January 8, 2026
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अपनी सियासी छवि बदल रही ममता बनर्जी को चुनाव में कितना लाभ होगा?

How much will Mamata Banerjee benefit in the elections from changing her political image?

2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में दोबारा वापसी के लिए रणनीति बनाने में जुटी हुई है. बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और बंगाल में एस आई आर को लेकर हो रहे राजनीतिक हंगामों के बीच एक तरफ ममता बनर्जी चुनाव आयोग और भाजपा से भिड़ रही हैं, तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के द्वारा उनके खिलाफ चलाए गए मुस्लिम तुष्टिकरण अभियान के जवाब में उनकी सरकार के द्वारा धार्मिक और सांस्कृतिक विकास परियोजनाओं पर निवेश करने से बंगाल की जनता यह समझ नहीं पा रही है कि ममता बनर्जी क्या अपनी सियासी छवि बदल रही हैं या बदलते जनमत को साधने की कोशिश कर रही हैं या फिर उनकी चुनावी मजबूरी है?

इसमें कोई शक नहीं है कि पिछले कुछ महीनो में ममता बनर्जी ने अपनी सियासी छवि को एक नया रूप देने की कोशिश की है. उन्होंने राज्य में धार्मिक और सांस्कृतिक विकास पर एक मोटी धनराशि खर्च की है. हाल ही में उन्होंने गंगासागर सेतु के उद्घाटन के साथ ही मेले के विकास के लिए लगभग 4000 करोड रुपए खर्च किए हैं,तो दूसरी तरफ राज्य में कई मंदिरों का जीर्णोद्धार भी करवाया है. इसके अलावा सिलीगुड़ी से लेकर कोलकाता तक नए-नए मंदिर भी बना रही हैं. सिलीगुड़ी में इसी महीने महाकाल मंदिर का निर्माण हेतु शिलान्यास कार्य उनके हाथों किया जाना है.

विभिन्न अखबारों एवं न्यूज़ चैनल्स में प्रकाशित प्रसारित खबरों के अनुसार इन सभी पर कुल खर्च 10000 करोड रुपए से ज्यादा होने वाला है. मुख्यमंत्री ने दीघा में जगन्नाथ मंदिर के निर्माण पर लगभग 300 करोड रुपए खर्च किए थे. उन्होंने कालीघाट मंदिर का नवीनीकरण किया. उनकी सरकार ने दक्षिणेश्वर और कालीघाट, स्काईवॉक, तारापीठ, कंकालीटोला, मदन मोहन मंदिर, मायापुर इस्कॉन, जैसे मंदिरों का विकास भी किया है. गंगासागर मेले में आ रहे श्रद्धालु यहां के खास इंतजाम से काफी खुश हैं और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तारीफ भी कर रहे हैं.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी सरकार के धार्मिक और सांस्कृतिक विकास कार्यक्रमों और परियोजनाओं को देखते हुए अनेक लोगों का मानना है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी किसी एक खास समुदाय के हित की बात नहीं कर रही है. बल्कि उनकी सरकार सबका साथ और सबका विकास की बात कर रही है. ममता बनर्जी की विकास परियोजनाओं ने भी यह संकेत दिया है कि उनकी सरकार केवल वादों और नारों की सरकार नहीं रही है.

ममता बनर्जी का सबसे बड़ा एक्शन बाबरी मस्जिद से जुड़े बयान देने वाले तृणमूल कांग्रेस के नेता हुमायूं कबीर के निलंबन के रूप में सामने आया है. उन्होंने हुमायूं कबीर जैसे बड़े नेता की कोई परवाह नहीं की और खुद पर लगे मुस्लिम तुष्टिकरण के दाग को धोने की जरूर कोशिश की है. राजनीतिक जानकर भी मानते हैं कि ममता बनर्जी की छवि बदल रही है. हालांकि कुछ लोग यह भी हैं कि 4 दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात इसे चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं. फिलहाल ममता बनर्जी ने अपने सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को धार्मिक विवाद से बचने की सलाह दी है.

जिस तरह से ममता बनर्जी ने धार्मिक और सांस्कृतिक विकास की परियोजनाओं को एक समुदाय पर केंद्रित करके रखा है, उससे कुछ लोग यह भी सवाल उठा रहे हैं कि ममता बनर्जी का मस्जिद, चर्च या अन्य धार्मिक स्थलों के विकास की ओर ध्यान क्यों नहीं है? उनके अनुसार इसका मतलब बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को हिंदू संगठनों का वोट दिलाना है या फिर बंगाल की जनता में यह संदेश देना है कि उनकी सरकार केवल मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति नहीं करती. बल्कि हिंदू समुदाय की भावनाओं का भी सम्मान करती है.

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी उनके द्वारा किए जा रहे धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों को दिखावा बताती है और एस आई आर के मुद्दे को लेकर घुसपैठिए और मुस्लिम तुष्टिकरण की उनकी नीति पर प्रहार करती है. बहरहाल यह देखना होगा कि भाजपा द्वारा उनकी मुस्लिम तुष्टिकरण की छवि को बरकरार रखने के जवाब में ममता बनर्जी की बदली हुई रणनीति आगामी विधानसभा चुनाव में उन्हें कितना लाभ दिला पाती है. लेकिन इतना तो तय है कि बंगाल की राजनीति अब एक नए मोड़ पर आ गई है.

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