आगामी विधानसभा चुनाव में सिलीगुड़ी विधानसभा सीट पर किसका कब्जा होगा, यह चर्चा शुरू हो गई है. क्या शंकर घोष अपनी सीट बचा पाएंगे या टीएमसी का कब्जा होगा या फिर कांग्रेस या वाम दल के खाते में यह सीट जाएगी? इसे लेकर अनिश्चितता बरकरार है.
अगले कुछ दिनों में इस सीट पर उतारे जाने वाले उम्मीदवारों तथा उनके राजनीतिक दलों की रणनीति महत्वपूर्ण साबित होने वाली है. पूर्वी हिमालय की तलहटी और महानंदा नदी के किनारे बसा यह शहर उत्तर पूर्व भारत का प्रवेश द्वार माना जाता है. नेपाल, भूटान और बांग्लादेश की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के करीब होने के कारण सिलीगुड़ी को विशेष आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान मिली है.
अंग्रेजी काल में इसे एक बड़े ट्रांसपोर्ट हब के रूप में विकसित किया गया था.1881 में शुरू हुई दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे और प्रमुख रेलवे जंक्शन बनने से इस शहर की कनेक्टिविटी और महत्व तेजी से बढा. 1951 से सिलीगुड़ी विधानसभा सीट दार्जिलिंग लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है. इसमें सिलीगुड़ी नगर निगम के 47 वार्ड शामिल हैं.
सिलीगुड़ी का राजनीतिक इतिहास बहुदलीय प्रतिस्पर्धा का रहा है. यहां हमेशा जनादेश बदला है. 1977 से 2006 तक सिलीगुड़ी विधानसभा सीट पर CPIM ने कम से कम आठ बार जीत दर्ज की है. तब राज्य में माकपा की सरकार थी. इस विधानसभा सीट पर कांग्रेस ने चार बार जीत दर्ज की है. अखिल भारतीय गोरखा लीग, तृणमूल कांग्रेस और भाजपा ने एक-एक बार जीत दर्ज की है.
अशोक भट्टाचार्य ने 1991 से 2006 तक लगातार चार बार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. लेकिन 2011 में टीएमसी ने पहली बार CPIM को हराकर यह सीट जीती. 2016 के चुनाव में सीपीएम ने टीएमसी को हराया. जबकि 2021 के चुनाव में बीजेपी ने टीएमसी को हराया. पिछले चुनाव में भाजपा की लहर थी. जिसके वजह से यहां से भाजपा ने जीत दर्ज की. शहरी क्षेत्र में भाजपा की स्थिति मजबूत जरूर है, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा कमजोर है. जबकि टीएमसी मजबूत स्थिति में है.
अगर संगठन की बात करें तो टीएमसी का संगठन मजबूत है. भाजपा केवल शहरी क्षेत्र में ही अपने संगठन का विस्तार और मजबूती दे पायी है. एक तरफ भाजपा को ग्रामीण क्षेत्रों में पकड़ बनाने की चुनौती है तो दूसरी तरफ टीएमसी के लिए शहरी क्षेत्र के मतदाताओं पर अपनी पकड़ बनाना एक बड़ी चुनौती है. कांग्रेस भी यहां से अपना उम्मीदवार उतारेगी. कांग्रेस की स्थिति यहां काफी कमजोर है. लेकिन कांग्रेस का उम्मीदवार कौन होगा, इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है.
जहां तक सीपीएम से उम्मीदवार उतारने की बात है तो अशोक भट्टाचार्य सिलीगुड़ी का लोकप्रिय चेहरा रहे हैं, लेकिन वह चुनाव नहीं लड़ेंगे. ऐसे में CPIM जो पहले से ही काफी कमजोर रही है, पार्टी का कोई भी चेहरा हो, उसे यहां से पकड़ बनाना काफी कठिन है. दो दलों के बीच मुख्य लड़ाई दिख रही है. टीएमसी या बीजेपी. दोनों ही दलों में से यह सिलीगुड़ी सीट किसके खाते में जाएगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि भाजपा और टीएमसी की तैयारी कैसी है और उनके उम्मीदवार सिलीगुड़ी के मतदाताओं पर कितना असर डालते हैं.
लेकिन सिलीगुड़ी विधानसभा सीट के इतिहास का अवलोकन करने पर स्पष्ट हो जाता है कि यह विधानसभा सीट किसी एक दल के कब्जे में कभी नहीं रही. सीपीएम के जमाने की बात कुछ और थी. वर्तमान में सब कुछ हाईटेक हो गया है.मतदाता भी जागरूक हैं और SIR के बाद नेता चुनने के लिए नए और पुराने मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेंगे. संगठन और विस्तार के मामले में भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे का अंतर है. इसलिए इस सीट पर दोनों दलों के द्वारा उतारे जाने वाले उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि पर निर्भर करता है कि यह सीट किसके खाते में जाती है.
