जरा सोचिए! आप अपना प्रतिनिधि 5 साल के लिए चुनते हैं. लेकिन प्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद जनता का काम ही नहीं करता तो जनता क्या करे? यह एक ज्वलंत सवाल है. आप किसी को कोई कार्य सौंप देते हैं.लेकिन वह व्यक्ति उस कार्य को करता ही नहीं तो क्या आप उसे और झेलने के लिए तैयार हैं? आपका जवाब होगा बिल्कुल नहीं. आप फौरन ऐसे व्यक्ति को कार्य से क्यों नहीं हटाएं? क्या आप ऐसा नहीं सोचते कि इस तरह का हमारे देश में कानून होना चाहिए जो नेता या प्रतिनिधि को जिम्मेदार बनाए.
जब हम लोकतंत्र में चुनाव के जरिए प्रतिनिधि के रूप में अपना नेता चुनते हैं तो प्रतिनिधि से हमारी कुछ अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं.अगर हमारा प्रतिनिधि हमारा कोई काम नहीं करता तो जाहिर है कि आप भी ऐसे प्रतिनिधि से मुक्ति चाहेंगे. लेकिन हमारे संविधान और लोकतंत्र में प्रतिनिधि को 5 साल के लिए समय दिया जाता है. अगर 5 साल में वह जनता से किया अपना वादा पूरा नहीं करता तो जनता ऐसे प्रतिनिधि को चुनाव में दोबारा मौका नहीं देती है.
लेकिन रॉकेट की गति से यह दुनिया भाग रही है. 5 साल बहुत होते हैं.लोग चाहते हैं कि प्रतिनिधि को इतना समय नहीं दिया जाना चाहिए. चुनाव जीते प्रतिनिधि से उम्मीद की जाती है कि वह एक जिम्मेदार नेता के तौर पर जनता के काम आए. लेकिन वह ऐसा नहीं करता है. ऐसे प्रतिनिधि को 5 साल तक झेलना कभी-कभी काफी कठिन हो जाता है. क्या हमारे देश में ऐसा कानून नहीं होना चाहिए कि ऐसे नेता या प्रतिनिधि को उसका कार्यकाल पूरा होने से पहले ही हटाया जाए? इसका एक ही जवाब है राइट टू रिकॉल. कोई नेता या प्रतिनिधि जनता का काम नहीं करता है तो जनता 5 साल का इंतजार किए बगैर अपने प्रतिनिधि को तत्काल क्यों नहीं हटा दे!
सदन में राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने एक बड़ा ही अच्छा सवाल उठाया है. यह सवाल जनता के मन का है और जनता राघव चड्ढा के सवाल को पसंद भी करती है. आखिर जिस नेता को जनता चुनती है तो वह चाहती है कि प्रतिनिध उसका काम भी करे. लेकिन प्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद क्षेत्र में नजर ही नहीं आता है. तो ऐसे में जनता को यह लोकतांत्रिक और संवैधानिक शक्ति देनी चाहिए कि वह प्रतिनिधि का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही वोट प्रक्रिया के तहत उसे वापस बुला ले. इसी को राइट टू रिकॉल प्रक्रिया कहते हैं. हमारे देश में यह कानून बनना चाहिए. इसी पर बहस चल रही है.
राघव चड्ढा ने बहुत ठीक कहा है कि हमारे लोकतंत्र और संविधान में राष्ट्रपति, जज जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ महा अभियोग लगाकर उसे पद से हटाया जा सकता है. तो ऐसे में 5 साल के लिए चुने जाने वाले प्रतिनिधि को राइट टू रिकॉल कानून के तहत क्यों नहीं हटा दिया जाए? हमारे देश में यह कानून होना ही चाहिए. जैसे अमेरिका तथा दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों में यह कानून है. वर्तमान में दुनिया के लगभग दो दर्जन लोकतांत्रिक देशों में यह कानून है.
जबकि भारत तो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है. ऐसे में वक्त का तकाजा है कि हमारे यहां भी राइट टू रिकॉल एक्ट होना चाहिए ताकि जिस नेता या प्रतिनिधि को हम 5 साल के लिए चुनते हैं अगर वह उचित परफॉर्म नहीं करता है तो उसे समय से पहले ही हटा दिया जाना चाहिए. इसके लिए वोटिंग प्रक्रिया होनी चाहिए. साथ ही चुनाव जीतने के बाद प्रतिनिधि को कम से कम डेढ़ साल का वक्त दिया जाना चाहिए. अगर वह काम नहीं करता है तो जनता अपने प्रतिनिधि को बदल सकती है. इसके लिए सुझाव दिया गया है कि प्रतिनिधि के खिलाफ वोटिंग प्रक्रिया हो और कम से कम 50% से ऊपर वोट उसके खिलाफ जाए तो ऐसे नेता या प्रतिनिधि को हटाया जाना चाहिए.
इसमें यह भी देखा जाना चाहिए कि रंजिश अथवा अन्य व्यक्तिगत कारणों से नेता या प्रतिनिधि को नहीं हटाया जाए. इस कानून के बारे में सभी राजनीतिक दलों को विचार मंथन करना चाहिए. काफी समय से राइट टू रिकॉल कानून की चर्चा चल रही है. इस पर सदन में बहस होनी चाहिए और सरकार को इस कानून के सभी पहलुओं पर विचार करना चाहिए. अगर सरकार चाहती है कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे, तो आज वक्त इसी बात का है कि हमारे देश में दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों की तरह राइट टू रिकॉल कानून होना चाहिए!
