March 12, 2026
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दार्जिलिंग विधानसभा सीट: क्या भाजपा अपनी जीत का सिलसिला दोहरा पाएगी?

14 या 15 मार्च को भारतीय चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल के लिए चुनाव की घोषणा करेगा. इसके साथ ही विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक दल मैदान में ताल ठोक देंगे. पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए कुल 294 सीटों पर चुनाव होना है. उनमें से दार्जिलिंग विधानसभा सीट भी एक है. आज हम इसी सीट की बात करेंगे.

2021 के विधानसभा चुनाव में दार्जिलिंग सीट भाजपा की झोली में आई थी. भाजपा उम्मीदवार नीरज जिंबा ने यह प्रतिष्ठित सीट जीती थी. लेकिन इस बार यह सीट किसकी झोली में आएगी, अभी से इस पर कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती है .लेकिन इतना जरूर है कि भाजपा के लिए दार्जिलिंग की डगर आसान नहीं है. 2021 के विधानसभा चुनाव में नीरज जिंबा को कुल 40.9% वोट हासिल हुए थे. उन्होंने लगभग 21000 से अधिक मतों के अंतर से बीजेपीएम के उम्मीदवार को हराया था. क्या इस बार नीरज जिंबा अपनी सीट निकाल पाएंगे?

हालांकि नीरज जिंबा अपनी जीत को लेकर पूरी तरह कॉन्फिडेंस की मुद्रा में नजर आते हैं. वह कहते हैं कि अगर पार्टी ने टिकट दिया तो एक बार फिर से दार्जिलिंग सीट जीतकर दूंगा. नीरज जिंबा की पार्टी भाजपा का सहयोगी संगठन है. नीरज जिंबा दार्जिलिंग के भाजपा सांसद राजू बिष्ट के काफी करीब माने जाते हैं और भारतीय जनता पार्टी की नीतियों और सिद्धांतों पर सटीक विचार रखते हैं. लेकिन मौजूदा स्थिति उतना आसान नहीं है, जितना कि लगता है.

दरअसल इस बार दार्जिलिंग विधानसभा सीट से अनित थापा की पार्टी भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा अपना स्वतंत्र उम्मीदवर उतार रही है. अनित थापा ने पहले ही कहा था कि उनका दल स्वतंत्र रूप से अपना उम्मीदवार उतारेगा यानी उनका कॉन्फिडेंस ऐसा है कि टीएमसी के सहयोग और समर्थन के बगैर भी भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा का उम्मीदवार चुनाव जीत सकता है. भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा के कार्यकर्ता और नेताओं का यहां दबदबा भी दिखता है. स्वयं अनित थापा दार्जिलिंग में एक प्रमुख फैक्टर हैं और पहाड़ की राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं.

इसी सीट से अजय एडवर्ड की पार्टी ने भी अपना स्वतंत्र उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है. अजय एडवर्ड ने पहले ही घोषणा कर दी है कि पहाड़ की क्षेत्रीय पहचान को बचाने के लिए वह यहां से उम्मीदवार हो सकते हैं. अजय एडवर्ड की पार्टी इंडियन गोरखा जनशक्ति फ्रंट है, जिसको गठन से लेकर उसके विकास के लिए उन्होंने अथक प्रयास किया है. दार्जिलिंग में अजय एडवर्ड ने अपने पैसे से पुल और दूसरे निर्माण कार्य करवाए हैं. यहां उनकी युवाओं में एक पहचान भी बनी है. चाय बागान क्षेत्र के लिए वे लगातार काम करते रहे हैं.

इस तरह से कहा जा सकता है कि दार्जिलिंग विधानसभा सीट पर इस बार त्रिकोणात्मक मुकाबला हो सकता है. एक तरफ राष्ट्रीय पार्टी और दूसरी तरफ दो क्षेत्रीय दल और उनके बीच मुकाबला होगा. इस विधानसभा सीट की क्षेत्रीय राजनीति और जीत की पृष्ठभूमि पर एक नजर डालना जरूरी है. हिमालय की गोद में बसा दार्जिलिंग चाय, प्राकृतिक सौंदर्य और शांत वातावरण के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है. 1951 से लेकर अब तक 18 विधानसभा चुनाव में यह हिस्सा ले चुका है. इस सीट में दार्जिलिंग नगर पालिका, दार्जिलिंग पुल बाजार ब्लॉक और जोर बांग्ला सुखिया पोखरी ब्लॉक के 11 ग्राम पंचायत आते हैं.

दार्जिलिंग की राजनीति कभी राष्ट्रीय तो कभी क्षेत्रीय आकांक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है. पिछले दो विधानसभा चुनाव 2019 उपचुनाव और 2021 विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी गठबंधन ने जीत हासिल की थी. लेकिन अगर शुरुआती राजनीति पर नजर डालें तो अखिल भारतीय गोरखा लीग का यहां दबदबा रहा है. 1962 से लेकर 1977 तक देव प्रकाश राई के नेतृत्व में पार्टी ने लगातार 6 बार चुनाव जीते. 1991 से लेकर 2006 तक गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट ने चार बार यहां लगातार जीत हासिल की. 2011 में गोरखा जन मुक्ति मोर्चा ने विजय हासिल की.

लेकिन अब समय बदल चुका है. बदलते समय के साथ ही पहाड़ में एक नई राजनीति उभरी है. एक तरफ क्षेत्रीय दल बटे नजर आते हैं तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय पार्टी भाजपा की पकड़ मजबूत हुई है. लोकसभा चुनाव के दृष्टिकोण से देखें तो 2009 से अब तक भाजपा का ही उम्मीदवार चुनाव जीतता रहा है. तृणमूल कांग्रेस कभी भी यहां स्वतंत्र रूप से अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं कर सकी. पृष्ठभूमि पर नजर डालने से पता चलता है कि तृणमूल कांग्रेस दार्जिलिंग विधानसभा चुनाव में कभी दूसरे स्थान पर भी नहीं पहुंची. हालांकि लोकसभा चुनाव में वह उप विजेता जरूर रही है.

जानकार मानते हैं कि पहाड़ में क्षेत्रीय दलों के कमजोर पडने और राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ने की बढ़ती इच्छा ने दार्जिलिंग की राजनीतिक दिशा बदल दी है. तृणमूल कांग्रेस और माकपा यहां अभी मजबूत पकड़ बनाने में असफल रही है. ऐसे में 2026 के विधानसभा चुनाव में अगर क्षेत्रीय दलों के बीच समन्वय नहीं होता है तो भारतीय जनता पार्टी यहां मजबूत स्थिति में जरूर होगी. चुनाव की घोषणा के बाद राजनीतिक दलों के द्वारा घोषित उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि पर भी यहां जीत हार का फैसला होने के आसार नजर आते हैं. जो भी हो, इस प्रतिष्ठित सीट से कौन बाजी मारेगा, यह फैसला तो यहां की जनता ही करेगी.

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