सिलीगुड़ी के वार्ड नंबर 7 में रहने वाले एक व्यक्ति को पिछले तीन दिनों से बुखार आ रहा था. पेरासिटामोल की गोलियां भी काम नहीं कर रही थी. एक दिन वह गली के एक मेडिकल स्टोर पर पहुंचा और दवा विक्रेता को अपनी समस्या बताई. दवा विक्रेता ने उसे पेरासिटामोल के साथ एंटीबायोटिक लेने की सलाह दी. व्यक्ति ने उसकी बात मानकर एंटीबायोटिक लेना शुरू कर दिया. इससे उसमें दूसरी तरह की संक्रमण की समस्याएं उभर कर सामने आने लगी. बाद में उसे डॉक्टर को दिखाना पड़ा. डॉक्टर ने टेस्ट करके दवा खाने की सलाह दी. इसके बाद ही वह व्यक्ति ठीक हुआ.
इसी तरह से एक अन्य मामला एचआईवी संक्रमित एक रोगी से जुड़ा हुआ है. उस व्यक्ति ने गूगल तथा मेडिकल स्टोर संचालक की सलाह पर दवाओं का 28 दिन का कोर्स ले लिया. इन दवाओं के कारण उसकी जान पर बन आयी. वर्तमान में वह व्यक्ति गंभीर अवस्था में एक अस्पताल में अपना इलाज करा रहा है. ऐसे बहुत से मामले आपने देखे होंगे. बात-बात पर एंटीबायोटिक दवाई लेना एक जरूरत बन गई है. बुखार, सर्दी, खांसी, घाव अथवा कोई भी साधारण बीमारी हो तो उसमें मेडिकल स्टोर वाले दवाई के साथ-साथ रोगी को एंटीबायोटिक लेने की सलाह जरूर देते हैं.
साधारण मामलों में रोगी डॉक्टर के पास जाना जरूरी नहीं समझता है. उसे तो लगता है कि मेडिकल स्टोर की दवाइयां से ही उसकी बीमारी ठीक हो जाएगी. मेडिकल स्टोर संचालक दवाइयों के साथ-साथ एंटीबायोटिक जरूर देते हैं. यह एंटीबायोटिक कितना नुकसानदेह है, उन्हें इससे कोई मतलब नहीं होता. उन्हें तो सिर्फ दवा बेचनी होती है. ऐसी दवाओं को बेचकर उन्हें मोटा कमीशन मिलता है. बिना डाक्टरी पर्ची के खुद या मेडिकल स्टोर संचालक की मर्जी से एंटीबायोटिक दवाएं खाने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है. यह ऐंटीमाइक्रोबॉयल रेजिस्टेंस जैसे संकट को बढ़ावा दे रही है.
यह वह स्थिति होती है जब बैक्टीरिया पर दवाओं का असर नहीं होता और साधारण संक्रमण भी जानलेवा बन जाता है. ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट 1940 के अनुसार बिना डॉक्टर के पर्चे की एंटीबायोटिक समेत सभी एंटी माइक्रोबॉयल दवाओं की खुली बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध है. यह कितना खतरनाक है, इसी बात से समझा जा सकता है कि हमारे देश में हर साल लगभग 3 लाख लोगों की मौत हो जाती है. स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस प्रवृत्ति पर चिंतित हैं और लोगों को सावधान कर रहे हैं. अगर बात-बात पर एंटीबायोटिक दवाई लेने की प्रवृत्ति बढ़ती गई तो उपचार के विकल्प खत्म होते जाएंगे.
एंटीबायोटिक का उपयोग केवल डॉक्टर की पर्ची से ही करना चाहिए. यह कई तरह के दुष्प्रभावों को जन्म देता है. यह रोग की अवस्था को जटिल बना देता है. लेकिन मेडिकल स्टोर वाले इस पर कोई ध्यान नहीं देते और महंगी एंटीबायोटिक दवाइयां बेचकर मोटा कमीशन कमाते हैं. केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन के अनुसार देश में एंटीबायोटिक की कुल वार्षिक बिक्री लगभग 28000 करोड़ रुपए आंकी गई है. एंटीबायोटिक को दवाओं की शेड्यूल H और H वन श्रेणी में रखा गया है, जिन्हें केवल योग्य चिकित्सक के पर्चे पर ही बेचा जा सकता है.
ग्रामीण इलाकों में झोलाछाप डॉक्टर मरीज को हर छोटी बीमारी में एंटीबायोटिक खाने की सलाह देते हैं और रोग की जटिलता को बढ़ा देते हैं. इन एंटीबायोटिक दवाइयों से मरीज को लाभ हो या ना हो, लेकिन डॉक्टर और अस्पताल को जरूर लाभ होता है. डॉक्टर की फीस बचाने के चक्कर में रोगी के रोग की जटिलता बढ़ती जाती है. तब वह सीधा अस्पताल या डॉक्टर के पास पहुंचता है, जहां उसका टेस्ट किया जाता है और फिर डॉक्टर और अस्पताल के चक्कर में मरीज की जेब कटने लगती है. ऐसे में जरूरी है कि आप एंटीबायोटिक के साइड इफेक्ट भी जाने और केवल विशेषज्ञ की बातों पर भरोसा करें. जागरूक बनें. अच्छे डॉक्टर साधारण रोग के मामले में एंटीबायोटिक की सलाह नहीं देते हैं.
