सिलीगुड़ी में ऑनलाइन फूड डिलीवरी के क्षेत्र में जोमैटो दूसरी ई-कॉमर्स कंपनियों के मुकाबले सबसे ज्यादा लोकप्रिय है. आमतौर अगर आप जोमैटो को पसंदीदा व्यंजन या भोजन के लिए आर्डर करते हैं तो कंपनी की ओर से निर्धारित समय के भीतर ही आपका ऑर्डर आपके दरवाजे तक होता है. ऐसे बड़े-बड़े दावे भी किए जाते हैं. हालांकि कभी-कभी ऑर्डर देने से लेकर आर्डर प्राप्त करने के बीच उपभोक्ताओं में जो कशमकश देखी जाती है, उसकी पीड़ा अलग होती है.
आज एक ऐसा ही मामला सामने आया है. सिलीगुड़ी के एक व्यक्ति ने जोमैटो को खाने का आर्डर रात 9:30 बजे दिया. लेकिन उनका डिलीवरी ऑर्डर देर रात 11:30 बजे तक नहीं मिला. व्यक्ति ने बार-बार जोमैटो को फोन किया. कई बार तो घंटी जाती रही. लेकिन किसी ने फोन रिसीव नहीं किया. उसके बाद फोन रिसीव भी किया गया तो इसका दोषारोपण रेस्टोरेंट पर लगाया गया. बताया गया कि रेस्टोरेंट ने समय पर ऑर्डर तैयार नहीं किया था. इसलिए डिलीवरी में देर हो रही है.
उक्त व्यक्ति ने रेस्टोरेंट को भी फोन किया तो वहां से जवाब मिला कि उनका ऑर्डर तो 9:50 में ही तैयार हो गया था. अगर 9:50 पर ऑर्डर तैयार हो गया तो डिलीवरी में इतना विलंब क्यों? जोमैटो में फोन करने पर कर्मचारी का जवाब था कि राइडर समय पर नहीं आया. इसलिए डिलीवरी में देर हुई. अब उपभोक्ता को ना तो राइडर का पता है और ना ही रेस्टोरेंट का. उपभोक्ता तो जोमैटो से ही सवाल कर सकता है. जोमैटो की यह जिम्मेदारी बनती है कि उपभोक्ता को समय पर ऑर्डर डिलीवर किया जा सके. 5-10 मिनट का विलंब हो सकता है. लेकिन 2- 2 घंटे विलंब होना गले से नहीं उतरता है!
ऐसे मामलों में ग्राहक सीधे कंपनी को ही जिम्मेदार बताते हैं जो सही भी है. क्योंकि उपभोक्ता तो कंपनी को जानता है. कंपनी की विश्वसनीयता पर भरोसा करता है. ना कि रेस्टोरेंट या राइडर का. रेस्टोरेंट या राइडर को देखना तो कंपनी का काम है. यह व्यवस्था तो सिर्फ जोमैटो ही देख सकती है. ना कि ग्राहक! आपको इस तरह के अनुभव कई बार हुए हो सकते हैं. जोमैटो और रेस्टोरेंट द्वारा एक दूसरे पर आरोप मढ देने से उपभोक्ता की समस्या का समाधान नहीं होता है. अलबता कंपनी की विश्वसनीयता घटती है.
सिलीगुड़ी में यह कोई पहला मामला नहीं है. जोमैटो जैसी कंपनियों में काम करने वाले कुछ गैर जिम्मेदार लोगों की लापरवाही से कंपनी भी बदनाम होती है. कंपनी में काम करने वाले कुछ कर्मचारी तो सफेद झूठ तक बोल देते हैं. जैसे इस मामले में उपभोक्ता ने ऑर्डर देने के कुछ देर बाद रात 9:50 बजे फोन करके पूछा तो जवाब मिला कि उनका ऑर्डर डिस्पैच हो चुका है. जबकि ऑर्डर 11:30 तक भी नहीं पहुंचा. तब उनका पेशेंस जवाब देने लगा. आखिर यह मजाक नहीं तो क्या है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
जानकार मानते हैं कि कंपनी के कई कर्मचारी अपने झूठ को छिपाने और उपभोक्ता का ध्यान डाइवर्ट करने के लिए फोन पर औपचारिकता ज्यादा निभाते हैं. वह अनुशासन और समय की पाबंदी की भी बात करते हैं. कभी-कभी उपभोक्ता को धैर्य रखने के लिए उनकी झूठी तारीफ भी कर देते हैं. अगर आप आर्डर कैंसिल करते हैं, तो उनकी तरफ से कारण भी पूछा जाता है और मैसेज बार-बार आने लगते हैं. इसमें काफी समय लग जाता है. अगर कंपनी इन औपचारिकताओं के बजाय उपभोक्ता के हित और कीमती समय का ध्यान रखे और इस दिशा में कार्य करे तो कंपनी का व्यवसाय तो बढ़ेगा ही, उपभोक्ताओं का भरोसा भी बढ़ेगा.
कई बार उनकी तरफ से ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है ताकि उपभोक्ता का गुस्सा कम हो सके और उम्मीद बढे. हालांकि यह सभी कंपनी के प्रशिक्षण के दौरान मिले लफज होते हैं. ट्रैफिक जाम और राइडर का समय पर नहीं पहुंचना ग्राहक का ध्यान डाइवर्ट करने का अचूक अस्त्र होता है. जो भी हो, इन अचूक अस्त्रों से ग्राहक का तो कोई भला नहीं होता, उसका समय बर्बाद होता है. ऐसे में ग्राहक का गुस्सा होना स्वाभाविक है.
सवाल यह उठता है कि जोमैटो जैसी ऑनलाइन खाना आपूर्ति करने वाली विश्वसनीय कंपनियों की ओर से इस तरह की लापरवाही सामने आती है तो ग्राहक को होने वाले मानसिक नुकसान की भरपाई कौन करेगा? अगर इस तरह की घटनाएं कुछ लोगों के कारण होती है तो इसका कंपनी के व्यवसाय पर तो भारी असर पड़ेगा ही, कंपनी से ज्यादा इसमें ग्राहक का अहित होता है. ग्राहक के मान सम्मान को भी ठेस पहुंचती है. अगर ग्राहक ने कंपनी का भरोसा करना बंद कर दिया, तो कंपनी कहां जाएगी!
