September 22, 2026
Sevoke Road, Siliguri
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जिंदगी भर की पूंजी लगा दी, फ्लैट भी नहीं मिला, क्या करे खरीददार?

सिलीगुड़ी ही नहीं बल्कि देश के सभी शहरों में बिल्डर और खरीददार के बीच फ्लैट के हस्तांतरण तक कुछ ना कुछ विवाद चलता रहता है. अधिकतर विवाद समय सीमा के भीतर फ्लैट तैयार नहीं होने को लेकर सामने आते हैं. बेचारा खरीददार किराए के मकान में रहता है. उसकी एक नजर बिल्डर के निर्माणाधीन भवन पर टिकी रहती है कि कब उसका फ्लैट तैयार हो सके ताकि वह किराए का मकान छोड़कर अपने फ्लैट में शिफ्ट हो सके.

अगर बिल्डर, खरीददार के साथ किए गए एग्रीमेंट के अनुसार काम करने लगे तो उनके बीच कोई विवाद ही नहीं रहेगा. दिल्ली एनसीआर में तो इस तरह की घटनाओं की बाढ़ आ गई है. तो अपना सिलीगुड़ी शहर भी कुछ कम नहीं है. यहां सिलीगुड़ी के आसपास बन रही इमारतों के अधिकांश फ्लैटों की बुकिंग तो हो चुकी होती है, लेकिन विडंबना है कि एग्रीमेंट के अनुसार तय की गई सीमा अवधि में खरीददारों को मकान नहीं मिला होता है, जिसकी वजह से वे काफी परेशान रहते हैं. बिल्डर का खरीददार से ज्यादा से ज्यादा ऐंठने का कोई ना कोई बहाना खरीददार को भीतर से तोड़ कर रख देता है.

खरीददार कोई अमीर व्यक्ति तो होता नहीं है. वह मध्यम वर्ग का व्यक्ति होता है, जो यह सोच कर फ्लैट पर निवेश करता है ताकि उसका अपना एक स्थाई ठिकाना हो. वह जल्द से जल्द किराए के मकान से आजाद होना चाहता है, इसलिए वह अपनी जिंदगी भर की कमाई फ्लैट पर निवेश कर देता है. लेकिन जब निर्धारित समय सीमा के भीतर उसे अपना फ्लैट नहीं मिलता है तो उसका धैर्य भी जवाब देने लगता है. कई बार तो वह मझधार में लटक जाता है. ना घर का रह पाता है और ना घाट का. क्योंकि उसकी सारी कमाई फ्लैट में चली जाती है.

सिलीगुड़ी में पहले भी इस तरह के कई मामले सामने आए हैं. वर्तमान में कई खरीददार ऐसे हैं जो 10 साल या 15 साल से घर मिलने का इंतजार कर रहे हैं. लेकिन बिल्डर को उनकी परेशानी से कोई लेना देना नहीं है. बिल्डर अपनी समस्या बता देता है. खरीददार बिल्डर से मारपीट नहीं कर सकता है. ना ही यह उसकी समस्या का समाधान है.वह ज्यादा से ज्यादा कानूनी कार्रवाई कर सकता है. लेकिन फ्लैट आवंटन संबंधित हमारे देश में ना तो उचित कानून है और ना ही ऐसे मामलों में कोर्ट का त्वरित फैसला आता है. बरसों लग जाते हैं कोर्ट का फैसला आने में. तब तक खरीददार कर्ज में डूब जाता है.

अगर बिल्डर और बायर के बीच एग्रीमेंट की बात करें तो नियमों के अनुसार इसके प्रमुख कानूनी प्रावधानों में प्रॉपर्टी विवरण, जैसे फ्लैट नंबर, कॉर्पोरेट एरिया आदि की जानकारी, भुगतान जैसे कुल लागत और किस्तों का शेड्यूल, पोजीशन समय सीमा, जिसके अंतर्गत घर मिलने की निश्चित तारीख और हैंडओवर के नियम, जुर्माना प्रावधान जो बिल्डर पर लागू होता है, जिसके अनुसार अगर निर्माण या पजेशन में देरी होती है तो खरीदार मुआवजे का हकदार हो जाता है. और आखिर में RERA के नियम होते हैं, जिसके तहत बिल्डर बायर से एग्रीमेंट के बिना प्रॉपर्टी की कुल लागत का 10% से ज्यादा एडवांस नहीं ले सकता है.

