नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने सत्ता संभालते ही कई ऐसे महत्वपूर्ण फैसले लिए, जिसके बाद उन्हें नेपाल में नायक समझा जाने लगा. देखते ही देखते बालेन शाह नेपाल की जनता के हीरो बन गए.
बालेन शाह का ताजा फैसला सुर्खियों में है. उन्होंने अब सरकारी कर्मचारियों को महीने में दो बार वेतन देने का फैसला किया है. नेपाल सरकार की ओर से बताया गया है कि यह फैसला अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए लिया गया है. अगर यह नियम लागू होता है तो 15 दिनों में सरकारी कर्मचारियों को वेतन मिलेगा.
एक पर एक लिए जा रहे नेपाल सरकार के प्रधानमंत्री के फैसले ने एक तरफ जनता की वाहवाही बटोरी है तो दूसरी तरफ उनका भंसार शुल्क का फैसला जन आक्रोश का स्वरूप लेता जा रहा है. इसकी खिलाफत न केवल भारत में ही बल्कि नेपाल में भी हो रही है.
भारत और नेपाल में जो हालात बन गए हैं, उन स्थितियों में यही कहा जा सकता है कि इन दिनों उनके सितारे गर्दिश में चल रहे हैं. उन्होंने कुछ दिन पहले एक महत्वपूर्ण फैसला लिया जिसमें भारत से ₹100 से अधिक की खरीदारी करने पर नेपाल के नागरिकों पर भंसार शुल्क लगाने का फैसला किया था.
उनके इस फैसले की भारत समेत नेपाल में भी आलोचना होने लगी है. नेपाल की जनता के बीच विरोध के स्वर बुलंद होने लगे हैं. यहां तक कि नेपाल सरकार में सहयोगी पार्टी के कुछ सांसद भी विरोध पर उतर आए हैं.
भारत और नेपाल का रिश्ता रोटी और बेटी का रिश्ता है. दोनों देशों के नागरिक आवागमन करते हैं और खरीदारी भी करते हैं. नेपाल सरकार ने भारत से नेपाल जाने वालों और सामान ले जाने वालों पर कस्टम नियम लागू कर दिए हैं. यह ना तो भारत के लोगों को पसंद आ रहा है और ना ही नेपाल के नागरिकों को. इसीलिए प्रधानमंत्री का विरोध शुरू हो गया है.
नेपाल सरकार के नियमों के अनुसार ₹100 से अधिक का सामान लेकर नेपाल में प्रवेश करने पर भंसार शुल्क देना अनिवार्य होगा. अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपका सामान जब्त कर लिया जाएगा. इस नियम के लागू हो जाने से दोनों देशों के संबंधों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है.
नेपाल की सीमा सिलीगुड़ी के नजदीक पानी टंकी पर लगती है तो बिहार में कई किलोमीटर तक नेपाल और बिहार की सीमा खुली है. बिहार में जन अधिकार पार्टी का जोरदार प्रदर्शन शुरू हो गया है. जन अधिकार पार्टी ने नेपाल सरकार के फैसले की निंदा की है.
लोगों का कहना है कि भारत और नेपाल के बीच पुराना संबंध है. राजस्व वसूली के नाम पर नेपाल सरकार दोनों देशों की भावनाओं पर चोट पहुंचा रही है. आरोप है कि सरकार का यह फैसला सीमावर्ती क्षेत्र के मधेशी नागरिकों को मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए लिया गया है.
लोगों का यह भी कहना है कि मधेशी मूल का प्रधानमंत्री बनने पर यहां की जनता में जो भारी उत्साह था, वह खत्म हो गया है. क्योंकि सरकार ने बहुत ही कठोर नियम लागू किया है. नेपाली कांग्रेस ने भी सरकार के इस फैसले पर आपत्ति जताई है. जनता समाजवादी पार्टी के महंथ ठाकुर ने इस नीति को नेपाल भारत के बीच ऐतिहासिक, आर्थिक और सामाजिक संबंधों पर प्रहार बताया है.
राष्ट्रीय एकता दल के अध्यक्ष विनय यादव ने सरकार के इस फैसले को 1950 की शांति एवं मैत्री संधि की भावनाओं के खिलाफ बताया है. लायंस क्लब आफ पोखरिया ने भी इसे नागरिकों के लिए मानसिक प्रताड़ना करार दिया है.
नेपाल में केवल विपक्षी पार्टियां ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के सांसदों ने भी इस नीति के खिलाफ प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से मिलकर इस पर पुनर्विचार करने की योजना बनाई है.
नेपाल के काठमांडू में मधेशी युवाओं ने सरकार के इस फैसले के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. सरकार की भंसार नीति में कई वस्तुओं पर 50% से लेकर 80% तक टैक्स वसूला जा रहा है.
आंदोलनकारियों ने सरकार को स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर नेपाल की सरकार ने अपने फैसले को वापस नहीं लिया तो यह जन आक्रोश जल्द ही एक बड़े जन आंदोलन का स्वरूप ले लेगा.

