जो लोग 2026 के चुनाव में मतदान नहीं कर सकने के अफसोस अथवा गम में डूबे हैं, उनके लिए सुप्रीम कोर्ट का आदेश आशा की किरण लेकर आया है.अगर इस आदेश का का पालन चुनाव आयोग करता है तो आप निश्चित रूप से विधानसभा के चुनाव में मतदान कर सकेंगे.
चुनाव आयोग मतदान से वंचित लोगों की अपील, विचाराधीन अथवा पेंडिंग मामलों की सुनवाई कर रहा है. बहुत लोग यह समझते हैं कि अब चुनाव में एक हफ्ते का भी कम समय रह गया है, ऐसे में वे वोट नहीं दे सकेंगे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर चुनाव आयोग या ट्रिब्यूनल के द्वारा चुनाव के दो दिन पहले तक मामलों को क्लियर कर दिया जाता है तो ऐसे मतदाता 2026 के विधानसभा चुनाव में मतदान कर सकते हैं.
लेकिन अगर चुनाव आयोग ऐसा नहीं करता है तो मतदाता मताधिकार के पात्र नहीं होंगे. कुल मिलाकर चुनाव आयोग और अधिकारियों पर निर्भर करता है कि वह पेंडिंग अथवा विचाराधीन SIR मामलों का निष्पादन कितनी तेजी से करते है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश 3 दिन पहले ही आ गया था. पर आज उसे चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अपलोड किया गया है.
स्पष्ट है कि मतदान से दो दिन पहले अगर ट्रिब्यूनल किसी मतदाता का नाम जोड़ने का आदेश दे देता है तो उसे मतदान का अधिकार मिल जाएगा. लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो मतदाता को मतदान का अधिकार प्राप्त नहीं होगा. अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि उनके समक्ष जो अपील आती है और अगर उसका निष्पादन 21 अप्रैल तक हो जाता है तो सप्लीमेंट्री रिवाइज मतदाता रोल जारी करें.
इसी तरह से दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को है. अगर 27 अप्रैल तक अपील का फैसला हो जाता है तो चुनाव आयोग के द्वारा तुरंत सप्लीमेंट्री रिवाइज मतदाता रोल जारी करना होगा. ऐसे में मतदाता चुनाव में भाग ले सकेगा. अब सारा दारोमदार ट्रिब्यूनल पर निर्भर करता है.अगर ट्रिब्यूनल नाम जोड़ने या हटाने का अंतिम आदेश निर्धारित तिथि से पहले दे देता है तो मतदाता को निराश होने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मामला लंबित होने से वोट देने का अधिकार नहीं मिलेगा. कोर्ट की दलील है कि अगर लंबित अपील वाले लोगों को वोट देने दिया गया तो आपत्ति करने वाले भी दूसरों के मतदान अधिकार रोकने की मांग कर सकते हैं. मालूम हो कि बंगाल में SIR के तहत लगभग 90 लाख लोगों के मतदान के अधिकार अधर में है.
