April 8, 2026
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क्या आप महिला की ब्लैकमेलिंग के शिकार हैं? अदालत का यह फैसला आपके लिए है!

आजकल एक शब्द तेजी से गूंज रहा है. लिव- इन- रिलेशनशिप. हालांकि शब्द कोई नया नहीं है. पहले से ही चला आ रहा है. लेकिन आज लिव इन रिलेशनशिप की चर्चा इसलिए है कि इसकी आड़ में अक्सर ब्लैकमेलिंग अथवा विभिन्न आरोप लगाकर आरोपी को अपराधी की श्रेणी में ला खड़ा किया जाता है और उसे मजबूर किया जाता है कि वह महिला की मांग को पूरा कर सके. अगर वह ऐसा नहीं करता है तो उसे अदालत में घसीट लेने की धमकी दी जाती है.

लिव इन रिलेशनशिप हो या इस तरह के और भी कई मामले हो सकते हैं, जहां पुरुष को बलि का बकरा बनाया जाता है. पुलिस महिला की एक तरफा बात सुनती है और उसकी रिपोर्ट के आधार पर आरोपी की गिरफ्तारी से लेकर जेल की हवा तक खिला सकती है. बरसों पहले सिलीगुड़ी में इस तरह के मामले सामने भी आए थे. आज यह मामला काफी उछल रहा है. आपके साथ भी इस तरह की घटना हो सकती है. इसलिए यह जानना आपके लिए जरूरी है.

लिव इन रिलेशनशिप के मामलों में अक्सर पुरुष को ही झेलना पड़ता है. महिला उसे ब्लैकमेल कर सकती है. उसे अदालत में घसीटने की चुनौती दे सकती है. उससे अनाप-शनाप मांग कर सकती है और इस तरह से उसे काफी मजबूर कर सकती है. आज देश के विभिन्न शहरों और महानगरों तथा इलाकों से इस तरह के केस अदालत में काफी पहुंच रहे हैं, जहां पुरुष को जेल जाने के डर से लेकर उसे काफी आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है.

अदालत ने इस स्थिति को समझा है और उन लोगों को राहत दे दी है, जो आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाते हैं और महिला के ब्लैकमेल का शिकार होते हैं. आज इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से स्पष्ट हो गया है कि ऐसे मामलों में महिला आरोपी को अपराधी नहीं बना सकती है. कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है. क्योंकि उसके खिलाफ अपराध के लायक कोई मामला बनता ही नहीं. यह मामला कुछ उसी तरह से है, जिस तरह से बंगाल के चर्चित मामले विश्व ज्योति चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था.

ताजा मामला उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले का है, जहां एक थाने में महिलाओं ने आरोपियों के खिलाफ एक तरफा मुकदमा दर्ज कराया था. दर्ज कराई गई प्राथमिकी के आधार पर पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ बीएनएस की धारा 69 और अनुसूचित जाति जनजाति एक्ट की अलग-अलग धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था. दर्ज कराई गई रिपोर्ट के अनुसार आरोपियों ने शादी का झूठा वादा करके महिलाओं से शारीरिक संबंध बनाये. उसके आधार पर पुलिस ने जांच शुरू कर दी है.

आज खंडपीठ ने दोनों पक्षों के वकीलों को सुनने के बाद आरोपियों की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है. महिला और आरोपी पिछले 5 साल से लिव इन रिलेशनशिप में थे. 2 साल से ज्यादा समय तक दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी रहे. दोनों वर्तमान में पति-पत्नी भी है. इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ ने आरोपियों की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है. पीड़िता एक वयस्क महिला है और उसने अपनी मर्जी से संबंध बनाए थे. ना कि उस पर दबाव डाला गया था. इसलिए वह शादी का झूठा वादा मानकर आरोपी को अपराध के दायरे में नहीं रख सकती. क्योंकि यह कोई अपराध ही नहीं है.

न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा और न्याय मूर्ति पदम नारायण मिश्र की खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि पुलिस अपनी जांच जारी रख सकती है. अदालत ने राज्य सरकार और शिकायतकर्ता महिलाओं से 6 सप्ताह के अंदर लिखित जवाब मांगा है. कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उसकी अनुमति के बिना चार्जशीट या अंतिम रिपोर्ट पुलिस दाखिल नहीं कर सकेगी. इस मामले की अगली सुनवाई 29 मई को होनी है.

कोर्ट का यह फैसला ऐसे मामलों में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है जहां लंबे समय से सहमति के आधार पर रिश्ते बनाए जाते हैं और जब शादी का वादा टूट जाता है तो आरोपी पर केस दर्ज होता है. इलाहाबाद हाई कोर्ट की बेंच ने साफ कहा है कि अगर सहमति के आधार पर संबंध बनाए जाते हैं और दोनों ही बालिग हैं तो इस मामले को सीधे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.

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