March 5, 2026
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बिहार में सत्ता परिवर्तन का बंगाल चुनाव पर कितना असर होगा!

बिहार में सत्ता परिवर्तन ऐसे समय में हो रहा है, जब बंगाल में चुनाव है.बिहार और बंगाल दोनों ही पड़ोसी राज्य हैं. दोनों ही राज्यों की संस्कृति और राजनीति एक दूसरे के बगैर अधूरी है. अत:दोनों ही राज्यों के चुनाव का असर एक दूसरे राज्य पर ना हो, ऐसा मुमकिन नहीं है. चुनाव के समय दोनों ही राज्य पड़ोसी राज्य की जीत की रणनीति से प्रभावित होते हैं निकालते हैं और चुनावी रणनीति में बदलाव करते हैं.

जैसे कि हाल ही में संपन्न बिहार चुनाव में नीतीश कुमार की जीत की रणनीति को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बंगाल में अपनाया है.अब बिहार में सत्ता परिवर्तन होने जा रहा है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कभी भी अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं. उन्होंने राज्यसभा उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन भी दाखिल कर दिया है. मुख्यमंत्री के कुर्सी छोड़ने के अचानक फैसले के बाद जदयू में बगावत जरूर शुरू हो गई है. लेकिन नीतीश कुमार अपने दृढ़ संकल्प के लिए भी जाने जाते रहे हैं. अब सवाल यह है कि नीतीश कुमार के मुख्य मंत्री पद छोड़ने के बाद बिहार की सत्ता किसके हाथ में जाने वाली है?

जाहिर है कि भाजपा सत्ता में आएगी. यानी भाजपा का ही कोई मुख्यमंत्री होगा. इसमें कोई संदेह नहीं है. अगर बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री चेहरा सामने आता है, तो आसानी से समझा जा सकता है कि बंगाल चुनाव में भाजपा इसका इस्तेमाल अपने तरीके से कर सकती है, जो कि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री रहते संभव नहीं था. बंगाल चुनाव के समय बंगाल भाजपा को बिहार सरकार से सभी तरह की सुविधाएं, जैसे धनबल, बाहुबल, शस्त्रबल इत्यादि मिल सकती है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अक्सर आरोप लगाती हैं कि बंगाल में चुनावी हिंसा भड़काने में बाहरी लोगों का हाथ होता है. खासकर उनका इशारा बिहार की ओर होता है.

दोनों ही राज्यों की खुली सीमा अपराध को भी बढ़ावा देती है. पश्चिम बंगाल में पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भी टीएमसी की ओर से आरोप लगाया गया था कि यहां धांधली और गुंडागर्दी बिहार और उत्तर प्रदेश से आए लोगों के कारण हुई थी. अब जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बीजेपी का ही हो तो जाहिर है कि यह मुद्दा टीएमसी की ओर से जोर-शोर से उठाया जाएगा. कानून और व्यवस्था का भी सवाल उठेगा. बंगाल में चुनाव हिंसा और रक्तपात से अलग नहीं होता है. बिहार में सत्ता परिवर्तन का भी इस पर असर होगा.

राजनीतिक पंडितो और विश्लेषको के अनुसार भारतीय जनता पार्टी बंगाल में चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. असम, बिहार से घिरा पश्चिम बंगाल राज्य की राजनीति दोनों ही राज्यों की सत्ता से प्रभावित रहती है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी ईमानदार छवि के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने अपने राज्य में गलत कामों को कभी बढ़ावा नहीं दिया. एक बार जब उन्होंने संकल्प कर लिया कि राज्य में शराबबंदी होगी तो शराबबंदी हो गई. भले ही बिहार को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है. बीजेपी यह चाहती है कि राज्य के खजाने को बढ़ाने के लिए शराबबंदी को वापस लिया जाए. परंतु नीतीश कुमार के रहते यह कतई मुमकिन नहीं है.

लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. राज्य की सत्ता बीजेपी के हाथ में आ गई है. ऐसे में यह भी कयास लगाया जा रहा है कि बिहार में शराबबंदी को वापस ले लिया जाएगा. अगर बंगाल चुनाव से पहले बिहार में शराबबंदी को वापस लिया जाता है तो बंगाल चुनाव के समय यहां हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता का खतरा बढ़ जाएगा. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए भले ही यह एक पड़ोसी राज्य का मामला हो, परंतु उन्हें इसे साधारण तरीके से लेने की भूल नहीं करनी चाहिए.

ममता बनर्जी बंगाल चुनाव में अपनी जीत के प्रति आश्वस्त हैं. लेकिन उन्हें ओवर कॉन्फिडेंस से बचना चाहिए. क्योंकि तूफान आने से पहले शांति रहती है. भाजपा की रणनीति कछुए और खरगोश की तरह है.TMC भाजपा को कछुआ माने या खरगोश, लेकिन बिहार में बदल रहे हालात बंगाल में ममता बनर्जी के लिए शुभ संकेत नहीं है. भाजपा से उनकी चुनौतियां और बढ़ने वाली है. यह अलग बात है कि बिहार में सत्ता परिवर्तन का बिहार की राजनीति पर क्या असर होगा, लेकिन इतना तो तय है कि बंगाल की राजनीति और खासकर बंगाल का चुनाव इससे जरूर प्रभावित होने वाला है. और ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ा सकता है.

कहा तो यह भी जा रहा है कि बंगाल में चुनाव जीतने का एजेंडा बिहार में ही तय किया जाएगा. बिहार में ही यह रणनीति बनाई जाएगी कि बंगाल चुनाव भाजपा कैसे जीते. बंगाल भाजपा को सत्ता दिलाने के लिए बिहार और बंगाल सरकार का चाणक्य अंदाज भी सामने आ सकता है. टीएमसी को भनक भी नहीं लगेगी और ऊंट अपनी करवट ले ले सकता है. कुछ लोग तो यह भी कह रहे हैं कि भाजपा की राजनीति के चाणक्य गुरु कहे जाने वाले अमित शाह की यह एक सोची समझी रणनीति है. दुश्मन को मात देने के लिए कभी-कभी उल्टी चाल भी चलनी पड़ती है. पर बीजेपी की यह कौन सी रणनीति और कौन सी चाल है, यह स्पष्ट नहीं हो रही है. बहरहाल आने वाले समय में तस्वीर जरूर साफ हो जाएगी.

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