पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव निकट है. यह चुनाव एक तरफ राज्य में सत्तारूढ तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का राजनीतिक भविष्य तय करेगा तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी का राज्य में सत्ता प्राप्ति के ख्वाब की जमीन की भी परीक्षा लेगा. यह विधानसभा चुनाव वामपंथी पार्टियों तथा कांग्रेस जैसे राजनीतिक दलों की राज्य विधानसभा में उपस्थिति और जनता में स्वीकार्यता का भी इम्तिहान लेगा.
राज्य में चल रही एस आई आर प्रक्रिया समाप्ति चरण में है. इसके पश्चात राजनीतिक दलों के नेता बाकायदा चुनाव प्रचार में लग जाएंगे. राज्य में 15 सालों के व्याप्त असंतोष को दूर करने की तृणमूल कांग्रेस ने अपने लोक लुभावन अंतरिम बजट में कोशिश जरूर की है. लेकिन इसके बावजूद उत्तर बंगाल से लेकर दक्षिण बंगाल तक विभिन्न क्षेत्रों में कई मुद्दों पर पार्टी को अग्नि परीक्षा से गुजरना होगा. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में जनता का वकील के रूप में भाग लेकर राज्य की जनता के बीच निस्संदेह एक मजबूत छाप छोड़ दी है.
दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी जो राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी है, को अभी साबित करना होगा कि भाजपा राज्य में टीएमसी का विकल्प बन सकती है. प्रदेश भाजपा में अभी कोई ऐसा सर्वमान्य चेहरा नहीं है जो जनता का चहेता बन सके. भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही है. वर्तमान में भाजपा अपने संगठन को मजबूत करने में जुटी हुई है. RSS से लेकर भाजपा के बड़े-बड़े नेता राज्य में डेरा जमा चुके हैं. पार्टी में बैठकों और मंथनों का दौर चल रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट के दावेदार ऐसे हो जो चुनाव जीतने की गारंटी बन सके.
सूत्र बता रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी राज्य में सभी 294 विधानसभा सीटों के लिए मजबूत उम्मीदवार की तलाश कर रही है. इनमें सिटिंग विधायक से लेकर नए चेहरे भी मैदान में आ सकते हैं. सिटिंग विधायकों में जिनके खिलाफ जनता का असंतोष व्याप्त है, उन्हें टिकट नहीं मिले तो आश्चर्य नहीं होगा. भारतीय जनता पार्टी उत्तर बंगाल से लेकर दक्षिण बंगाल तक इसी फार्मूले पर काम करेगी. प्रदेश में मुख्य रूप से दो ही पार्टियां हैं जिनके बीच मुकाबला होना है. बाकी वामपंथी पार्टियों, कांग्रेस और क्षेत्रीय दल राज्य विधानसभा में अपनी उपस्थिति मजबूत करने की लड़ाई लड़ेंगे.
पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने अकेला चुनाव लड़ा था. जबकि वामपंथी और कांग्रेस का गठबंधन चुनाव मैदान में था. लेकिन इसके बावजूद इस गठबंधन को जनता ने नकार दिया. दोनों ने मिलकर राज्य में 10 सीटें भी नहीं जीती. इस बार दोनों दलों के बीच कोई गठबंधन नहीं है. कांग्रेस ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि वह अकेला चुनाव लड़ेगी. इसी तरह से वामपंथी दलों ने भी अकेला चुनाव मैदान में जाने का फैसला किया है. हालांकि वामपंथी नेता चाहते हैं कि क्षेत्रीय संगठनों के साथ एक गठबंधन बना कर चुनाव मैदान में उतरा जाए ताकि बीजेपी और टीएमसी को टक्कर दिया जा सके.
वामपंथी नेता तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित विधायक हुमायूं कबीर से लेकर पहाड़ और Dooars क्षेत्र के अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ संवाद कर रहे हैं. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम मानते हैं कि स्थिति कठिन जरूर है. लेकिन वामपंथी अपने घटक दलों के साथ मिलकर अच्छा परिणाम ला सकते हैं. कांग्रेस से गठबंधन न होने का उन्हें दुख जरूर है, लेकिन नई चुनौती का सामना करने के लिए उन्हें क्षेत्रीय दलों पर भरोसा है. मोहम्मद सलीम कहते हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ उनका गठबंधन मजबूत लड़ाई लड़ सकता है.
इस तरह से सभी राजनीतिक दल विधानसभा चुनाव में एकला चलो रे की राह पर अपनी अपनी डफली अपना अपना राग अलापने में जुट गए हैं. अब सवाल यह है कि इसका लाभ राजनीतिक दलों को कितना मिलेगा? टीएमसी तथा बीजेपी अथवा उन दोनों में से किसे ज्यादा फायदा होगा? क्या कांग्रेस और वामपंथी दलों के अकेला चुनाव लड़ने से उनकी स्थिति मजबूत हो सकती है या इसका लाभ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा को मिलेगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वामपंथी पार्टियों और कांग्रेस का गठबंधन टूटने से इसका सबसे ज्यादा लाभ टीएमसी को मिल सकता है. दूसरे नंबर पर भाजपा को इसका लाभ मिलेगा. जबकि राज्य में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों की स्थिति पहले से ज्यादा कमजोर हो सकती है. खैर अभी यह प्रारंभिक दौर की बात है. अभी तक राज्य में चुनाव आयोग ने चुनाव की घोषणा नहीं की है. आज जो स्थिति है, कल बदल सकती है. राजनीतिक दलों के पास दो महीने से भी कम का समय रह गया है. उनकी तैयारी की असली परीक्षा राज्य के मतदाता ही कर सकेंगे.
