पिछले कुछ दिनों से सिलीगुड़ी में जारी चहल पहल, उत्साह व उमंग बृहस्पतिवार को सन्नाटे, उदासी और वीरानी के साए में दबे हुए नजर आए. सड़कों पर सन्नाटा था. आवाजाही बहुत कम दिखी. ऐसा लग रहा था जैसे अचानक ही उदासी का झोंका पसर गया हो. सड़क से लेकर गलियां तक सुन्न दिखी.
सप्तमी से लेकर दशहरा तक सिलीगुड़ी में रौनक देखते बनती थी. बच्चे, बूढ़े, स्त्री, पुरुष, नौजवान एक विशेष उल्लास की अनुभूति कर रहे थे. यह उल्लास उस मां के नाम था, जिनके आगमन के लिए लोग एक साल प्रतीक्षा करते हैं.
मां की विदाई के साथ ही लोगों के चेहरे मुरझा गए हैं. यह स्वाभाविक भी है. जब घर से बेटी ससुराल जाती है तो मां-बाप समेत पूरा परिवार उदासी में डूब जाता है. सिलीगुड़ी को भी कुछ ऐसा ही दर्द और खालीपन महसूस हो रहा है.
मां का विसर्जन हो गया. पूरे 1 साल के लिए मां की विदाई हो गई. इसका दर्द बड़े ही नहीं बल्कि बच्चों के चेहरे पर भी दिख रहा है. तभी तो आज ऐसा लग रहा था जैसे पूरा सिलीगुड़ी शहर चादर तानकर सो गया हो और मां के बिछड़ने का गम भीतर ही भीतर बांट रहा हो.
आज सुबह से ही सिलीगुड़ी के वातावरण में अजीब सी लाचारी दिखी, जो दिन चढ़ने के साथ ही धीरे-धीरे बढ़ती चली गई. दोपहर के समय तो सड़कों पर इक्के दुक्के लोग ही नजर आए. गाड़ियां रोड पर चल रही थी. लेकिन गाड़ियों में पैसेंजर ही नहीं थे.
हालांकि आज भी सिलीगुड़ी के कुछ क्लबों के द्वारा मां की भावभीनी विदाई की गई. लालमोहन निरंजन घाट समेत सिलीगुड़ी के नौका घाट पर शाम के समय मां की प्रतिमाओं का विसर्जन बहुत से लोगों को व्यथित करता गया. कई लोग तो डूबती हुई प्रतिमाओं को देखने का साहस तक ना कर सके.
शाम के समय सिलीगुड़ी के विभिन्न चौक चौराहों पर थोड़ी रौनक जरूर दिखाई दी. कई लोग मां का अंतिम दर्शन करने आए थे. लौटे तो उनके चेहरे भीगे हुए थे.
सिलीगुड़ी और आसपास के इलाकों में महा सप्तमी से लेकर दशहरा तक कई सड़क दुर्घटनाओं के साथ ही पंडाल में अग्निकांड, भगदड़ और कहीं कहीं अव्यवस्था के साथ ही अनेक जगह पंडालों की जिंदादिली सिलीगुड़ी की प्रमुख विशेषता रही. सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कहीं व्यवधान भी आए.
माटीगाड़ा में विजयदशमी की रात एक अनियंत्रित ट्रैक्टर ने सांस्कृतिक कार्यक्रम देख रहे कई लोगों को रौंद दिया.
इस घटना में 4 से 5 लोग घायल हो गए. बताया जा रहा है कि चालक नशे में था. वह मौके से फरार हो गया. माटीगाडा पुलिस ने ट्रैक्टर को जब्त कर लिया है. और चालक की तलाश शुरू कर दी है.
आज शहर के लोगों से विदा लेते हुए जैसे मां उन्हें उपदेश दे रही है, मैं बार-बार आऊंगी. लेकिन इंसान अपनी कमजोरियों पर नियंत्रण करना सीखे. मैं उसी जगह पर बार-बार आना पसंद करूंगी, जहां इंसानियत, सच्चाई और प्रेम बरसता हो. नदी के जल में डूबते हुए जैसे मां के ये आखिरी शब्द थे!
