तृणमूल कांग्रेस, वाममोर्चा और भाजपा के द्वारा विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की घोषणा के बाद उम्मीदवारों ने अपने-अपने क्षेत्र में घूमना शुरू कर दिया है. पार्टी मीटिंग, कार्यकर्ता मीटिंग, संगठन मीटिंग और जनसंपर्क अभियान के अलावा जनता उन्हें क्यों वोट दे का मुद्दा लेकर वे अपने लोगों के बीच जा रहे हैं.
उम्मीदवार लोगों का हाल-चाल पूछते हैं. पार्टी को वोट देने के लिए कहते हैं और फिर मुस्कुरा कर आगे बढ़ जाते हैं. तृणमूल कांग्रेस से लेकर भाजपा और वाममोर्चा के उम्मीदवारों की यही कहानी है. सभी उम्मीदवार जनता से एक मौका मांगते हैं और अपनी पार्टी की उपलब्धियां को गिनाते हैं. सिलीगुड़ी विधानसभा क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार गौतम देव, बीजेपी के उम्मीदवार डॉक्टर शंकर घोष के अलावा अन्य दलों के उम्मीदवार लोगों के द्वार द्वार पहुंच रहे हैं. तेज धूप और कार्यकर्ताओं की टोली लेकर वे वोट मांगने निकल जाते हैं.
जनता उन्हें आश्वासन देती है. किसी को मना नहीं करती है. आमतौर पर जनता किसे अपना वोट देगी, यह फैसला चुनाव के 2 दिन पहले लोगों के द्वारा किया जाता है. उससे पहले लोग अपने उम्मीदवार की सुनते हैं. उनके व्यक्तित्व और उपलब्धियों का गुणा भाग लगाते हैं और फिर किसी नतीजे पर पहुंचते हैं. उम्मीदवार की जीत हार में कार्यकर्ताओं की बड़ी भूमिका होती है, जो वातावरण बनाते हैं. हर पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को खुश रखने का प्रयास करती है. लेकिन कभी-कभी हालात अनुकूल नहीं होते हैं. पार्टी को कुछ कठोर फैसले लेने पड़ते हैं. इस स्थिति में कार्यकर्ता या तो बगावत कर बैठते हैं या फिर मौन रहकर ऊपरी मन से पार्टी का साथ देते हैं. यह स्थिति किसी भी पार्टी के लिए उम्मीदवार के लिए अच्छी नहीं होती
इस बार तृणमूल कांग्रेस ने कई विधायकों के टिकट काट दिए हैं. जिन्हें टिकट मिलने की उम्मीद थी, उन्हें टिकट नहीं मिला और जिन्हें नहीं मिलना चाहिए था, उन्हें टिकट मिल गया. कम से कम असंतुष्ट और टिकट से वंचित टीएमसी के नेताओं के आरोप हैं . इसलिए उन्होंने भी पार्टी में बगावत शुरू कर दी है. कुछ लोग जिन्हें टिकट नहीं मिला है, मन मसोस कर रह गए हैं. उधर भाजपा ने लगभग सभी अपने पुराने नेताओं को टिकट दिया है. इसलिए पार्टी कार्यकर्ताओं में उस तरह का असंतोष नहीं देखा जा रहा है, जिस तरह का असंतोष तृणमूल कांग्रेस में देखा जा रहा है.
चुनाव प्रचार के लिए बाहर जाते टीएमसी नेता उम्मीदवारों के साथ कार्यकर्ताओं की उपस्थिति जरूर रहती है, लेकिन उनकी स्थिति हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और जैसी ही है. दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार चुनाव जीतने के लिए अपने संगठन को मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं. बूथ स्तर की बैठक चल रही है. कहां क्या कमियां हैं, उन्हें दूर करने के उपाय किए जा रहे हैं. सबको एक ही फरमान मिला है कि इस बार बंगाल की सत्ता हासिल करनी है.
भाजपा उम्मीदवारों की कमान संभाल रहे दार्जिलिंग के भाजपा सांसद और भाजपा प्रवक्ता राजू बिष्ट चुनाव प्रचार की अपनी रणनीति के तहत एक समुदाय विशेष का भावनात्मक समर्थन हासिल कर रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस पर राज्य में कानून एवं व्यवस्था को ध्वस्त करने का आरोप लगाते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का मुद्दा उठा रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि राष्ट्रपति को अपमानित करने की टीएमसी की यही संस्कृति है. वे लोगों से पूछते हैं कि क्या ऐसी पार्टी के उम्मीदवार का समर्थन करेंगे?
राजू बिष्ट आदिवासी महिलाओं के साथ अत्याचार का भी मुद्दा उठा रहे हैं और जनता को भरोसा देते हैं कि बंगाल में भाजपा की सरकार बनने पर राज्य में कानून का राज स्थापित होगा. युवाओं का पलायन रोका जाएगा. सभी के लिए रोजी-रोटी की व्यवस्था होगी. राजू बिष्ट पत्रकारों से बातचीत करते हुए सवाल करते हैं कि आखिर टीएमसी को वोट क्यों दिया जाए? राज्य में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महिलाओं पर अत्याचार, कानून व्यवस्था ठप्प, चिकन नेक आदि की परवाह नहीं करने वाली सरकार को आप वोट देंगे? जबकि तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार राज्य में महिलाओं के सशक्तिकरण, युवाओं के बेरोजगारी भत्ता, विकास कार्य और धार्मिक तथा सामाजिक एकता की बात करके जनता का वोट मांगते हैं.
वे पूछते हैं कि क्या हिंदू मुस्लिम करने वाली पार्टी की सरकार चाहिए या फिर राज्य में सभी धर्म एवं वर्गों का सम्मान तथा उनकी रोजी-रोटी सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध सरकार चाहिए? तो उन्हें टीएमसी को जिताना होगा. इस तरह से उम्मीदवारों के द्वारा अपनी अपनी डफली अपना अपना राग अलापा जा रहा है. जनता चुपचाप उन्हें सुन रही है. फैसला तो 23 अप्रैल को होगा. कौन जनता की पसंद की कसौटी पर खरा उतरता है, यह उसी दिन पता चल जाएगा.
