January 15, 2026
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क्या वाकई कठिन होता जा रहा है ममता बनर्जी का राजनीतिक डगर?

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इडी विवाद में कोलकाता हाई कोर्ट में सुनवाई के बाद राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी गई है. जाहिर है कि अब इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी. उधर राज्य में चल रहे SIR को लेकर चुनाव आयोग के खिलाफ ममता बनर्जी ने कमर कस ली है. मुख्यमंत्री का आरोप है कि SIR के नाम पर वोटर लिस्ट से महिला नाम को अधिक काटा जा रहा.

मुख्यमंत्री ने चुनाव आयोग पर आरोप लगाया है कि SIR के दौरान 54 लाख नाम एकतरफा तरीके से हटाए गए हैं. उन्होंने आरोप लगाया है कि भाजपा और निर्वाचन आयोग का गठजोड़ अंतिम मतदाता सूची से एक करोड़ और नाम हटाने की योजना बना रहा है. चुनाव आयोग की SIR सुनवाई के दौरान सिलीगुड़ी से लेकर कोलकाता तक मतदाताओं का रोज ही हंगामा हो रहा है. यह हंगामा इसलिए हो रहा है कि चुनाव आयोग के अधिकारी संपूर्ण रूप से कागजी कार्रवाई करना चाहते हैं और मतदाताओं के पास जो संपूर्ण है ,उनके लिए अपूर्ण है.

इस समय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को एक साथ कई मोर्चो पर लड़ना पड़ रहा है.उन्हें केंद्र सरकार और केंद्र की जांच एजेंसियों के अलावा चुनाव आयोग के साथ-साथ पार्टी के अंदर व्याप्त गुटबाजी को दूर करने के लिए भी लड़ाई लड़नी पड़ रही है. मुख्यमंत्री को अपनी महिला शक्ति पर ज्यादा भरोसा होता है. यही महिला शक्ति है जिसने 2021 के विधानसभा और 2025 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को मजबूती दिलाई है. उन्हें लगता है कि अब उसी महिला शक्ति को चुनाव आयोग उनसे छीन रहा है.

उनका ताजा आरोप है कि चुनाव आयोग जानबूझकर भाजपा के इशारे पर महिलाओं के नाम वोटर लिस्ट से काट रहा है. उन्होंने तर्क दिया है कि शादी के बाद जो महिला अपने ससुराल चली गई है, उनके सरनेम बदल गए हैं. ऐसी महिला का नाम चुनाव आयोग वोटर लिस्ट से हटा रहा है. ममता बनर्जी ने सवाल किया है कि शादी के बाद महिला का नाम पति के सरनेम से जुड़ जाता है, तो क्या महिला फर्जी वोटर है.

मुख्यमंत्री का सवाल वाजिब है. जिस तरह से चुनाव आयोग संपूर्ण कागजी कार्रवाई कर रहा है, ऐसे में अगर मुख्यमंत्री को यह आशंका है कि अंतिम मतदाता सूची से एक करोड़ और नाम हटाए जा सकते हैं तो कोई गलत नहीं है. क्योंकि मतदाता सभी वर्गों से हैं. बहुत से मतदाताओं के पास स्कूल सर्टिफिकेट नहीं है और ना ही उनके पास दूसरे कागजात हैं. हालांकि उन्होंने 2002 में भी वोट दिया था. पर उनके पास आवश्यक दस्तावेज नहीं है और इसके अभाव में उन्हें मतदाता सूची से बाहर किया जा रहा है.

चुनाव आयोग को ऐसे मतदाताओं की पहचान करने के लिए कागजों के अलावा BLO के जरिए जांच की कार्रवाई पूरी करनी चाहिए. यह सही है कि कागजात भी महत्वपूर्ण है. पर उसके लिए ना तो मतदाता के पास समय है और ना ही चुनाव आयोग के पास. इसलिए मध्य रास्ता अपनाना ही सही होगा.अगर चुनाव आयोग कुछ इस तरह के कदम उठाए तो टीएमसी और सभी विपक्षी पार्टियों का उसे सहयोग प्राप्त होगा. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव आयोग को दो महीने में पांच-पांच पत्र लिख चुकी है. अब देखना होगा कि चुनाव आयोग का अंतिम टर्निंग पॉइंट क्या होता है.

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारी लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रिया केवल कागजों तक ही सीमित होकर रह जाएगी? जहां तक ममता बनर्जी के राजनीतिक डगर की बात है तो जो लोग ममता बनर्जी को जानते हैं उन्हें अच्छी तरह पता है कि घोर अंधकार और विषम और मुश्किल हालात में भी ममता बनर्जी अपना डगर ढूंढने में एक्सपर्ट मानी जाती है. बाजी को पलटना उन्हें आता है. पर सवाल यह है कि क्या इस बार भी वह पिछली बार की तरह कुछ ऐसा ही करने वाली है?

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