February 21, 2026
Sevoke Road, Siliguri
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सिलीगुड़ी में आवारा कुत्तों को कब मिलेगा आश्रय! कुत्ते कब बनेंगे ‘इंसान’!

सिलीगुड़ी का झंकार मोड़ हो या बर्दवान रोड, जिला अस्पताल हो या मेडिकल कॉलेज अस्पताल, हाट बाजार हो या स्कूल कॉलेज—इन जगहों पर अगर आप देखें तो इधर-उधर घूमते आवारा कुत्ते जरूर दिखाई देंगे। ये कुत्ते शहर की उस सच्चाई को दिखाते हैं, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। दिन भर भोजन की तलाश, रात को सुरक्षित जगह की खोज और हर समय अनिश्चित जीवन—यही कुत्तों की दिनचर्या है।

शाम ढलते ही इन कुत्तों की मौजूदगी अधिक नजर आने लगती है। असल में यह वही समय होता है जब शहर की हलचल कम हो जाती है और कुत्ते बाहर निकलकर अपने लिए जगह तलाशते हैं। बस्ती क्षेत्रों में इनकी संख्या इसलिए अधिक दिखती है क्योंकि यही इलाके इनके लिए थोड़ी बहुत सुरक्षा और भोजन का सहारा बनते हैं। डर का माहौल इंसानों में होता है, लेकिन यह डर कुत्तों के आक्रामक स्वभाव से ज्यादा प्रशासनिक विफलता का परिणाम है।

कुत्तों के बारे में कहा जाता है कि वे बेहद वफादार होते हैं। यही वजह है कि हजारों परिवार आज भी उन्हें अपने घर का सदस्य बनाकर पालते हैं। सिलीगुड़ी में भी ऐसा एक बड़ा वर्ग है जो कुत्तों की सेवा करता है, उन्हें खाना देता है और बीमार होने पर इलाज कराता है। लेकिन इसी शहर में बड़ी संख्या में ऐसे कुत्ते भी हैं जिनका कोई घर नहीं, कोई जिम्मेदार नहीं। ये कुत्ते आवारा नहीं, बल्कि मानव व्यवस्था द्वारा छोड़े गए जीव हैं।

इन कुत्तों की संख्या बढ़ने का कारण उनका स्वभाव नहीं, बल्कि नसबंदी, टीकाकरण और आश्रय की कमी है। जब कुत्ते भूखे होते हैं, बीमार होते हैं या डर के माहौल में जीते हैं, तब उनका व्यवहार भी असामान्य हो जाता है। कुत्तों के काटने की घटनाएं इसी उपेक्षा का नतीजा हैं। जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में इलाज के लिए पहुंचने वाले लोग इस समस्या की गंभीरता को दिखाते हैं, लेकिन समाधान अब तक अधूरा ही रहा है।

कुछ वर्ष पहले सिलीगुड़ी नगर निगम ने आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण के जरिए उनकी संख्या नियंत्रित करने की कोशिश की थी। यह पहल सही दिशा में थी, लेकिन संसाधनों और निरंतरता की कमी के कारण यह प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो सका। कुत्तों को हटाना समाधान नहीं, बल्कि उन्हें संरक्षित करना ही स्थायी उपाय है।

अब सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों को लेकर एक मानवीय दृष्टिकोण अपनाया है। अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि इन कुत्तों को भी सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार है। “कुत्तों को इंसान बनाने” का अर्थ यह नहीं कि उन्हें इंसानों जैसा बनाया जाए, बल्कि यह कि उन्हें भी जीवन, सुरक्षा और देखभाल का हक मिले। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि हर राज्य में आवारा कुत्तों के लिए आश्रय केंद्र, नियमित टीकाकरण और व्यापक नसबंदी की व्यवस्था होनी चाहिए।

दुर्भाग्यवश, असम को छोड़कर अधिकांश राज्यों ने अब तक इस दिशा में गंभीर पहल नहीं की है। सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी इसी लापरवाही को लेकर है। अदालत ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि आदेशों की अनदेखी अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह नाराजगी कुत्तों के लिए नहीं, बल्कि उन व्यवस्थाओं के लिए है जो अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रही हैं।

अस्पताल, स्कूल, बस अड्डे और बाजार जैसे संस्थागत क्षेत्रों में कुत्तों की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि उनके लिए कोई निर्धारित सुरक्षित स्थान नहीं है। हाल ही में जलपाईगुड़ी के एक सरकारी अस्पताल की घटना, जिसमें एक कुत्ता मानव अंग लेकर घूमता दिखा, न केवल मानवता के लिए शर्मनाक है बल्कि यह कुत्तों की दुर्दशा को भी उजागर करती है। यह कुत्तों की क्रूरता नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था की संवेदनहीनता है।

इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि संस्थागत क्षेत्रों से कुत्तों को हटाया जाए, लेकिन उन्हें हटाने का मतलब सड़क पर छोड़ देना नहीं, बल्कि सुरक्षित आश्रय देना है। अदालत का उद्देश्य कुत्तों को दंडित करना नहीं, बल्कि उन्हें और इंसानों दोनों को सुरक्षित रखना है।

राज्यों से मांगा गया हलफनामा इसी जवाबदेही का हिस्सा है। हालांकि कई राज्यों के जवाब सिर्फ कागजी दावे साबित हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि कुत्तों के काटने के मामलों का सही और ईमानदार डेटा सिर्फ असम ने दिया है। 2024 में 1.66 लाख और 2025 के जनवरी महीने में 20,900 घटनाओं का आंकड़ा यह बताता है कि समस्या गंभीर है, लेकिन इसका समाधान संहार नहीं, सुधार है।

अब सवाल यह नहीं है कि कुत्ते कब “इंसान” बनेंगे, बल्कि यह है कि इंसान कब जिम्मेदार बनेंगे। सिलीगुड़ी समेत पूरे प्रदेश में चुनावी व्यस्तता के कारण प्रशासन का ध्यान फिलहाल इस मुद्दे से भटका हुआ है। लेकिन कुत्तों की जिंदगी चुनाव नहीं देखती। वे हर दिन उसी सड़कों पर जीते हैं, जहां हम गुजरते हैं।

अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख के बाद क्या सरकारें वास्तव में संवेदनशील और स्थायी समाधान की ओर बढ़ती हैं या फिर यह मुद्दा भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। क्योंकि सवाल सिर्फ कुत्तों का नहीं, हमारी इंसानियत का भी है।

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