सिलीगुड़ी का झंकार मोड़ हो या बर्दवान रोड, जिला अस्पताल हो या मेडिकल कॉलेज अस्पताल, हाट बाजार हो या स्कूल कॉलेज, वहां आप कुछ देखे या ना देखें लेकिन इधर-उधर भागते कुत्तों को जरूर देख सकते हैं. इन कुत्तों को भौंकते और झगड़ते देखकर रास्ते से जाने वाले भी सहम जाते हैं कि क्या पता कि ये कुत्ते काट ले.
यह मंजर शाम ढलते ही कुछ ज्यादा ही भयानक हो जाता है. अगर सड़क सुनसान हो तो लोग रास्ता छोड़ देते हैं. बस्ती क्षेत्रों में तो इनका आतंक सर्वाधिक देखा जाता है. कुत्तों के काटने की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही है. चाहे सिलीगुड़ी जिला अस्पताल हो या उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल, यहां कुत्तों के काटने के पीड़ित लोग इलाज के लिए आते रहते हैं.
कुत्तों के बारे में कहा जाता है कि ये काफी वफादार होते हैं. यही कारण है कि अनेक लोग कुत्ते पालते हैं और उनकी देखभाल करते हैं. सिलीगुड़ी में एक वर्ग ऐसा है, जो कुत्तों को पालता है और उसकी पूरी देखभाल करता है. लेकिन इसी शहर में आवारा कुत्ते भी रहते हैं जिन्हें कोई नहीं पूछता है. ऐसे कुत्ते शाम ढलते ही शहर के चौक चौराहों पर जमघट लगाने लगते हैं. उनकी तादाद लगातार बढ़ रही है.
खासकर सिलीगुड़ी के बस्ती क्षेत्रों में जब सड़कें सुनसान हो जाती हैं तो इन आवारा कुत्तों का जमघट देखा जा सकता है. कई बार तो लोग कुत्तों को देखकर रास्ता ही बदल देते हैं. कई बार कुत्ते लोगों को दौड़ा भी देते हैं और काटते भी हैं. बहुत पहले सिलीगुड़ी नगर निगम इलाके में कुत्तों के काटने की घटनाएं बढ़ गई थी. तब सिलीगुड़ी नगर निगम ने आवारा कुत्तों को पकड़ने, उनकी नसबंदी और दूसरे उपायों के द्वारा कुत्तों की बढती तादाद पर नियंत्रण पाने की कोशिश की थी. हालांकि निगम की कोशिश पूरी तरह सफल नहीं हुई थी.
ऐसे लावारिस कुत्तों को सुप्रीम कोर्ट ने ‘इंसान’ बनाने की पहल शुरू कर दी है. कुत्तों को इंसान बनाने का मतलब यह है कि इन आवारा कुत्तों को एक सही जगह मिले तथा उनकी अच्छी देखभाल हो सके. ऐसे कुत्ते स्वाभिमान से जी सके… सुप्रीम कोर्ट के विचार में आवारा कुत्तों के लिए आश्रय केंद्र होना चाहिए. इसके अलावा उनके टीकाकरण और नसबंदी की क्षमता बढ़ाने की भी व्यवस्था होनी चाहिए.
बहुत पहले सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को इस दिशा में काम करने के लिए आदेश दिया था. परंतु एक असम राज्य को छोड़कर अभी तक किसी भी राज्य ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की है. अब सुप्रीम कोर्ट इस मामले में काफी गंभीर दिख रहा है और आदेश जारी किया है. सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी दिख रही है और चेतावनी भी दी है. सुप्रीम कोर्ट का आदेश अपनी जगह पर सही है.
देखा जाता है कि आवारा कुत्ते अस्पताल, बाजार, स्कूल, बस अड्डे आदि इलाकों में अत्यधिक देखे जाते हैं. ऐसे में बच्चों और बड़ों को काफी समस्या होती है. क्योंकि इन कुत्तों का पता नहीं होता कि कब वे इंसान को काट ले. बच्चे भी डरे सहमे होते हैं. अस्पतालों के गिर्द इन कुत्तों को अधिक देखा जा सकता है. अभी कुछ ही दिनों पहले जलपाईगुड़ी के एक सरकारी अस्पताल से कुत्ते के द्वारा मानव अंग को लेकर घूमते तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी. यह मानवता के लिए भी काफी शर्मनाक है तो दूसरी तरफ स्वयं कुत्तों के लिए भी यह चिंता जनक स्थिति है.
यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को आदेश दिया है कि अस्पताल, स्कूल ,बस अड्डे आदि संस्थागत क्षेत्र से आवारा कुत्तों को तत्काल हटाए और यदि अदालत के आदेश का पूरी तरह पालन नहीं किया जाता है तो अदालत इस पर कार्रवाई कर सकती है.
सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद कई राज्य इस पर गंभीर हुए हैं. और उन्होंने हलफनामा पेश करने का निर्णय लिया है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से पूछा है कि आप इस दिशा में क्या कार्रवाई कर रहे हैं. इसका स्पष्ट हलफनामा प्रस्तुत करिए. कुछ राज्यों के द्वारा ऐसा किया भी गया है. परंतु उनमें सच्चाई कम और हवा हवाई बातें ज्यादा है.
पीठ ने माना है कि असम राज्य को छोड़कर किसी भी राज्य ने आवारा कुत्तों के काटने की घटनाओं का ब्यौरा नहीं दिया है जबकि असम राज्य द्वारा कुत्तों के काटने के मामले में दिए गए ब्यौरे पर हैरानी भी जताई है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 2024 में कुत्तों के काटने की 1.66 लाख घटनाएं हुई थी और 2025 में सिर्फ जनवरी महीने में ही 20,900 घटनाएं हुई. इस पर आश्चर्य व्यक्त किया गया है.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सवाल उठ रहा है कि आखिर यह कुत्ते कब तक ‘इंसान’ बनेंगे. जहां तक सिलीगुड़ी समेत पूरे प्रदेश की बात है तो जब तक यहां विधानसभा के चुनाव नहीं हो जाते तब तक सरकार और सरकारी मशीनरी तंत्र के पास इन कुत्तों के लिए समय नहीं है. सिलीगुड़ी नगर निगम से लेकर पूरा प्रशासनिक तंत्र इस समय चुनाव की तैयारी में जुटा हुआ है. किसी को भी इन कुत्तों की कोई फिक्र नहीं है.अब देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों में क्या फैसला लेता है.
