किताबों और धर्म ग्रंथो में सुर और असुर के संघर्ष की कथाएं पढ़ी- सुनी जाती हैं. धार्मिक पुस्तकों में सतयुग में सुरों पर असुरों का अत्याचार व उत्पीड़न का वर्णन मिलता है. लेकिन तब से कई युग बदल गए. कई पीढियां समाप्त हो गई. ना स्थान रहा और न ही समय. बच गई है किंवदन्तियां.
विज्ञान के इस युग में समय के साथ पुरानी बातें दफन हो गई है. लेकिन आज भी हमारे आसपास में ऐसे लोग भी रहते हैं, जो प्राचीन काल के किसी समुदाय या जाति से जुड़कर जीना पसंद करते हैं और उस पर गर्व भी करते हैं. उदाहरण के लिए असुर लोग जो प्राचीन काल में सुरों पर अत्याचार करते थे. सिलीगुड़ी के निकट नागराकाटा, मटेली आदि के विभिन्न इलाकों में ऐसे परिवार निवास करते हैं, जो खुद को असुर का वंशज मानते हैं और सदियों पुरानी असुर परंपरा का निर्वाह करते आ रहे हैं.
भले ही आज के दौर में नई पीढ़ी में इतिहास, पुराण और वैदिक ग्रंथों की चमक फीकी पडती जा रही हो, परंतु पुराने लोगों की परंपराएं और मान्यताएं सदियों से चली आ रही हैं . दशहरा और दुर्गा पूजा के दौरान जहां एक तरफ पूरा देश मां दुर्गा की आराधना और भक्ति में लीन नजर आता है, तो दूसरी तरफ इसी देश में ऐसे लोग भी रहते हैं जो मां दुर्गा की आराधना नहीं करते, बल्कि इस दौरान शोक मनाते हैं. वे मानते हैं कि दुर्गा जी ने महिषासुर का वध किया था. ऐसे लोग खुद को महिषासुर का वंशज मानते हैं और यही कारण है कि वे पूजा के दौरान शोक मनाते हैं.
आमतौर पर विजयादशमी पर पूरे भारत में रावण के पुतले दहन किये जाते हैं. राम और रावण के संघर्ष में रावण की मृत्यु हुई थी. इसी के उपलक्ष में विजयादशमी का त्यौहार मनाया जाता है. विजयादशमी पर रावण के पुतलों का दहन किया जाता है. लेकिन इसी देश में ऐसे लोग भी रहते हैं, जो राम की नहीं बल्कि रावण की पूजा करते हैं.
सामान्य रूप से असुर शब्द का अर्थ राक्षस से लिया जाता है. राक्षस यानी अत्याचारी और अविवेकी लोग. परंतु सिलीगुड़ी के नजदीक केरण चाय बागान और कारी लाइन में रहने वाले असुर ऐसे नहीं है. वे न तो अत्याचारी हैं और ना ही अविवेकी. वे भोले भाले लोग हैं. परंतु उन्हें अपनी परंपरा से प्यार है. बड़े बुजुर्गों और पीढियों से चली आ रही मान्यताओं में विश्वास करते हैं. इसके अनुसार वह खुद को असुर जनजाति या समुदाय का वंशज मानते हैं. ऐसे लोग मां दुर्गा की नहीं बल्कि महिषासुर की पूजा करते हैं.
नागराकाटा के ये असुर क्या अब भी मां दुर्गा की पूजा नहीं करते हैं और महिषासुर की पूजा करते हैं? वर्तमान में यहां कुछ बदलाव तो जरूर आया है. शिक्षा एवं आधुनिकता के साथ लोगों के विचार भी बदले हैं. लेकिन यह बदलाव नई पीढ़ी में ज्यादा देखा जा रहा है. जबकि पुरानी पीढ़ी के लोग आज भी सपनों की दुनिया में जी रहे हैं और खुद को असुर वंशज का बता कर अपने पूर्वजों की सिखाई बातों को परंपरा के रूप में पालन कर रहे हैं.
कोई ज्यादा समय नहीं हुआ. एक दशक पहले नागराकाटा में जब दुर्गा पूजा के दौरान ढाक की आवाज आती थी तो असुर समुदाय के लोग अपने घर के दरवाजे बंद कर लेते थे और अपने कानों में उंगली डाल लेते थे, ताकि वे ढाक की पवित्र आवाज को नहीं सुन सके. यह भी कहा जाता है कि दुर्गा पूजा प्रतिमाओं का दर्शन करने को कौन कहे, पंडालों में ना तो वह स्वयं जाते थे और ना ही बच्चों को भेजते थे. क्योंकि यह उनकी परंपरा के खिलाफ होता था. ऐसी मान्यता थी कि इससे उनके पूर्वज नाराज हो जाएंगे.
नागराकाटा के विभिन्न इलाकों में असुर जनजाति के लोग निवास करते हैं. अकेले केरण चाय बागान में कम से कम 150 असुर जनजाति परिवार निवास करते हैं. वे सभी महिषासुर को अपना पूर्वज बताते हैं. वहीं कारी लाइन में असुर समुदाय का 50 परिवार निवास करता है. इसके अलावा मैटिली में भी कई असुर परिवार रहते हैं. वे बताते हैं कि एक समय जब लोग मां दुर्गा की प्रतिमा को अपने कंधे पर रखकर घर घर घुमाते थे तब असुर लोग अपने घरों के दरवाजे बंद कर लेते थे और उदास होकर अपने पूर्वज की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते थे.
देवी दुर्गा ने असुरों से संग्राम करके पृथ्वी पर सत्य की रक्षा की थी. उन्होंने राक्षसों का वध करके प्राणियों की रक्षा की थी. उन्होंने महिषासुर नामक बड़े अत्याचारी असुर का वध किया था. असुर जनजाति के लोग इस दौरान अपने पूर्वज का शोक मनाते हैं और यही कारण है कि ना तो वे देवी दुर्गा की प्रतिमा देखना पसंद करते हैं और ना ही पंडालों में जाना उन्हें अच्छा लगता है.
हालांकि अब स्थितियां बदल चुकी हैं. नई पीढी के पढ़े-लिखे बच्चे न केवल पंडालों में जा रहे हैं बल्कि अपने साथियों और दोस्तों के साथ त्यौहार का आनंद भी उठाते हैं. कुछ असुर ऐसे भी हैं जिन पर बदलती बयार का असर देखा जा सकता है. उन्होंने धीरे-धीरे पंडालों में जाना शुरू कर दिया है. उन्होंने दशहरा और पूजा का लुत्फ उठाना शुरू कर दिया है.
लेकिन इसके बावजूद अभी भी कुछ पुराने ख्याल के लोग हैं, बदलती हवाओं ने अब तक जिन पर कोई असर नहीं डाला है. बहर हाल विज्ञान के इस युग में कुछ ही असुर लोग ऐसे रह गए हैं जो सदियों पुरानी अपनी परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं. बाकी लोग परंपरा को केवल ढो रहे हैं. जबकि नई पीढ़ी के बच्चों को इन मान्यताओं में बंध कर जीना पसंद नहीं है.
