February 25, 2026
Sevoke Road, Siliguri
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गौतम देव और अशोक भट्टाचार्य ने दी राजनीति की मिसाल!

सिलीगुड़ी में किसी समय अशोक भट्टाचार्य का डंका बजता था. अशोक भट्टाचार्य जब तक राजनीति में सक्रिय रहे, तब तक वाम मोर्चा का सिलीगुड़ी में खूब दबदबा रहा. सिलीगुड़ी नगर निगम अशोक भट्टाचार्य के नाम रही. अब समय बदल गया है. समय के साथ व्यक्ति और व्यक्ति का रुतबा बदल जाता है. कल जो रुतबा वाम मोर्चा शासित बोर्ड में अशोक भट्टाचार्य का था, आज वही रुतबा गौतम देव का सिलीगुड़ी नगर निगम में है.

कहने के लिए तो सिलीगुड़ी के दोनों ही वरिष्ठ नेता दो अलग-अलग दलों से आते हैं. धुर विरोधी हैं. जब भी मौका मिलता है, दोनों नेता एक दूसरे पर आक्रामक राजनीति भी करते हैं. लेकिन उनकी राजनीति में मर्यादा और लोकतंत्र की जीवंतता उजागर होती है. एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान और नपे तुले शब्दों में शालीनता और सहजता भी दिख जाती है. दोनों ही नेता परिपक्व हैं और राजनीति को करीब से समझते हैं.

सोशल मीडिया पर सिलीगुड़ी के तीन वरिष्ठ नेताओं और मेयर का दीप प्रज्वलन के दौरान की तस्वीर और वीडियो खूब वायरल हो रहा है. इसमें सर्वप्रथम गौतम देव दीप प्रज्वलन करते हैं. बगल में अशोक भट्टाचार्य खड़े रहते हैं. गौतम देव तुरंत ही अशोक भट्टाचार्य को हाथ से खींचकर सामने लाते हैं और मोमबत्ती पकड़ा देते हैं. वही मोमबत्ती तीसरी नेता (मेयर) को भी पकड़ा देते हैं. यह दृश्य कुछ ऐसा है कि विरोधी भी एक बार सकते में आ जाते हैं. दिल को छू लेने वाला यह मंजर खूब वाहवाही बटोर रहा है.

यह मंजर बहुत कुछ कहता है. यह मंजर उन राजनेताओं को सबक देता है जो राजनीति में धुर विरोधियों को उनकी औकात दिखाते हैं. और एक दूसरे के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हैं. राजनीति में मर्यादा और शालीनता जीवंत रहनी चाहिए. गौतम देव अशोक भट्टाचार्य आदि वरिष्ठ नेता हमेशा शालीन राजनीति के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने यह साबित करके दिखाया है.

अलग-अलग मंचों पर एक दूसरे दल के खिलाफ वक्तव्य देते रहते हैं. परंतु व्यक्तिगत रूप से दोनों एक दूसरे का काफी सम्मान करते हैं. गौतम देव खुद अपने से वरिष्ठ नेता अशोक भट्टाचार्य का काफी सम्मान करते हैं. यह कोई पहला अवसर नहीं है. इससे पहले भी उन्होंने एक दूसरे का सम्मान किया है और मंच भी साथ-साथ शेयर किया है. यह लोकतंत्र की खूबसूरती है और राजनीति की अनुकरणीय मिसाल है.

उनके मिलन को देखकर ठहाके भी खूब लगते हैं. कहीं से भी कुछ बनावटी नहीं है. राजनीति में हम एक दूसरे के विरोधी हो सकते हैं. लेकिन निजी जिंदगी में हम सब एक हैं और एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान होना चाहिए. देश में ऐसे नेताओं की भी कोई कमी नहीं है.जैसे अटल बिहारी वाजपेई और पंडित जवाहरलाल नेहरू के बीच मित्रता थी. दोनों अलग-अलग दलों के नेता थे. राजनीति में एक दूसरे के धुर विरोधी थे. लेकिन व्यक्तिगत जिंदगी में वे दूसरे का सम्मान करते थे.

लेकिन आज राजनीति की परिभाषा बदल गई है. अलग-अलग दल की राजनीति करने का मतलब राजनेता एक दूसरे को दुश्मन भी मान बैठते हैं. ऐसे नेताओं को गौतम देव और अशोक भट्टाचार्य से सीख लेने की जरूरत है कि राजनीति कैसे की जाती है.

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