June 23, 2026
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एक थी तृणमूल कांग्रेस…! कहीं TMC इतिहास बनकर न रह जाए!

ऐसा लगता है कि आने वाले समय में विद्यार्थी पॉलिटिकल साइंस की पुस्तकों में पढ़ेंगे कि एक समय पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस नामक एक राजनीतिक दल होता था. तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी होती थी. यह पार्टी एक राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा लेने जा रही थी. लेकिन तभी हवा का एक भारी झोंका आया और टीएमसी को उड़ा ले गया…

यह बात इसलिए कही जा रही है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी इसी राह पर आगे बढ़ रही है. ममता बनर्जी के दाएं बाएं आगे पीछे के सारे नेता विद्रोही गुट में शामिल हो चुके हैं. विधानसभा से लेकर लोकसभा और राज्यसभा तक यह पार्टी टूट चुकी है. टीएमसी के जिन नेताओं पर ममता बनर्जी को भरोसा था, अब उन्होंने भी ममता बनर्जी को अकेला छोड़ दिया है. फिरहद हकीम, जावेद अहमद खान, अरूप राय, रथीन घोष, बिप्लव मित्रा, सबीना यास्मीन, अरूप विश्वास, स्नेह आशीष चक्रवर्ती सब उनका साथ छोड़ चुके हैं.

ममता बनर्जी ने इन सभी नेताओं को अपनी पार्टी से बाहर कर दिया है. लेकिन सवाल है कि टीएमसी ममता बनर्जी की है या अलग गुट की? TMC के 80 में से 60 विधायक बागी गुट में है. जबकि टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद पहले ही अलग हो चुके हैं और वे नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया के बैनर तले इकट्ठे हो गए हैं. हालांकि यह पार्टी कोई कमाल नहीं दिखा पाई है. 2023 में त्रिपुरा में चुनाव जरूर लड़ा था. लेकिन पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी.

इस तरह से ममता बनर्जी के पास 20 से भी कम विधायक और लगभग 8 सांसद बचे हैं. जबकि दूसरी तरफ बागी टीएमसी के सांसदों और विधायकों की संख्या सबसे अधिक है. ऐसे में असली टीएमसी की लड़ाई शुरू हो चुकी है. ममता बनर्जी अपनी पार्टी TMC को ही असली मानते हुए अपने अधिकार का प्रदर्शन कर रही है. अपने इसी अधिकार का प्रयोग करते हुए उन्होंने टीएमसी के आठ नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया है.

अब जरा दूसरी तरफ देख लेते हैं. राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतव्रत बनर्जी है. उन्हें टीएमसी के 60 से ज्यादा विधायकों का समर्थन प्राप्त है. वह असली टीएमसी मानते हैं और खुद को असली टीएमसी नेता. तथाकथित इस असली टीएमसी के चेयरमैन अरूप राॅय को बनाया गया है, जो ममता बनर्जी की जगह लेंगे. अरूप विश्वास और फिरहद हकीम को वॉइस चेयर पर्सन बनाया गया है. 30 सदस्यों वाली नेशनल वर्किंग कमेटी में फिरहद हकीम, अरूप विश्वास, रथीन घोष, सबीना यास्मीन, जावेद खान, संदीपन साहा और दूसरे लोगों को शामिल किया गया है. इसी नेतृत्व वाले टीएमसी ने अब बैठक भी करनी शुरू कर दी है.

अगर संख्या बल तथा नेतृत्व बल की बात करें तो विरोधी खेमा ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी खेमा से कहीं अधिक सफल और सक्षम लगता है. तो क्या विरोधी खेमा ही असली टीएमसी है? और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला खेमा असली टीएमसी नहीं है? लड़ाई इसी बात को लेकर हो रही है. दोनों तरफ से अधिकारों का प्रयोग किया जा रहा है. भारतीय जनता पार्टी, जाहिर है कि टीएमसी के भीतर चल रही लड़ाई का फायदा उठाने की ताक में है.

सूत्र बता रहे हैं कि जिस तरह से टीएमसी के भीतर खींचतान और अहम का टकराव बड़ा होता जा रहा है, ऐसे में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी गुट की टूट यहीं तक सीमित रह जाएगी, ऐसा लगता नहीं है. क्योंकि आने वाले समय में टीएमसी के नेताओं की महत्वाकांक्षाएं उन्हें ममता से अलग कर सकती हैं. इस बात की संभावना भी है. क्योंकि जब फिरहद हकीम और विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के लिए काबा मदीना गाकर वोट मांगने वाली सायनी घोष तक साथ छोड़ सकती हैं तो दूसरे विधायक और नेताओं पर ममता बनर्जी कितना भरोसा कर सकती हैं.

रही सही कसर शुभेंदु अधिकारी की भाजपा सरकार पूरा करने जा रही है. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले टीएमसी को इतिहास बनाने पर जैसे अडी भारतीय जनता पार्टी की सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने संकेत दिया है कि तृणमूल कांग्रेस के पिछले 15 वर्षों के शासन काल में आय व्यय के संपूर्ण लेखे की भाजपा सरकार जांच कराएगी. कैग जांच के लिए राज्य विधानसभा में भाजपा सरकार बिल रखने जा रही है. विश्लेषकों ने संभावना जताई है कि बहुत हद तक संभव है कि टीएमसी इतिहास का एक अध्याय बनकर रह जाए.

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