नेपाल के लोग सकते में हैं. वहां आम जनता में हड़कंप मचा हुआ है. नेपाली जनता में भय,आशंका और अनिश्चितता देखी जा रही है. आजकल नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह चुप-चुप रहते हैं. उन्हें सार्वजनिक मंचों से दूरी बनाते देखा जा रहा है. जो काम उन्हें करना चाहिए, उस काम को वे दूसरों से करवा रहे हैं.
क्या नेपाल में सब कुछ ठीक चल रहा है? सत्ता संभालने के कुछ ही दिनों में बालेन शाह ने अपने धुआंधार फैसलों से नेपाल के इतिहास को बदल कर रख दिया है. आज तक कोई राजनेता ऐसा करने का साहस नहीं दिखा सका, जो बालेंद्र शाह ने दिखा दिया है. एकदम फिल्मी स्टाइल और फिल्मी तेवर में. जिस तरह से भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक नई परंपरा कायम करने के लिए जाने जाते हैं,ठीक उसी तरह से नेपाल में प्रधानमंत्री बालेन शाह को इसी लुक में देखा जा रहा है.
नेपाल में हर साल 28 मई को गणतंत्र दिवस मनाया जाता है. 2008 में 28 मई को नेपाल एक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया था. उस दिन नेपाल में 240 साल पुरानी राजशाही का अंत हुआ था और इसी की याद में गणतंत्र दिवस मनाया जाता है. नेपाल में अब तक यही परंपरा रही है कि गणतंत्र दिवस के दिन नेपाल का प्रधानमंत्री देश को संबोधित करता है. लेकिन बालेन शाह ने देश को संबोधित नहीं किया.
नेपाल की जनता जानना चाहती थी कि बालेन शाह कौन सा नया कदम उठाने जा रहे है? क्योंकि प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह ने केवल और केवल कदम ही उठाए हैं. चाहे वह नेपाल में प्राइवेट स्कूल को बंद करने का मामला हो या फिर अमीर गरीब के बीच खाई को पाटने वाले उनके दूसरे काम हो, चाहे भंसार शुल्क की बात हो या फिर सीमावर्ती क्षेत्रों में नेपाली और भारतीय नागरिकों पर सख्ती की बात हो, नेपाल जाने वाले पर्यटकों के लिए नए नियम हो या हाल ही में नेपाल का राजदूत बनने के लिए नेपाली युवा को परीक्षा में बैठने का फरमान देने का मामला रहा हो, उनके इन कदमों के बाद नेपाल की जनता जानना चाहती थी कि गणतंत्र दिवस पर बालेन शाह क्या बोलने वाले हैं.
लेकिन नेपाल की जनता को बालेन शाह ने एक बार फिर सरप्राइज दिया है.उन्होंने देश में अब तक स्थापित परंपरा को तोड़ दिया है. गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति को यह जिम्मेवारी सौंप कर बालेन शाह ने चुपी साध ली है और यह नेपाल की जनता के लिए हडकंप जैसा है. आखिर बालेन शाह करना क्या चाहते हैं? आखिर वह क्या कर रहे हैं? आखिर वह जनता से सीधे कम्युनिकेट के क्यों नहीं हो रहे हैं
नेपाल का युवा प्रधानमंत्री रैपर से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा है. वह नेपाल के पहले प्रधानमंत्री बन गए हैं, जिन्होंने गणतंत्र दिवस पर नेपाल की जनता को संबोधित नहीं किया. आखिर बालेन शाह ने अपना काम राष्ट्रपति पौडेल को क्यों सौंप दिया? राष्ट्रपति ने जनता को क्यों संबोधित किया? इस तरह के कई सवाल नेपाल में उठाए जा रहे हैं.
राजनीतिक पृष्ठभूमि के जानकार बताते हैं कि नेपाल में पहले से ही परंपरा चली आ रही है कि सरकार के प्रमुख जैसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्य के अधिकारी, विदेशी दूतावास के अतिथि आदि की उपस्थिति में प्रधानमंत्री भाषण देते हैं. पहली बार ऐसा हुआ है कि नेपाल के प्रधानमंत्री ने इस परंपरा को तोड़ा है. चैत्र माह के 26 वें दिन प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह ने पहली बार भक्तपुर में नेपाली सेना के एक कार्यक्रम को संबोधित किया था. उसके बाद से उन्हे किसी भी सार्वजनिक समारोह में नहीं देखा गया है.
मजे की बात तो यह है कि नेपाल में गणतंत्र दिवस इतना बड़ा त्यौहार होता है. लेकिन सरकार के किसी भी अधिकारी या मंत्री ने नेपाल की जनता को शुभकामनाएं नहीं दी. यहां तक कि सरकार में शामिल प्रमुख सहयोगी पार्टी ने भी गणतंत्र दिवस पर एक शब्द कुछ नहीं कहा. राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष ने भी इस अवसर पर कुछ नहीं कहा. यह सब चकराने वाली बात है. इसको लेकर आलोचक कई तरह के सवाल भी उठा रहे हैं.
