आपको याद होगा, पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान 27 अप्रैल को आराम बाग में चुनाव प्रचार के दौरान अभिषेक बनर्जी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का नाम लिए बिना एक विवादित टिप्पणी की थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि 4 तारीख को देखेंगे… दिल्ली का कौन सा बाप बचाने आएगा! उन्होंने सीधे-सीधे मतदाताओं को धमकी दी थी कि अगर TMC को वोट नहीं दिया तो परिणाम भयंकर होगा!
उनके इस बयान के बाद बंगाल से लेकर दिल्ली तक की राजनीति में भूचाल आ गया था. उनके इस गैर जिम्मेदाराना बयान को लेकर जहां एक तरफ भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के तेवर गर्म हो गए थे. प्रदेश भाजपा के नेता और स्वयं मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने तो प्रदेश में भाजपा की जीत के बाद पत्रकारों के सवाल के जवाब में व्यंग्यात्मक तरीके से कहा भी था, कहां है भाईपो.. सऊदी अरब या दुबई भाग गया !
दूसरी तरफ खुद तृणमूल कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार का कारण उनके इस बयान को भी बताते हैं. यह बयान चुनाव में टीएमसी की हार से जोड़कर देखा जा रहा है. अभिषेक बनर्जी का उक्त बयान सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हुआ था. भाजपा नेताओं ने उनके इस बयान को लोकतांत्रिक व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अपमानजनक बताते हुए अभिषेक बनर्जी के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी.
कोलकाता हाई कोर्ट ने इसी मामले की सुनवाई के दौरान अभिषेक बनर्जी पर सख्त टिप्पणी की है. कोलकाता हाई कोर्ट ने कहा है कि अभिषेक बनर्जी का बयान गैर जिम्मेदाराना है. अदालत ने कहा है कि अगर 4 मई को चुनाव परिणाम अलग होते तो राज्य की कानून व्यवस्था पूरी तरह बिगड़ सकती थी.
कोलकाता हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने अभिषेक बनर्जी की टिप्पणी को गैर जिम्मेदाराना करार दिया है. अदालत ने कहा है कि चुनाव जैसे संवेदनशील माहौल में इस तरह के बयान हालत को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते थे. न्यायाधीश ने पूछा है कि अगर चुनाव परिणाम दूसरी दिशा में जाते तो क्या राज्य में कानून व्यवस्था हाथ से निकल सकती थी?
हालांकि सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अभिषेक बनर्जी को पुलिस की गिरफ्तारी से राहत तो दे दी है, परंतु उन्हें विदेश यात्रा करने पर रोक लगा दी है. अदालत ने कहा है कि 31 जुलाई तक अभिषेक बनर्जी को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकती. लेकिन इस अवधि के दौरान वे विदेश यात्रा नहीं कर सकते हैं. कोर्ट में तृणमूल कांग्रेस की ओर से दलील दी गई थी कि यह किसी को डराने या धमकाने की बात नहीं बल्कि चुनावी भाषण का एक हिस्सा था.
ममता बनर्जी के बाद अभिषेक बनर्जी भी जैसे पार्टी और अपने लोगों से दूर होते जा रहे हैं . तृणमूल कांग्रेस में बगावत छिड़ गई है. टीएमसी के नेता ना तो ममता बनर्जी को कोई भाव दे रहे हैं और ना ही अभिषेक बनर्जी को महत्व दे रहे हैं. वे भाजपा में एंट्री करने के अवसर की तलाश कर रहे हैं. ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी से पार्टी नेताओं की बढती दूरी का एक ज्वलंत उदाहरण पिछले दिनों देखने को मिला.
चुनाव के बाद राज्य की नई भाजपा सरकार के खिलाफ बंगाल विधानसभा परिसर में TMC द्वारा बुधवार को धरना प्रदर्शन का कार्यक्रम आयोजित किया गया था. चुनाव नतीजे के बाद राज्य भर में कथित राजनीतिक हिंसा, नई भाजपा सरकार की बुलडोजर कार्रवाई, रेलवे भूमि एवं स्टेशनों के आसपास के क्षेत्रों से फेरीवालों को कथित तौर पर जबरन हटाए जाने की कार्रवाई के खिलाफ विधानसभा परिसर में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के सामने आयोजित पार्टी के धरना प्रदर्शन से टीएमसी के नव निर्वाचित 80 में से 46 विधायक नदारद रहे.
तृणमूल कांग्रेस का धरना महज आधे घंटे में ही निबट गया. इससे एक दिन पहले तृणमूल सुप्रीमो तथा पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कालीघाट स्थित अपने आवास पर पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई थी. इनमें से 15 विधायक गैर हाजिर रहे थे. पार्टी के कुछ विधायक ममता बनर्जी जिंदाबाद तो कह रहे हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी का नाम तक लेना नहीं चाहते. पार्टी में चल रही बगावत को लेकर भले ही टीएमसी के नेता कुछ और सफाई दे रहे हो, लेकिन आईना साफ है कि टीएमसी के नेता और विधायक ममता बनर्जी तथा अभिषेक बनर्जी की तानाशाही को और झेलने के लिए तैयार नहीं है.
सूत्र बता रहे हैं कि अभिषेक बनर्जी सबसे ज्यादा परेशान है.उनका दाया हाथ माना जाने वाला जहांगीर खान पहले ही शुभेंदु अधिकारी के आगे घुटने टेक चुका है और दूसरे आरोपित टीएमसी नेता भी अपनी गिरफ्तारी के डर से भागते फिर रहे हैं. ये वे नेता हैं, जिनके खिलाफ टीएमसी राज में कथित वसूली, सिंडिकेट राज, धमकी और आर्थिक अनियमितताओं के मामले चल रहे हैं. अब उन्हें लगता है कि जब उनके आका ही मुसीबत में पड़ चुके हैं तो उन्हें कौन बचाएगा! यही कारण है कि उन्होंने हवा का रुख देखते हुए भाजपा की ओर पीठ कर ली है. लेकिन क्या भाजपा उन्हें शरण देने को तैयार है?
