आईपैक पर इडी का रेड आजकल सुर्खियों में है. आईपैक के ऑफिस तथा इसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के घर व अन्य ठिकानों पर इडी के रेड ने राजनीति में तूफान खड़ा कर दिया है. यह इसलिए कि आईपैक वर्तमान में टीएमसी के लिए चुनाव मैनेजमेंट देख रहा है. ऐसे में स्वाभाविक है कि आईपैक पर रेड हो और टीएमसी चुपचाप तमाशा देखती रह जाए, ऐसा कैसे संभव हो सकता है!
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का आईपैक के ऑफिस पर पहुंचना, ऑफिस से कुछ फाइलें ले जाना, इडी की कार्रवाई के खिलाफ कोलकाता और दिल्ली में टीएमसी का संग्राम, केंद्र और भाजपा को निशाना बनाया जाना, टीएमसी और इडी के बीच आरोप प्रत्यारोप, मुकदमा, हाई कोर्ट इत्यादि बहुत कुछ इस बात के संकेत दे रहे हैं कि आने वाले चुनाव तक बीजेपी और टीएमसी के बीच भिड़ंत का घमासान तेज हो जाएगा.
कोलकाता हाई कोर्ट में 14 जनवरी को मामले की सुनवाई होगी. लेकिन उससे पहले आईपैक का एक बयान सुर्खियों में है. राजनीतिक विश्लेषक और आलोचक मानते हैं कि आईपैक का यह बयान आगामी बंगाल विधानसभा चुनाव की तस्वीर बदल सकता है. उनका मानना है कि जो है वह नहीं है और जो नहीं है वही है. यह राजनीतिक दलों का खेल भी बिगाड़ सकता है. खासकर भाजपा का जो यह मानती है कि वह बंगाल की सत्ता के करीब पहुंच गई है.
कोर्ट की कार्रवाई में आईपैक का यह बयान सबूत के तौर पर भी रखा जा सकता है. आईपैक ने खुद को निर्दोष और इडी के छापे अथवा उठ रहे सवालों को दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक बताया है. दरअसल आईपैक को टीएमसी से जोड़कर देखा जा रहा है. सोशल मीडिया में आरोप लगाया जा रहा है कि आईपैक के डायरेक्टर प्रतीक जैन की टीएमसी से गुप्त सांठगांठ है.कंपनी टीएमसी के गोपनीय दस्तावेज और भ्रष्टाचार के मामलों में टीएमसी को बेदाग और निर्दोष साबित करने की रणनीति बनाती है.
कंपनी पर आरोप और सवाल उठने लगे तो ऐसे में कंपनी की ओर से स्पष्टीकरण जारी किया गया है. आईपैक का पूरा नाम इंडियन पॉलीटिकल एक्शन कमेटी है. यह कमेटी विभिन्न राजनीतिक दलों को महत्वपूर्ण सलाह दिया करती है. कंपनी की ओर से कहा गया है कि कमेटी ने भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और शिवसेना समेत अलग-अलग विचारधारा वाले दलों के साथ पेशेवर सलाहकार के रूप में काम किया है. बयान में कहा गया है कि हम चुनाव नहीं लड़ते और न ही कोई राजनीतिक पद धारण करते हैं. हमारी भूमिका पारदर्शी और पेशेवर राजनीतिक सलाह तक ही सीमित है.
दरअसल इस तरह का बयान देकर आईपैक यह बताना चाहता है कि कंपनी को सिर्फ टीएमसी से ही जोड़कर क्यों देखा जा रहा है. उनके लिए पार्टी नहीं, बल्कि आईपैक का सिद्धांत और ईमानदारी महत्वपूर्ण है. कंपनी के आगे के बयानों में यह स्पष्ट किया गया है. बयान में आगे कहा गया है कि हमने अपने सभी कामों में हमेशा ईमानदारी के उच्च स्तरीय मानकों को बनाए रखा है. हम पेशेवर लोग हैं. हम पूरी ईमानदारी से काम करते हैं और आगे भी बिना किसी डर और परेशानी के काम करते रहेंगे. यह हमारी जवाब देही भी है. हम अपने उद्देश्य के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं.
ऑफिस पर इडी की छापेमारी को लेकर आईपैक ने गंभीर चिंता व्यक्त की है और कहा है कि जब इडी दफ्तर में रेड डाल रही थी तो आईपैक ने उनका पूरा सहयोग किया. हालांकि आईपैक जैसे प्रोफेशनल संगठन के दफ्तर पर इडी की कार्रवाई का वक्त बेहद मुश्किल और दुर्भाग्यपूर्ण था. हमारा मानना है कि ऐसे संगठनों पर इस तरह की छापे की कार्रवाई एक चिंताजनक परंपरा कायम करती है. फिर भी हमारे लोगों ने उन्हें पूरा सहयोग दिया. अगर उन्हें हमारी आवश्यकता होगी तो हम आगे भी उनका सहयोग जारी रखेंगे. क्योंकि हम कानून में विश्वास करते हैं और जांच एजेंसी के अधिकारियों का सम्मान करते हैं.
आईपैक के इस बयान पर इडी का यह कहना कि उनकी जांच निजी कंपनी के वित्तीय लेनदेन पर केंद्रित है, ना कि सीधे आईपैक पर. इडी ने कहा है कि कंपनी का पेन और जीएसटी रजिस्ट्रेशन कई राज्यों में है, जिससे उसके कारोबारी नेटवर्क की पड़ताल की जा रही है. यानी इडी का साफ कहना है कि उसने आईपैक से जुड़ी इंडियन पैक कंसलटिंग प्राइवेट लिमिटेड पर छापे की कार्रवाई की है. इडी ने दावा किया है कि जिस कंपनी पर रेड डाला गया, उस कंपनी के गोवा, आंध्र प्रदेश, बंगाल, बिहार, मेघालय, दिल्ली और त्रिपुरा में जीएसटी के तहत अलग-अलग नंबर हैं. यानी यह ऐसी निजी लिमिटेड कंपनी है, जिसका कारोबारी नेटवर्क कई राज्यों में फैला हुआ है और उसी से जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच के तहत इडी ने कार्रवाई की है.
बहरहाल देखना होगा कि आईपैक के बयान और इडी के रिकॉर्ड के बाद भाजपा और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं की क्या प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं. खासकर ऐसे दल जिनके साथ आईपैक ने काम किया है. यह भी देखना होगा कि कोर्ट आईपैक और इडी के बयानों में किसका बयान महत्वपूर्ण मानता है और सबसे अहम सवाल यह भी है कि क्या आईपैक के स्पष्टीकरण और इडी के रिकॉर्ड के बाद बंगाल के राजनीतिक गलियारों में उठा तूफान शांत पड़ जाएगा?