सवाल है कि क्या बिल्डर अनुबंध के नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं? अगर वह ऐसा नहीं करते हैं तो इसमें खरीददार क्या कदम उठा सकता है? वह समय पर अपनी किस्त भरता है और एक-एक दिन फ्लैट तैयार होने के इंतजार में गुजार देता है. अगर बिल्डर समय पर फ्लैट तैयार करके खरीददार को हस्तांतरित नहीं करता है तो नियम के अनुसार बिल्डर द्वारा खरीददार को मुआवजा देना चाहिए. जबकि होता क्या है? उल्टे बिल्डर ही खरीददार से विभिन्न बहानों के जरिए ज्यादा से ज्यादा वसूली करने की कोशिश करता है. यहीं बिल्डर और खरीददार के बीच रिश्ता खराब होता है. कई बार यह मामला कोर्ट में चला जाता है, जिसका फैसला आने में बरसों लग जाते हैं. इससे बिल्डर पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है जबकि खरीददार की हालत खराब हो जाती है.

ऐसा ही एक मामला डागापुर स्थित एक निर्माणाधीन इमारत से जुड़ा है. सिलीगुड़ी के एक व्यक्ति ने उक्त इमारत परिसर में अपनी पत्नी तथा एक अन्य व्यक्ति के नाम से दो फ्लैट और दो पार्किंग बुक कराए थे. नवंबर 2011 और जनवरी 2012 में बिल्डर के साथ उनका अलग-अलग एग्रीमेंट भी हुआ था. एग्रीमेंट के अनुसार खरीददार ने दोनों फ्लैटों की कीमत का लगभग 80% से अधिक राशि का भुगतान बहुत पहले ही कर दिया था. जिस समय एग्रीमेंट हुआ था, उसके अनुसार फ्लैट का निर्माण 3 वर्षों में पूरा किया जाना था. एग्रीमेंट में साफ लिखा था कि 3 साल के भीतर मकान पूरा कर फ्लैट का कब्जा खरीददार को सौंप दिया जाएगा.

लेकिन डेवलपर ने तय समय सीमा के भीतर फ्लैटों का निर्माण पूरा करके नहीं दिया. खरीददार की ओर से बताया गया कि वर्ष 2018 तक ना तो विद्युत व्यवस्था और ना ही ट्रांसफार्मर से संबंधित कार्य को किया गया था. ऐसी स्थिति में मकान में कैसे रहा जा सकता था? जब खरीददार ने बिल्डर और डेवलपर को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया तो खरीददार से बकाया राशि के साथ ही अन्य राशि जोडकर लगभग दुगुनी राशि मांगी गई. अब खरीददार ने निर्धारित राशि के अलावा अन्य भुगतान देने में असमर्थता व्यक्त की है. जिसके कारण यह मामला फस गया है. खरीददार सिलीगुड़ी के विधायक से लेकर अधिकारियों तक दरखास्त कर रहा है. उनसे मदद की गुहार लगा रहा है. लेकिन अब तक कुछ नहीं हो सका है.

इस तरह की घटनाएं सोचने पर मजबूर कर देती है कि एक खरीददार आखिर किस पर भरोसा करे? पाई पाई जोड़कर वह फ्लैट पर निवेश करता है. लेकिन समय पर उसका घर उसे नहीं मिलता है. बिल्डर पर तो ज्यादा असर नहीं पड़ता, लेकिन बेचारा खरीदार ऐसे ही महसूस करता है जैसे वह जिंदगी की सबसे बडी बाजी हार चुका हो. उसे कानून से भी उचित मदद नहीं मिलती और ना ही अधिकारियों से सहयोग मिलता है. वह तो अधर में फंस जाता है. कई बार तो ऐसा भी होता है कि दो बिल्डर्स की लड़ाई में खरीददार बेमौत मारा जाता है.

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