उत्तराखंड का प्राकृतिक आपदा हमेशा याद किया जाता रहेगा. यह रोंगटे खड़े करने वाला और रूह को कंपकपा देने वाला हादसा रहा है.वर्तमान में धाराली और पूर्व में जोशीमठ प्राकृतिक आपदा का शिकार हुआ था. यह घाव अभी भी भर नहीं सका है. जो रिपोर्ट प्राप्त हो रही है, धाराली और जोशीमठ को फिर से नए सिरे से खड़ा करने में काफी वक्त लगेगा.
अगर दार्जिलिंग की भौगोलिक स्थिति, बसावट इत्यादि की तुलना उत्तराखंड के इन क्षेत्रों से की जाए तो काफी हद तक समानता दिखती है. उत्तराखंड में पहाड़ों और मानवीय बस्तियों की जो स्थिति है, दार्जिलिंग भी उससे ज्यादा दूर नहीं है. इसलिए अब वैज्ञानिक और भूगर्भ शास्त्री दार्जिलिंग को चेतावनी दे रहे हैं. वे प्रशासन को सावधान कर रहे हैं कि अगर जल्द से जल्द इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो दार्जिलिंग दूसरा उत्तराखंड बन सकता है.
हाल ही में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त पत्रिका दि डिप्लोमेट ने यह खबर प्रकाशित की है. यह एक लेख है, जो विश्लेषणात्मक स्वरूप में है और इस लेख के जरिए चेतावनी दी गई है कि जिस तरह से दार्जिलिंग में अनियंत्रित और अवैध शहरीकरण हो रहा है, जिस तरह से स्थानीय प्रशासन की उदासीनता और भ्रष्टाचार के चलते पहाड़ के ढलानों पर ऊंचे ऊंचे भवन बनाए जा रहे हैं, उससे शहर के स्थायित्व को गंभीर खतरा उत्पन्न हो रहा है.
वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने भी सावधान किया है. जलवायु विशेषज्ञों के अनुसार दार्जिलिंग का 22 से लेकर 34% क्षेत्र ऐसा है, जहां भूस्खलन का गंभीर खतरा है. अथवा इन इलाकों में भूस्खलन होते रहते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार यह क्षेत्र भूकंपीय क्षेत्र 4 में आता है.आईआईटी खड़गपुर के वैज्ञानिक जय नारायण कुट्टीपरथ ने एक अध्ययन में चेतावनी दी है कि जिस तरह से यहां शहरीकरण हो रहा है और नियम कानून का ध्यान नहीं रखा जा रहा है, उससे भविष्य में यहां बड़ी आपदा आ सकती है.
इस रिपोर्ट के बाद पहाड़ में हलचल बढ़ गई है. स्थानीय पर्यावरण संगठन और पर्यावरण प्रेमी दार्जिलिंग नगर पालिका और GTA पर आरोप लगा रहे हैं. एक पर्यावरण प्रेमी दावा शेरपा ने आरोप लगाया है कि दार्जिलिंग नगर पालिका पर्यावरणीय आदेशों की अवहेलना कर रहा है और अवैध निर्माण को बढ़ावा दे रहा है. एक अन्य रिपोर्ट में दार्जिलिंग नगर पालिका के अध्यक्ष दीपेन ठकुरी को संदेह के कटघरे में खड़ा किया गया है.
दार्जिलिंग के नेता और राजनीतिक दल गोरखालैंड तथा अन्य स्थानीय समस्याओं की बात करते हैं और आवाज उठाते भी हैं. वे जनता के बीच जाते हैं. लेकिन आज तक किसी राजनीतिक नेता ने स्थानीय पर्यावरण, दार्जिलिंग को बचाने और अवैध निर्माण के खिलाफ आंदोलनात्मक रूप से कोई बड़ी लड़ाई अथवा अभियान की बात नहीं कही है. दार्जिलिंग में स्वच्छता की बात तो होती है, लेकिन यह स्वच्छता दार्जिलिंग के अस्तित्व को बचाने के लिए होनी चाहिए.
इस ओर किसी का भी ध्यान नहीं है. वोट बैंक के आगे पर्यावरण का मुद्दा गौण हो चुका है. दार्जिलिंग को लेकर वैज्ञानिकों तथा विशेषज्ञों का अध्ययन तथा द डिप्लोमेट की रिपोर्ट गंभीर खतरे की ओर इशारा कर रही है. अगर चेता नहीं गया तो दार्जिलिंग को दूसरा उत्तराखंड बनते देर नहीं लगेगी! इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा?