बांग्लादेश का तीनबीघा कॉरिडोर घुसपैठ और तस्करी के लिए जाना जाता है. इस काॅरिडोर के आसपास रहने वाले ग्रामीण हमेशा आतंक के साए में जीते हैं. बांग्लादेशी घुसपैठिए इस कॉरिडोर के जरिए तस्करी और आपराधिक घटनाओं को अंजाम देते हैं. ग्रामीणों की शिकायत रहती है कि रात में भी उन्हें नींद नहीं आती है. कभी मवेशियों की चीत्कार तो कभी घुसपैठियों के शोर शराबे और हलचल से यह इलाका हमेशा अशांत बना रहता है.
दहग्राम और अंगार पोता दोनों गांव बांग्लादेश में स्थित हैं. हालांकि वहां तक पहुंचने के लिए वहां के लोगों को भारत की जमीन से होकर गुजरना पड़ता है. 1974 में तीन बीघा समझौता हुआ था. इसमें भारत ने बांग्लादेशी नागरिकों को आने जाने के लिए यह रास्ता दे दिया. हालांकि भारत ने वहां के लोगों की सुविधा के लिए यह गलियारा उपलब्ध कराया था. लेकिन बांग्लादेश के तस्करों और घुसपैठियों ने इस गलियारे का उपयोग अपने निजी हित के लिए करना शुरू कर दिया. यह भारत के लिए मुसीबत बन गया.
भारत और बांग्लादेश के बीच तीन बीघा कॉरिडोर की सुरक्षा को लेकर अनेक बार बैठकें हो चुकी है. दोनों देशों के बीच कांटेदार तार लगाने का फैसला पहले ही कर लिया गया था. लेकिन अंतर्राष्ट्रीय नियम और औपचारिकताओं की वजह से इस कार्य में विलंब हो रहा था. वर्तमान में जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. इससे स्थानीय लोगों में काफी खुशी देखी जा रही है. उन्हें लगता है कि बहुत जल्द बाड़बंदी शुरू होगी. इससे उन्हें सुरक्षा तो मिलेगी ही, साथ ही रात में उन्हें नींद भी अच्छी आएगी.
राज्य सरकार ने बाड़बंदी के लिए जो पहल की है, उससे इलाके में जमीन अधिग्रहण का कार्य शुरू हो चुका है. सीमा पर निगरानी रखने वाले बीएसएफ के अधिकारी भी इस कार्य में स्थानीय प्रशासन का सहयोग कर रहे हैं.
भारतीय ग्रामीण काफी समय से तीन बीघा कॉरिडोर पर कांटेदार बार लगाने की मांग करते आ रहे हैं. जब बांग्लादेश की सत्ता शेख हसीना के हाथ में थी, तब तक भारत को बांग्लादेश से कोई खतरा नहीं था. लेकिन शेख हसीना को अपदस्थ करने के बाद बांग्लादेश में बनी कट्टरपंथी सरकार ने भारत के खिलाफ साजिश करनी शुरू कर दी है. बांग्लादेश एक साजिश के तहत अपने लोगों को भारत में घुसपैठ करा रहा है. इस खुफिया जानकारी मिलने के बाद ही सरकार ने तीन बीघा कॉरिडोर के पास कांटेदार बाड़ लगाने का फैसला किया है.
भारत और बांग्लादेश के बीच 1974 में तीन बीघा समझौता हुआ था. तीनबीघा कॉरिडोर कूच बिहार जिले के मैखिली गंज इलाके में स्थित है. यह इलाका सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक चुनौती भरा रहा है. बांग्लादेश के दहग्राम और अंगार पोता गांव को उनकी मुख्य भूमि से जोड़ने के लिए भारत ने लगभग 178 मीटर लंबा और 85 मीटर चौड़ा रास्ता उपलब्ध कराया था. इसे ही तीन बीघा कहा गया. यह जमीन भारत की संप्रभुता में ही रही. भारत ने बांग्लादेश को पट्टे पर दे दिया था. 1992 में औपचारिक रूप से यह गलियारा बांग्लादेश को सौंप दिया गया.
शुरुआत में तो सब कुछ ठीक-ठाक रहा. तब उस समय यह रास्ता सिर्फ 6 घंटे के लिए खुलता था. बाद में इसे 12 घंटे बढ़ा दिया गया. 2011 में भारत और बांग्लादेश के बीच समझौते के बाद यह गलियारा 24 घंटे के लिए खोल दिया गया और तब से ही यहां बांग्लादेशी घुसपैठ और तस्करी का सिलसिला शुरू हुआ है. वर्तमान में यह गलियारा रोजाना 23 घंटे खुला रहता है और सिर्फ 1 घंटे के लिए बंद रहता है.
तीन बीघा गलियारे से बांग्लादेशी घुसपैठ और तस्करी की बढ़ती घटनाओं को लेकर ग्रामीणों ने अनेक बार अधिकारियों से यहां कांटेदार तार लगाने की मांग की थी. लेकिन सरकार ने तब इस पर खास तवज्जो नहीं दी थी. पर अब बदले हालात में बांग्लादेशी घुसपैठ को रोकने तथा तस्करी की घटनाओं पर नियंत्रण पाने के लिए कांटेदार तार लगाने का फैसला किया गया है.इससे स्थानीय निवासियों में काफी खुशी है. उम्मीद की जानी चाहिए कि तीन बीघा कॉरिडोर के पास कांटेदार बाड़ लगाने के बाद बांग्लादेशी घुसपैठ और तस्करी की घटनाओं में काफी कमी आएगी.