चुनाव आयोग के द्वारा पश्चिम बंगाल में SIR के क्रम में ऐसे ऐसे खेल सामने आए हैं, जिन्हें जानकर लोगों के दिमाग घूम जाएंगे. सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के द्वारा जो तथ्य प्रस्तुत किए गए, उसके अनुसार 389 लोगों का एक ही पिता निकला ,तो एक पिता की 310 संतानों को लेकर आपका दिमाग घूमेगा नहीं तो क्या होगा! क्योंकि क्या सच में ऐसा होता भी है!
चुनाव आयोग के द्वारा ऐसे मामलों को लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के अंतर्गत रखा गया हैऔर मतदाताओं को नोटिस भेजा गया है. चुनाव आयोग ने कुछ इस तरह का खेला करने वाले मतदाताओं को सही दस्तावेज के साथ हियरिंग केंद्र में आने का नोटिस दिया है. इस तरह के मामलों में अगर सुधार नहीं होता है तो एक गलत परिपाटी चल पड़ेगी और मतदाता शुद्धिकरण का उद्देश्य कभी नहीं पूरा होगा.
सिलीगुड़ी से लेकर जलपाईगुड़ी तथा शेष उत्तर बंगाल के जिलों में सुनवाई केन्द्र में मतदाताओं का हंगामा हो रहा है.यह स्थिति पूरे राज्य में बनी है. छोटी गलतियों को नजरअंदाज कर दिया जाए तो इस तरह की गलतियों को ठीक किये बगैर वोटर लिस्ट तैयार करना किसी भी तरह से न्यायोचित नहीं है. चुनाव आयोग के हलफनामे में कहा गया है कि आसनसोल जिले की बराबनी विधानसभा सीट में एक व्यक्ति को 389 मतदाताओं का पिता बताया गया है जबकि हावड़ा जिले की बाली विधानसभा सीट में एक अन्य व्यक्ति 310 मतदाताओं का पिता दर्ज किया गया है.
क्या ऐसा मुमकिन है? चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने सुप्रीम कोर्ट के सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस दीपंकर दत्ता और जस्टिस जयमालया बागची की पीठ के सामने इस तरह के विवरण रखे है. जाहिर है ये विवरण गलत तो नहीं हो सकते है. चुनाव आयोग के आंकड़ों की बात करें तो पूरे राज्य में अधिकांश जिलों में अधिकांश विधानसभा सीटों पर ऐसे मामले सामने आए हैं.
चुनाव आयोग की ओर से कहा गया है कि पूरे राज्य में 7 ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्हें 100 से अधिक मतदाताओं का माता-पिता दर्ज किया गया है. 10 लोगों को अथवा उससे अधिक मतदाताओं का अभिभावक बताया गया है. जबकि 10 अन्य 40 से ज्यादा, 14 लोग 30 से ज्यादा, 50 लोग 20 से ज्यादा मतदाताओं के माता-पिता के रूप में दर्ज है. इस तरह से 8682 लोगों को 10 से अधिक, 206056 लोगों को 6 से अधिक और 459054 लोगों को 5 से अधिक मतदाताओं का माता-पिता दिखाया गया है.
अगर 6 और 5 की बात छोड़ दिया जाए तो ऐसा बहुत कम सुनने को मिला है कि एक-एक पिता की एक दर्जन से अधिक संताने हो सकती है. निश्चित रूप से यह जांच का विषय है. अगर चुनाव आयोग ऐसे मामलों में मतदाताओं को नोटिस भेज रहा है अथवा उनसे साबित करने के लिए कह रहा है, तो इसमें क्या बुरा है.
कई बार BLO के द्वारा भी गलतियां कर दी जाती है और इसका अंजाम मतदाता को भुगतना पड़ता है. जैसे पिता पुत्र की उम्र का फासला कम होना, उपनाम को अपने तरीके से लिखना, नाम में गलतियां होना यह सभी सामान्य बातें हैं और 2002 की मतदाता सूची में इस तरह की गलतियां होना स्वाभाविक है. ऐसे मामलों में चुनाव आयोग को चाहिए कि इसका दोष अकेले मतदाताओं पर ना थोपा जाए. ऐसे मामलों में संतुलन बनाए रखते हुए सामान्य भूल मानकर उनका निपटारा कर देना ही अच्छा होगा.
लेकिन जहां एक-एक पिता की 20 से अधिक संतानों को दिखाया गया है, वहां भारी गड़बड़ी होने की संभावना है. ऐसे मामलों में चुनाव आयोग को गंभीर होना चाहिए और सच्चाई का पता लगाकर ही वोटर लिस्ट तैयार करना चाहिए. बहरहाल इन खुलासों के बाद बंगाल की मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.
