदा ट्रेड यूनियनों को ही अथवा उनके नेताओं को शामिल किया जाएगा ताकि बैठक से कोई नतीजा सामने आ सके अगर ऐसा नहीं होता है तो सरकार भी इस मामले को वही खत्म कर देना चाहती है तभी तो श्रम मंत्री ने कहा है कि अगर 20 अगस्त को होने वाली बैठक में कोई नतीजा नहीं निकला तो सितंबर महीने से चाय श्रमिकों को ₹10 रूपए बढ़ा कर  मजदूरी दी जाएगी इस पूरे प्रकरण पर वही किस्सा निगाहों के सामने आता है कि गरीबों की सुनो लेकिन गरीबों की सुनने वाला कौन है?

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