पिछले एक पखवाड़े में असम से लेकर अलीपुरद्वार, नेपाल व पहाड़ी इलाकों में भूकंप के झटके महसूस किए जा चुके हैं. भूकंप का केंद्र हिमालयन पट्टी बताया जा रहा है. आज भी नेपाल में 4.2 तीव्रता का भूकंप आया था. हालांकि जान माल के नुकसान की कोई खबर नहीं है.
इससे 3 दिन पहले अलीपुरद्वार में भी भूकंप के झटके महसूस किए गए थे. उससे पहले असम में भी भूकंप का झटका महसूस किया गया था. लेकिन अभी तक सिलीगुड़ी में आसपास में होने वाले भूकंप या प्राकृतिक आपदाओं के कारण कोई बडी हलचल नहीं दिखाई दे रही है.
तो क्या सिलीगुड़ी के लोग आसपास में होने वाले भूकंप तथा प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित हैं? इसका जवाब है नहीं. बल्कि सिलीगुड़ी के लिए यह एक गंभीर चेतावनी है. विशेषज्ञों का मानना है कि सिलीगुड़ी के आसपास होने वाली प्राकृतिक आपदाएं सिलीगुड़ी के लिए बड़ी मुसीबत बन सकती हैं. यह एक संकेत है जो आने वाले समय में सिलीगुड़ी के जान माल की सुरक्षा को गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकता है.
सिलीगुड़ी पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार माना जाता है. सिलीगुड़ी से नेपाल सटा हुआ है. सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग तथा सिक्किम जुड़ा हुआ है. इन क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाएं आती रहती हैं. क्योंकि ये सभी क्षेत्र हिमालय की पट्टी में आते रहते हैं, जो भूकंप के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है.
पहाड़ पर बसे नेपाल, तिब्बत तथा भारत के इन पर्वतीय शहरों के नीचे ही मैदानी क्षेत्र में सिलीगुड़ी स्थित है. चाहे नेपाल हो, सिक्किम या दार्जिलिंग के लिए सिलीगुड़ी व्यापारिक, पर्यटन और आर्थिक दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण शहर है. अगर सिलीगुड़ी के आसपास पहाड अथवा मैदानी इलाकों में स्थित शहर या इलाके तबाह होते हैं तो उसका असर किसी न किसी रूप में सिलीगुड़ी पर भी पड़ता है.
अगर पहाड़ में सड़कें बंद होती है तो सिलीगुड़ी में बाजार प्रभावित होता है, पहाड़ को सप्लाई रुक जाती है, सिलीगुड़ी में ट्रैफिक का दबाव बढ़ता है. सिलीगुड़ी के आसपास पर्यटक स्थल हैं. इनमें से ज्यादातर पर्यटक स्थल पहाड़ों पर स्थित है. पहाड़ पर आपदा का मतलब पर्यटन का प्रभावित होना. इससे सिलीगुड़ी में होटल, कारोबार ,टैक्सी कारोबार, पर्यटन से जुड़े छोटे कारोबारी और यहां तक कि बड़े कारोबारी भी प्रभावित हो जाते हैं. इस तरह से पहाड़ पर आपदा किसी न किसी रूप में सिलीगुड़ी को भी प्रभावित करती है.
पहाड़ी क्षेत्र में जान माल की तबाही का सबसे बड़ा कारण भूकंप, ग्लेशियर पिघलना,भारी बारिश, भूस्खलन और फ्लैश फ्लड होता है. इन सभी का आपस में गहरा संबंध है. हिमालय से सटे पहाड़ी इलाकों में भूकंप का आना कोई बड़ी बात नहीं है. लगातर बारिश, ग्लेशियर पिघलने, भूस्खलन के बीच पहाड़ की चट्टाने कमजोर पड़ जाती हैं. इसके फल स्वरूप मलबा नदी में गिरकर नदी का रास्ता अवरुद्ध कर देता है. जहां मलबा गिरता है, वहां एक अस्थाई जलाशय बन जाता है, जो बाद में प्राकृतिक आपदा में टूटकर फ्लैश फ्लड का रूप ले लेता है. हाल ही में नेपाल में ऐसा ही हुआ था.
हालांकि नेपाल की प्राकृतिक आपदा का सिलीगुड़ी पर् प्रत्यक्ष रूप से ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा था. लेकिन व्यापार और पर्यटन के क्षेत्र में इसका भारी प्रभाव पड़ा. नेपाल की आपदा से सिलीगुड़ी में जान माल का कोई नुकसान नहीं हुआ था. क्योंकि नेपाल की तबाही अधिकतर बिहार और यूपी होकर गुजर गई. परंतु अगर यह प्राकृतिक आपदा दार्जिलिंग, सिक्किम आदि क्षेत्रों में आती है तो तराई में स्थित होने के चलते सिलीगुड़ी को भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है.
विशेषज्ञों की चेतावनी से ऐसा संकेत मिल रहा है कि पहाड़ से उत्तर बंगाल के मैदानी क्षेत्रों में बहने वाली महानंदा, तीस्ता आदि नदियों में फ्लैश फ्लड का खतरा बढ़ गया है. एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दार्जिलिंग से लेकर सिक्किम तक प्राकृतिक आपदाओं के मामले में अत्यंत संवेदनशील है. यहां की भौगोलिक स्थिति और कमजोर चट्टानें ऐसी है जो कभी भी भूकंप- ग्लेशियर- भारी बारिश- और भूस्खलन के बीच घर्षण करके नदियों में फ्लैश फ्लड ला सकती है. इसका भले ही पहाड़ पर कोई बड़ा असर ना हो, लेकिन पहाड़ की तलहटी में बसे सिलीगुड़ी के जान माल के लिए यह बड़ा खतरा है.
