May 14, 2026
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वकील ममता बनर्जी! माया मिली न राम!

पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कुर्सी गई. अपनी सीट भी बचा ना सकी और अब वकील बनकर बंगाल का मुकदमा लडने हाई कोर्ट पहुंच गई. लेकिन ममता बनर्जी का दुर्भाग्य यहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा. हाई कोर्ट के वकीलों ने उन्हें देखकर चोर-चोर कहा. बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया ने उनसे प्रैक्टिस और एनरोलमेंट का हिसाब भी मांग लिया. इतना ही नहीं उन्हें नोटिस भेज कर दो दिनों में ब्यौरा मांगा है.

आपको याद होगा, जब ममता बनर्जी मुख्यमंत्री थी, तब SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने पहुंच गई थी. उन्होंने चीफ जस्टिस के सामने अपनी दलील रखी, लेकिन तब ना तो उनसे प्रैक्टिस और ना ही इनरोलमेंट का हिसाब मांगा गया था. यह घटना कोई ज्यादा दिन नहीं, विधानसभा चुनाव से पहले की है. तब ममता बनर्जी की इस मुद्दे को लेकर काफी चर्चा हुई थी और वह रातों-रात सुर्खियो में आ गई थी.

लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी है. जब सत्ता चली जाती है, तब अपने भी साथ छोड़ जाते हैं. बंगाल विधानसभा चुनाव में अपनी सत्ता गंवाने के बाद ममता बनर्जी ने कहा था कि अब वह दिल्ली की राजनीति करेगी और तमाम विपक्षी दलों को एकजुट करके भाजपा के खिलाफ लड़ाई लडेगी. लेकिन यहां भी उन्हें मुंह की खानी पड़ी. कांग्रेस और वाम दलों ने उनसे किनारा कर लिया. कहा कि बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में उन्हें ममता बनर्जी की जरूरत नहीं है.

सत्ता गंवाने के बाद ममता बनर्जी कभी सड़कों पर आंदोलन की बात करती है, तो कभी वकील बनकर बंगाल चुनाव में हिंसा को मुद्दा बनाकर हाई कोर्ट पहुंच जाती है और हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष अपनी दलील रखती है. लेकिन ममता बनर्जी यह भूल जाती है कि 2021 चुनाव के बाद हुई हिंसा में बीजेपी के 56 कार्यकर्ता मारे गए थे और कई भाजपा समर्थित लोगों ने अपने घर से बेदखल होकर काफी समय के लिए बंगाल छोड़कर भाजपा शासित राज्यों में रहना शुरू कर दिया था.

यह बात हम नहीं बल्कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य कहते हैं. उन्होंने कहा कि तब ममता बनर्जी ने हाई कोर्ट या किसी भी कोर्ट में चुनाव बाद हिंसा पर दलील रखने की जरूरत नहीं समझी थी. कदाचित यही कारण है कि जब ममता बनर्जी वकील के गेट अप में हाईकोर्ट पहुंची, तब पश्चिम बंगाल बार काउंसिल के वकीलों ने उनका मजाक उड़ाया था.

आज ममता बनर्जी की हालत यह है कि उनकी ही पार्टी में बगावत शुरू हो चुकी है. पार्टी के बहुत से नेता और विधायक कब उनका साथ छोड़ दें, यह कोई नहीं जानता है. एक कहावत सोलह आने सही है कि जब आदमी का समय साथ छोड़ देता है, तो अपने भी उससे दूर होते जाते हैं. मौजूदा समय में ममता बनर्जी भी अलग-थलग पड़ती जा रही है.

पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास इस बात का गवाह है कि यहां एक बार सत्ता से बाहर होने के बाद कोई भी पार्टी दोबारा सत्ता के करीब नहीं पहुंच सकी. आजादी के बाद से यहां कांग्रेस की लंबे समय तक सत्ता रही. लेकिन कांग्रेस ने सत्ता गंवायी तो वामदलों ने दोबारा कांग्रेस को यह मौका नहीं दिया. 34 सालों तक शासन किया. कांग्रेस दोबारा बंगाल की कुर्सी पर बैठने की कवायद करती रही. लेकिन वह सफल नहीं हो सकी.

और जब वाम दलों की कुर्सी गई तो टीएमसी ने वाम मोर्चा को फिर से खड़ा होने का मौका नहीं दिया. आज राज्य में वाममोर्चा की हालत क्या है, यह बताने की जरूरत नहीं है. वाम दलों की हालत यह है कि वह ना तीन में है और ना तेरह में. वाम मोर्चा अब इतिहास बनता जा रहा है. 15 वर्षों तक टीएमसी का शासन रहा. भाजपा ने टीएमसी को बेदखल कर दिया है तो टीएमसी भी धीरे-धीरे कांग्रेस और वाम दलों की तरह ही बिखर जाएगी.

कम से कम राजनीतिक विश्लेषक तो यही बताते हैं. इस बात को ममता बनर्जी भी बखूबी समझती है और टीएमसी के विधायक और नेता भी. यही कारण है कि वे अपना राजनीतिक भविष्य भाजपा में तलाशने लगे हैं. भाजपा विधायक अर्जुन सिंह ने मीडिया के सामने कहा भी है कि एक दिन मदन दा भी टीएमसी से छिटक कर भाजपा में चले आएंगे.

हालांकि मदन मित्रा ने इस बात को हंसकर टाल दिया है, परंतु उनका ना मना करने का संकेत भी बहुत कुछ कहता है. मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी के खासम खास लोगों को अपना सिपहसालार नियुक्त कर लिया है. धीरे-धीरे ममता बनर्जी अपने ही लोगों से दूर होती चली जा रही है. अब ममता बनर्जी कौन सा रास्ता अपनाएगी? क्या वह पहले की तरह बाघिन बनकर सड़कों पर आंदोलन करेगी? या सामाजिक कार्यकर्ता बनकर लोगों की सेवा करेगी? राज्य विधानसभा में वह अब विपक्ष की नेता बनने की भी हैसियत गंवा चुकी है. ऐसे में उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं.

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