पश्चिम बंगाल की एक परंपरा, जिसके बारे में बहुत कम लोगों को पता है, 1947 से चली आ रही है. यह परंपरा छुट्टी से जुड़ी हुई है. परंपरा के अनुसार दुर्गा पूजा के दौरान षष्ठी से लेकर लखी पूजा तक बंगाल सरकार के कर्मियों की छुट्टी रहती है. ताकि राज्य के कर्मचारी और अधिकारी निश्चिंत होकर दुर्गा पूजा उत्सव मना सके. इस क्रम में स्वास्थ्य कर्मी और डॉक्टर भी शामिल हैं.
अब बंगाल सरकार ने फैसला किया है कि दुर्गा पूजा के दौरान कम से कम सरकारी अस्पतालों में कर्मचारियों की छुट्टी नहीं रहेगी. यह अगले साल से लागू होगा. बंगाल सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अगले साल से षष्ठी से लेकर लक्ष्मी पूजा तक सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य कर्मियों को अपनी ड्यूटी देना अनिवार्य होगा.
आखिर बंगाल सरकार ने यह फैसला क्यों किया? सरकार ने क्यों कहा कि दुर्गा पूजा के दौरान सरकारी अस्पतालों में हर डॉक्टर और कर्मचारियों को अपनी ड्यूटी देना अनिवार्य होगा. आखिर राज्य सरकार पिछले 7 दशकों से अधिक समय से चली आ रही इस व्यवस्था को क्यों समाप्त कर रही है? तो इसका उद्देश्य दुर्गा पूजा के दौरान सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा सेवाओं को अधिक सक्रिय और प्रभावी बनाए रखना है.
हालांकि इसका एक बड़ा कारण यह है कि हाल ही में संपन्न दुर्गा पूजा से लेकर लखी पूजा तक सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा में लापरवाही तथा मरीजों की होने वाली मौत है. एक अनुमान के अनुसार दुर्गा पूजा के दौरान राज्य के सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा में लापरवाही के कारण सर्वाधिक रोगियों की मौत हुई है. मीडिया खबरों के अनुसार अकेले उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 6 दिनों में 127 मौतों का दावा किया जा रहा है.
एक प्रकाशित रिपोर्ट में दावा किया गया है कि उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती रोगियों में से 127 रोगियों की मौत केवल 6 दिनों में चिकित्सा में लापरवाही के कारण हुई. हालांकि उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल प्रशासन की ओर से लापरवाही की बात से साफ इनकार किया गया है और यह स्पष्टीकरण दिया गया है कि जिन रोगियों को यहां भर्ती के लिए लाया गया था, उनकी हालत काफी खराब थी.
उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल प्रशासन की ओर से कहा गया है कि इन रोगियों को सिलीगुड़ी के विभिन्न नर्सिंग होम या अस्पतालों से अत्यंत गंभीर अवस्था में इलाज के लिए यहां लाया गया था. उनकी चिकित्सा की गई. लेकिन उनमें से कई मरीज तो अस्पताल में भर्ती से पहले ही दम तोड़ चुके थे.
उत्तर बंगाल अस्पताल अधीक्षक की ओर से भी सफाई दी गई है कि अस्पताल प्रशासन से कहीं भी चूक नहीं हुई है. सारे जूनियर डॉक्टर ड्यूटी पर मुस्तैद थे और ड्यूटी रोस्टर के हिसाब से ड्यूटी कर रहे थे. मिली जानकारी के अनुसार इन 127 मौतों में से 24 मौत के मामले अस्वाभाविक थे. ये सभी मामले 16 अक्टूबर से 21 अक्टूबर के बीच के हैं. मारे गए रोगियों में 70% रोगी मेडिसिन विभाग के थे.
दुर्गा पूजा के दौरान लंबी छुट्टियों के कारण अस्पताल के ज्यादातर वरिष्ठ डॉक्टर छुट्टी पर थे और जूनियर डॉक्टर ही शिफ्ट में काम कर रहे थे. रोगियों के कुछ रिश्तेदारों का आरोप है कि जूनियर डॉक्टरों में अनुभव की कमी तथा अस्पताल में उचित चिकित्सा संसाधनों के अभाव के कारण अधिकांश रोगियों की मौत हुई है. इस तरह के आरोप केवल उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल पर ही नहीं लगे हैं, बल्कि राज्य के अधिकांश सरकारी अस्पतालों पर लगे हैं. जहां रोगियों की मौत की अधिकांश घटनाएं सामने आई है.
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा में लापरवाही होती है. लेकिन सीनियर डॉक्टरों की गैर मौजूदगी में जूनियर डॉक्टरों के द्वारा रोगियों की चिकित्सा कई सवालों को जन्म देती है. प्रायः हर साल दुर्गा पूजा के समय रोगियों की मौत का आंकड़ा बढ़ जाता है.
2024 में दुर्गा पूजा के दौरान मौत का यह आंकड़ा 77 था जो 2025 में बढ़कर 94 हो गया और इस साल 2026 में यह आंकड़ा बढ़कर 127 हो गया है. इस प्रकार से रोजाना 15 से 20 मौतें हुई है. इनमें से ज्यादातर रोगी किडनी,लीवर आदि से पीड़ित थे, जिनका समय पर डायलिसिस नहीं हो सका और उन्होंने ही दम तोड़ा.
सूत्रों ने बताया है कि राज्य सरकार और खासकर स्वास्थ्य विभाग ने इन आरोपों को गंभीरता से लिया है और यही कारण है कि सरकार ने फैसला किया है कि अगले साल से दुर्गा पूजा के दौरान सरकारी अस्पतालों में छुट्टियां नहीं रहेगी. स्वास्थ्य मंत्री मुखोपाध्याय ने भी यह स्पष्ट कर दिया है. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि राज्य सरकार के इस फैसले से सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवा बेहतर होगी.
