इस समय पूरे बंगाल और बॉर्डर इलाके में नाका चेकिंग चल रही है. अगर आपके पास 50000 से ज्यादा की नगदी है तो पकड़े जाने पर आपको नगदी का पूरा हिसाब यानी स्रोत दिखाना होगा. अगर आपने ऐसा नहीं किया तो आपकी रकम जब्त कर ली जाएगी. भले ही आप पुलिस को बताएं कि आप किसी जरूरी काम से नगदी ले जा रहे हैं, लेकिन पुलिस आपकी बात नहीं सुनेगी.आपको साबित करना होगा. आपको प्रूफ दिखाना होगा. चुनाव आयोग की सख्ती के बाद बंगाल में पुलिस प्रशासन की आपकी नगदी पर पैनी नजर है.
बंगाल के विभिन्न जिलों और इलाकों से आए दिन नगदी पकड़ी जा रही है. अगर करोड़ों की नगदी जब्त होती है तो अच्छी बात है. कानून को उसका स्रोत पता करना ही चाहिए. लेकिन कभी-कभी लाख डेढ़ लाख रुपए तक पुलिस जब्त कर ले तो बड़ा आश्चर्य होता है. क्या एक आम आदमी किसी जरूरी काम से इतना पैसा नहीं ले जा सकता और क्या उसे इतने पैसों के लिए पैसों का हिसाब देना होगा? हो सकता है कि व्यक्ति किसी से कर्ज लेकर मेडिकल या किसी अन्य जरूरी कार्यों के लिए पैसा ले जा रहा हो तो क्या उसका पैसा रोक लिया जाना चाहिए? सिर्फ इसलिए कि वह पुलिस को पक्का सबूत नहीं दे पाता है और पुलिस उसके बयान पर भरोसा इसलिए नहीं करती, क्योंकि कानून को सबूत चाहिए.
एक तरफ चुनाव के इस मौसम में एक आम आदमी से लाख डेढ़ लाख रुपए का हिसाब मांगा जा रहा है तो दूसरी तरफ नेता, मंत्री, विधायक और वीआईपी की गाड़ियां आसानी से गुजर जाती हैं. ऐसी गाड़ियों के लिए नाका चेकिंग मात्र एक औपचारिकता होती है, जो कभी-कभी मौखिक और ज्यादा से ज्यादा कैमरे के पीछे एक कागजी कार्रवाई या खानापूरी होती है. ऐसे में एक आम आदमी को लगता है कि कानून सबके लिए समान नहीं है. संविधान की मोटी पुस्तक में कानून सबके लिए बराबर बताया गया है और इसका पालन करने के लिए कहा जाता है. पर क्या सचमुच ऐसा होता है?
पिछले दिनों जलपाई मोड़ पर हुई नाका चेकिंग तो एक छोटा सा उदाहरण है. जहां व्यक्ति की कार की तलाशी के दौरान ₹200000 से कुछ ज्यादा की रकम बरामद हुई थी.ऐसे अनेक उदाहरण जलपाईगुड़ी, कूचबिहार, मालदा, अलीपुरद्वार और दक्षिण बंगाल के विभिन्न जिलों से सामने आ रहे हैं. जब-जब चुनाव आता है, पुलिस की नाका चेकिंग बढ़ जाती है. और बढ़ जाती है एक आम आदमी की मुसीबत. गाड़ियों की तलाशी, नगदी का हिसाब और पुलिस की लंबी पूछताछ कभी-कभी एक ईमानदार व्यक्ति को भी अपराधी की श्रेणी में ला खड़ी करती है.
सवाल यह है कि जब कानून सबके लिए बराबर है तो लाख डेढ़ लाख रुपए जब्त करके पुलिस अपनी कर्तव्यपरायणता का उदाहरण प्रस्तुत करती है, लेकिन अधिकारियों की यह कर्तव्य परायणता उस समय कहां सो जाती है, जब किसी वीआईपी की गाड़ी से करोड़ों की बरामदगी होती है? यह कोई बड़ी खबर नहीं बनती. निष्पक्ष चुनाव के लिए कानून सख्त होना जरूरी है. कानून में पारदर्शिता और स्पष्टता भी जरूरी है. लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि एक आम आदमी से लेकर VIP तक कानून का पालन करें और कानून के रखवाले सभी के साथ एक समान व्यवहार करें.
अब तो स्थिति यह है कि एक आम आदमी को सड़क पर गाड़ी लेकर चलने में डर लगता है.गाड़ी में 50000 से ज्यादा नगदी लेकर नहीं चल सकते. अगर आप सिलीगुड़ी से बागडोगरा की तरफ चले हैं तो बीच रास्ते में आपकी गाड़ी को कहीं भी रोक लिया जाएगा और आपको घंटे 2 घंटे के लिए अटका दिया जाएगा. अगर आप किसी जरूरी काम से जा रहे हैं तो निश्चित समय के भीतर आपका काम नहीं होगा. यह पक्की बात है. एक आम आदमी छोटी रकम का छोटा-छोटा हिसाब नहीं रखता है. इस स्थिति में जब उसकी रकम जब्त कर ली जाती है तो उसे लगता है कि वर्षों से मेहनत करके जमा किया गया पाई पाई पैसा भी उसके लिए अपराध बन गया है.
पुलिस और प्रशासन को अपना काम बिना किसी भेदभाव के और निष्पक्ष तरीके से करना चाहिए. चाहे सत्तारूढ पार्टी हो या विपक्ष, कानून की नजर में हर वह व्यक्ति दोषी है, जो कानून का पालन नहीं करता है. गाड़ी किसी की हो, अगर पुलिस को संदेह है तो उसकी तलाशी करवाने में पुलिस प्रशासन का सहयोग करना चाहिए. कानून किसी के साथ भी भेदभाव की इजाजत नहीं देता. मंत्री, सांसद, विधायक से लेकर एक आम आदमी भी जांच के दायरे से बाहर नहीं है. माना कि वीआईपी के लिए सुरक्षा और प्रोटोकॉल जरूरी है पर इसके नाम पर जांच सीमित क्यों? अगर ऐसा होता है तो एक आम आदमी को यही लगता है कि कानून सबके लिए बराबर नहीं है.
कानून में चुनाव में खर्च के लिए भी एक परिसीमन है. हर उम्मीदवार को रैली, रोड शो,चुनाव प्रचार आदि में खर्च किए गए हिसाब का हलफनामा प्रस्तुत करना पड़ता है. पर क्या चुनाव जीतने वाला अथवा हारने वाला एक नेता चुनाव प्रचार के दौरान अपने खर्च किए गए हिसाब का सही विवरण दे पाता है? एक लोकसभा/विधानसभा के उम्मीदवार को चुनाव में करोड़ों रुपए खर्च करना पड़ता है. क्या यह पैसा बैंकिंग सिस्टम से आता है? क्या कभी प्रशासन उम्मीदवार से पैसे का सबूत मांगता है? अगर प्रशासन ऐसा नहीं कर सकता, तो छोटे मोटे लेनदेन अथवा नकदी रकम के लिए हिसाब मांगना वह भी पक्के सबूत के साथ क्या जरूरी है? यह सवाल आपके लिए भी है. इस बारे में आपका क्या ख्याल है, हमें जरूर बताइएगा!
