इस कैप्शन से आपको भयभीत होने की जरूरत नहीं है और ना ही आतंकित होने की. परंतु यह कोई अफवाह नहीं है. बल्कि एक सच्चाई है, जो कोलकाता के साथ ही मुंबई की वर्तमान तथा आने वाली पीढ़ियों को सतर्क करती है कि खतरा कितना बड़ा है. यह संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट और चेतावनी भी है . अब संयुक्त राष्ट्र महासचिव की रिपोर्ट का अध्ययन और विश्लेषण शुरू हो गया है. वैज्ञानिकों तथा विशेषज्ञों की टीम भविष्य के खतरे तथा चुनौतियों से निपटने के प्रयास में जुट गई है.
आपको बता दें कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर कोलकाता और मुंबई के डूबने की बात कही जा रही है. परंतु सच्चाई यह है कि कोलकाता हो या मुंबई दोनों शहर पूरी तरह पानी में नहीं समा जाएंगे. बल्कि वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने इसको इस रूप में देखना शुरू कर दिया है कि लगातार बाढ़ आएगी. समुद्र का जलस्तर और ऊंचा होता जाएगा.
मानसून में होने वाली बारिश का पानी शहरों से बाहर नहीं निकल पाएगा. क्योंकि समुद्र भरा होगा. इसके अलावा हाई टाइड और चक्रवात दो ऐसे कारक हैं जिससे पानी शहर के बहुत भीतर तक समा जाएगा और जब पानी शहर में भीतर घुसेगा तो शहरों के बुनियादी ढांचे, ड्रेनेज सिस्टम, ट्रांसपोर्ट, बिजली, सड़क आदि नेटवर्कों को भारी नुकसान पहुंचेगा. इसके अलावा सबसे बड़ा दुष्परिणाम समुद्र का खारा पानी भूगर्भ जल के ताजे पानी में मिल जाएगा, जिससे महामारी का खतरा बढ़ेगा. कृषि भी नष्ट होगी. लोग दूषित पानी पीयेंगे. बीमार होंगे और अकाल मौत के शिकार होंगे.
रिपोर्ट के अनुसार समुद्र तट पर स्थित कोलकाता के अधिकांश इलाके एक दिन समुद्र में होंगे. इसी तरह से मुंबई के एक बड़ी आबादी वाले स्थल के भी समुद्र में विलीन हो जाने का खतरा बढ़ रहा है. ढाका भी समुद्र में डूबेगा. भारत के दोनों शहरों और बांग्लादेश के ढाका में रहने वाले कम से कम एक करोड़ 40 लाख लोगों के मकान हमेशा के लिए पानी में ‘दफन’ जाएंगे. कुछ इसी तरह की बात रिपोर्ट में कही गयी है.
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है. इसमें कहा गया है कि जिस तेजी से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, उससे कोलकाता के साथ ही मुंबई के लाखों लोगों के घर समुद्र में विलीन हो जाएंगे. समुद्र के जल स्तर बढ़ने का एक बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन को माना गया है. विशेषज्ञों ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव की रिपोर्ट का अध्ययन करना शुरू कर दिया है.
संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट बताती है कि समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है. ऐसे में समुद्र के किनारे स्थित दुनिया भर के शहरों और नगरों की आबादी के लिए बड़ा खतरा है. चाहे वह विकसित देश हो या विकासशील देश, सभी के लिए चिंता की बात है. संयुक्त राष्ट्र ने यह रिपोर्ट पिछले दिनों जारी की थी. उसके बाद से इसपर अध्ययन शुरू हो गया है.
समुद्र में जल स्तर बढ़ने के कई दुष्परिणाम सामने आते हैं. मनुष्य का स्वास्थ्य कमजोर होता है. जान माल को नुकसान होता है. मकान, दुकान और सभी तरह के निर्माण ढांचों को नुकसान पहुंचता है. पेयजल सिस्टम को बाधा पहुंचती है. इसके अलावा ऊर्जा Grid, संचार नेटवर्क, भूजल संसाधन, सभी को नुकसान पहुंचता है. वर्तमान में परिवर्तन की गति तेज हो गई है. आने वाला समय और चुनौती पूर्ण होगा.
इसी रिपोर्ट के अनुसार कोलकाता और मुंबई के साथ ही ढाका को भी सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है. कोलकाता और मुंबई के साथ ही ढाका में रहने वाले लोगों के विस्थापन और बेघर होने का खतरा बढ़ गया है. करोड़ों मकान पानी में डूब जाएंगे. हालांकि इसमें वक्त लगेगा. लेकिन मानव की बुनियादी आदतों और जिंदगी जीने के तरीकों को बदलना होगा. समाज और सरकार को भी जोखिम से निबटने के लिए ठोस प्रयास करना होगा.
जलवायु परिवर्तन के कारण कई तरह के प्राकृतिक परिवर्तन हो रहे हैं. नेपाल की त्रासदी जलवायु परिवर्तन की देन है. ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं. महासागरों का पानी गर्म होकर फैल रहा है. रिपोर्ट के अनुसार 2014 से 2023 तक दुनिया भर में समुद्र का जलस्तर प्रत्येक साल 4.7 मिली मीटर बढा है. जबकि 2024 में समुद्र का जलस्तर 5.9 मिली मीटर बढा है. इसका मतलब ग्लोबल वार्मिंग 2024 से तेजी से बढ़ रहा है. महासागरों का पानी बहुत ज्यादा गर्म हो रहा है.
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 में समुद्र का औसत जल स्तर 2024 के रिकॉर्ड हाई लेवल के बराबर ही था. लेकिन 2023 से 2024 के दौरान अल नीनो की वजह से महासागरों का पानी बहुत ज्यादा गर्म हो गया और इसमें लगभग 5 मिली मीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी. भारत के तटीय इलाकों में अल नीनो का ज्यादा असर होता है. यह पहले ही साबित हो चुका है.
जब समुद्र का पानी गर्म होगा तो उसका आकार बढ़ेगा. कोलकाता और मुंबई समुद्र तट पर स्थित हैं. ऐसे में अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक तटीय इलाके समुद्र में समा जाएंगे. ऐसे में रिपोर्ट की गंभीरता को देखते हुए मानवीय प्रयास और जागरूकता की जरूरत महसूस की जा रही है. तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों के रहन-सहन, काम करने तथा अपने आसपास के वातावरण के साथ एक तालमेल बनाने की जरूरत होगी, जो वर्तमान में दिखाई नहीं देता है.
रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की आबादी का लगभग 10% भाग समुद्र के किनारे ऐसी जगह पर रहता है, जहां उच्च ज्वार का खतरा बना रहता है. ये इलाके हमेशा संवेदनशील रहते हैं और वहां खतरा ज्यादा रहता है.हालांकि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कोलकाता और मुंबई के डूब जाने की कोई निश्चित तारीख नहीं दी गई है. परंतु यह जरूर कहा गया है कि खतरा लगातार बढ़ रहा है और एक निश्चित गति से आगे बढ़ रहा है.
विशेषज्ञ और पर्यावरणविद मानते हैं कि दुनिया भर में कार्बन उत्सर्जन अगर कम नहीं किया गया तो वर्ष 2050 से लेकर 2100 के बीच मुंबई, कोलकाता जैसे शहरों के तटीय इलाके गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं. ऐसे में विशेषज्ञ और वैज्ञानिकों की सलाह से इन खतरों से निपटने के लिए सरकार को तटीय सुरक्षा दीवारों के निर्माण के साथ-साथ ड्रेनेज सिस्टम को पर्यावरण अनुकूल तैयार करने की दिशा में काम करना चाहिए.
