September 29, 2026
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चिट्ठी आई है… घर से चिट्ठी आई है! क्या डाकिये का यह शोर सुनाई देता है आपको?

आज की पीढी को शायद ‘चिट्ठी’ पता ना हो, परंतु किसी युग में जब डाकिया घर पर चिट्ठी दे जाता था, तो चिट्ठी पाने वाले को ऐसी खुशी मिलती थी, जैसे उसकी लॉटरी निकल गई हो. खासकर अपनों से काफी दूर ‘प्रदेश’ में रहने वाला एक व्यक्ति अपने घर से भेजी गई चिट्ठी पाकर कई कई दिनों तक सो नहीं पाता था और बार-बार चिट्ठी पढता रहता था .आज की पीढी तो कंप्यूटर और एएआई के भरोसे तेज रफ्तार दुनिया में सब कुछ हासिल कर लेना चाहती है.

किसी समय पोस्टकार्ड, लिफाफा और अंतर्देशीय पत्र दूर रहने वाले अपने स्वजनों का हाल मालूम करने का एक माध्यम होता था. चिट्ठी लिखने वाला चिट्ठी में शब्दों का संयोजन मौसम और परिवेश के अनुसार करता था और जब यह चिट्ठी डाकिया दे जाता था, तो व्यक्ति बार-बार चिट्ठी को पढता था. उसे सुकून मिलता था. जब तक अगली चिट्ठी नहीं आ जाती थी, व्यक्ति चिट्ठी को अपने दिल से लगाए रखता था. अगर लिफाफा पत्नी या प्रेयसी का होता, तो प्रदेश में रहने वाला व्यक्ति चिट्ठी के सहारे स्वयं में एक नई ऊर्जा की अनुभूति करने लगता था.

आज व्हाट्सएप और ए आई के दौर में चिट्ठियों का युग लद गया है. अब हाथ से लिखी चिट्ठियां एक युग की बात हो गई. ना तो लिफाफा देखा जाता है, ना ही पोस्टकार्ड और ना अंतर्देशीय पत्र. आमतौर पर पोस्ट कार्ड एक खुला पत्र होता था, जो सिर्फ संवाद भरा होता था. जबकि लिफाफा और अंतर्देशीय पत्र अपनों के दिल का हाल, उसके दर्द और आरजू का पैगाम होता था. इस मशीनी युग में मानव भी मशीन बन चुका है. लोगों के पास ना तो चिट्ठी लिखने का समय है और ना ही चिट्ठी पढ़ने का. सब कुछ फोन पर हो जाता है. चंद सेकेंड में ही अपनों से बात हो जाती है.

लेकिन फिर भी मानव संतुष्ट नहीं है. मानव खुश भी नहीं है. फोन पर बातचीत करने या व्हाट्सएप के जरिए संवाद भेजने से उसके दिल को सुकून नहीं मिल रहा है. क्योंकि चिट्ठियों में छिपे शब्द संयोजन, अनुराग और प्रेम तो नदारद है, जो किसी इंसान के जीवन में गति और ऊर्जा उत्पन्न करते हैं. पुराने दौर की चिट्ठियां केवल शब्द संयोजन या अपनों से जोड़ने का एक माध्यम मात्र नहीं थी, बल्कि व्यक्ति को संस्कार, परंपरा और चरित्र को संवारने की भी एक सशक्त जरिया होती थी.

आज का मानव भले ही पुराने दौर की चिट्ठियों को याद करना नहीं चाहता हो, परंतु आज भी उस दौर के लोग चिट्ठियों को न केवल याद करते हैं, बल्कि उनके महत्व को समझते हुए पुराने दौर की लिखी चिट्ठियों को संजो कर रखते भी हैं. खबर समय ने चिट्ठियों के दौर के लोगों के अनुभव भी जानने की कोशिश की. खासकर बड़े बुजुर्गों ने चिट्ठी से जुड़ी अपनी यादों को बताकर कहीं ना कहीं अपने दिल के बोझ को हल्का करने की कोशिश की. जाहिर है कि सिलीगुड़ी के बड़े बुजुर्ग पुराने दौर की चिठ्ठियों से गहरे से जुड़े हुए हैं.

हमारे देश की कुछ संस्थाएं ऐसी हैं, जो चाहती हैं कि पुराने दौर की चीजें वापस ट्रेंड में शामिल हो. खासकर चिट्ठियों के दौर को ट्रेन्ड में लाने के लिए कई संस्थाएं प्रयासरत हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि चिट्ठियों का युग लौटने से कम से कम आज का मानव इतने बड़े तनाव से नहीं गुजरेगा. इसके अलावा मानव अपनी जमीन और परंपरा से जुड़कर भविष्य की एक मजबूत नींव तलाश करेगा. ऐसे ही संस्थानों मे कोलकाता का पेपर एंड प्रिज्म क्लब भी एक ऐसी संस्था है, जो चिट्ठियों के पुराने दौर को वापस ला रहा है.

यह क्लब हाथ से बनी पोस्टकार्ड और बुकमार्क तैयार करता है. हर लिफाफे पर खास वैक्सीन और असली डाक टिकट लगाकर पोस्ट ऑफिस में भेजा जाता है. अब यह क्लब दुर्गा पूजा पर शुभो विजयो की लुप्त होती बंगाली परंपरा को जीवित कर रहा है. ऐसे बहुत से क्लब और संस्थाएं हैं, जो चाहती हैं कि चिट्ठियों का युग ट्रेंड में हो ताकि आज का मानव संतोष, सुकून और तनाव रहित जिंदगी जीने की कला सीख सके. चिट्ठियां मानव को व्यवस्थित जीवन की कला सिखा सकती हैं. इसके बारे में आप क्या सोचते हैं? क्या चिठ्ठियों का युग लौटना चाहिए?

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