सिलीगुड़ी के प्रणामी मंदिर रोड में उस समय हड़कंप मच गया, जब एक संस्था के लोगों ने एक हिंदी भाषी लड़के को पीटने की कोशिश की और उसे हाथ भी लगाया. संस्था के लोग लड़के पर गाली गलौज का आरोप लगा रहे थे. जबकि लड़का इस बात से इनकार कर रहा था. कौन सही है और कौन गलत है, इसका फैसला कानून और पुलिस जांच के बाद करती है. फिर इन्हें कानून को हाथ में लेने का अधिकार किसने दिया?
देखिए वीडियो और आप स्वयं फैसला करिए. यह एक बानगी है. जबकि बंगाल में इनकी दादागिरी और करतूत की कहानी देखनी हो तो सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर जाइए. हिंदीभाषियों को परेशान करने से लेकर उन्हें बंगाल तक छोड़ने की धमकी और उनके साथ मारपीट इनके आए दिन के किस्से बन गए हैं. लेकिन फिर भी सरकार खामोश है और पुलिस प्रशासन मूक दर्शक बना हुआ है.
पहले तो उनका अत्याचार दक्षिण बंगाल और खासकर कोलकाता, हुगली, उत्तर 24 परगना आदि जिलों में ज्यादा था. अब इस संस्था के लोग उत्तर बंगाल के विभिन्न जिलों में भी सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में सवाल यह है कि क्या प्रशासन, पुलिस और सरकार ने उन्हें खुली छूट दे रखी है?
सिलीगुड़ी एक ऐसा शहर है जहां सभी धर्म और जातियों के लोग निवास करते हैं. यहां विभिन्न प्रांतो से आए लोग भी बसे हैं जो अपनी संस्कृति और परंपरा के बीच सिलीगुड़ी की एकता और समर्पण के प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं. सिलीगुड़ी के विकास में इनका भारी योगदान है. वह चाहे बिहारी, मारवाड़ी, नेपाली और दूसरे हिंदी भाषी हैं, उन्होंने अपने अपने स्तर पर सिलीगुड़ी के विकास से लेकर उसकी सांस्कृतिक पहचान में भरसक योगदान दिया है.
सिलीगुड़ी उन लोगों के लिए भी एक प्रेरणा है, जहां कोई भी त्यौहार हो, सभी जाति एवं धर्म के लोग मिलजुल कर मनाते हैं. चाहे दशहरा हो, ईद हो या दीपावली, होली का त्यौहार, सभी धूमधाम और आनंद के बीच में मनाते हैं. यहां रहने वाले प्रवासी कभी यह महसूस नहीं करते कि वे बाहर से आए हैं. बंगाल की संस्कृति की अपनी विशेषता है, जो सभी को आसानी से आत्मसात कर लेती है. लेकिन इसी बंगाल की धरती पर कुछ ऐसे कट्टरवादी संगठन या संस्थाएं हैं जो लोगों के दिलों को बांटना चाहती हैं. ये जानबूझकर हिंदी भाषिओं को हाशिए पर रखना चाहती है.
पिछले कुछ महीनो से बंगाल में एक संस्था यहां जहर की खेती कर रही है और बंगाल की सांस्कृतिक एकता को नष्ट कर रही है. इस संस्था के द्वारा हिंदीभाषियों को टारगेट किया जा रहा है और उन्हें परेशान किया जा रहा है. उत्तर बंगाल से लेकर दक्षिण बंगाल तक उक्त संस्था के कारनामों से सभी परिचित होंगे. सोशल मीडिया पर तो आए दिन उनके वीडियो आते रहते हैं.
यह समाज में नफरत और भाई-भाई के बीच अलगाव उत्पन्न करता है. इससे सामाजिक एकता खतरे में पड़ जाती है. आश्चर्य की बात तो यह है कि प्रशासन और सरकार को भी इनके कारनामों और दादागिरी के बारे में पता रहता है. लेकिन फिर भी उनका खामोश रहना कई तरह के सवाल उत्पन्न करता है.
एक तरफ सरकार बड़ी-बड़ी बातें करती है. हिंदी भाषियों और गैर हिंदी भाषियों की एकता और उनके विकास की बड़ी-बड़ी बातें करती है. लेकिन जब संस्था के द्वारा उन्हें बांटने की कोशिश की जाती है तब ना तो पुलिस और ना ही सरकार के द्वारा उनके खिलाफ कार्रवाई की जाती है. जिस तरह से संस्था के लोगों का मनोबल बढ़ता जा रहा है, ऐसे में कानून एवं व्यवस्था की स्थिति खराब हो सकती है. इसके लिए अगर कोई दोषी होगा तो पुलिस प्रशासन और सरकार.
पुलिस प्रशासन नागरिकों की सुरक्षा और उनके हितों का ख्याल रखने के लिए सभी तरह के उपाय और व्यवस्था करता है. अगर किसी पर अत्याचार हो रहा हो तो पुलिस का काम अत्याचारियों को गिरफ्तार करना और कानून का पालन करवाना है. लेकिन देखा जाता है कि ऐसे मामलों में पुलिस कोई कार्रवाई नहीं करती. सभी राजनीतिक दलों को इस पर चिंतन करना चाहिए और वोट बैंक से ऊपर उठकर बंगाल की संस्कृति और सद्भाव को नष्ट होने से बचाने का प्रयास करना चाहिए. यही बंगाल और बंगाल की संस्कृति की पहचान है.
