पश्चिम बंगाल में अंतिम मतदाता सूची से 6.25 लाख और मतदाताओं के नाम कटने की संभावना जताई जा रही है। राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी कार्यालय के सूत्रों के अनुसार, यदि ऐसा होता है तो मसौदा सूची से पहले ही हटाए जा चुके 58 लाख नामों को मिलाकर कुल 64.25 लाख नाम सूची से बाहर हो सकते हैं। यह मामला राज्य की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।
जानकारी के मुताबिक, जिन 6.25 लाख लोगों के नाम हटने की आशंका है, उनमें से अधिकांश SIR की सुनवाई प्रक्रिया में शामिल नहीं हुए। 14 फरवरी सुनवाई की अंतिम तिथि निर्धारित की गई थी, हालांकि एक दिन पहले ही अधिकांश स्थानों पर सुनवाई की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। जिन मतदाताओं ने निर्धारित समय में उपस्थित होकर अपने दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए, उनके नामों पर अब अंतिम निर्णय लिया जाना है।
चुनाव अधिकारियों के अनुसार, अब तक लगभग 1 करोड़ 23 लाख मतदाताओं के दस्तावेजों का सत्यापन किया जा चुका है। हालांकि 10 से 13 लाख ऐसे मतदाता हैं, जिन्होंने सुनवाई के दौरान दस्तावेज जमा किए, लेकिन उनके दस्तावेज अभी तक आयोग की वेबसाइट पर अपलोड नहीं हो सके हैं। 21 फरवरी तक सत्यापन की प्रक्रिया जारी रहेगी। अधिकारियों का कहना है कि सत्यापन के दौरान और भी नाम हटाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
इस बीच, ‘अनमैप्ड वोटर्स’ को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है। खासकर Murshidabad और South 24 Parganas के कुछ इलाकों में कथित तौर पर अवैध फार्म बांटे जाने के आरोप लगे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए चुनाव आयोग ने संबंधित जिला चुनाव अधिकारियों से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि उसकी ओर से ऐसा कोई फार्म जारी नहीं किया गया है।
बूथ स्तरीय अधिकारियों (बीएलओ) के एक वर्ग का दावा है कि कथित अवैध फार्म में ‘अनमैप्ड वोटर्स’ से एक घोषणा पत्र भरवाया जा रहा था, जिसमें यह उल्लेख करना होता है कि उनके पास या उनके परिवार के किसी सदस्य के पास वर्ष 2002 का कोई दस्तावेज या चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित 13 मान्य दस्तावेजों में से कोई उपलब्ध नहीं है, लेकिन वे लंबे समय से संबंधित क्षेत्र में निवास कर रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, राज्य में वर्तमान में लगभग 32 लाख ‘अनमैप्ड वोटर्स’ चिन्हित किए गए हैं। इन मतदाताओं की स्थिति स्पष्ट करने और वैध दस्तावेजों के आधार पर सूची को अद्यतन करने की प्रक्रिया जारी है। चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची की शुद्धता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है।
राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दी हैं। जहां कुछ दल इसे मतदाता सूची को शुद्ध करने की नियमित प्रक्रिया बता रहे हैं, वहीं अन्य दल इतने बड़े पैमाने पर नाम कटने को लेकर सवाल उठा रहे हैं। आने वाले दिनों में सत्यापन प्रक्रिया पूरी होने के बाद स्थिति और स्पष्ट होने की संभावना है।
