बिमल गुरुंग समय-समय पर अपने बयानों से तूफान लाते रहते हैं. कभी गोरखालैंड को लेकर उनकी आक्रामक शैली, तो कभी जीटीए पर प्रहार. जब से वे दिल्ली से आए हैं, पहाड़ में जब तब नया शिगुफा छोड़ देते हैं. कालिमपोंग की रैली में बिमल गुरुंग ने कहा कि जीटीए के दिन अब गिने चुने रह गए हैं. उनके इस दावे के बाद जीटीए के चेयरमैन अनित थापा से लेकर अन्य सभासदों में भी आश्चर्य और हड़कंप व्याप्त है.कुछ लोग उनके इस बयान को बड़बोलेपन बताते हैं तो कई लोग दिवास्वप्न के रूप में देखते हैं.
पिछले दिनों नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पहाड़ के स्थाई राजनीतिक समाधान के लिए एक त्रिपक्षीय बैठक बुलाई थी. हालांकि इसमें राज्य सरकार का तो कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं हुआ. परंतु पहाड़ के भाजपा और उसके सहयोगी दलों के कई नेता इस बैठक में शामिल हुए थे.इनमें नीरज जिंबा, विशाल लामा, जीएनएलएफ, गोरखा जन मुक्ति मोर्चा आदि के नेता शामिल हुए थे.
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय की अध्यक्षता में हुई बैठक में केंद्र ने स्पष्ट कर दिया कि जीटीए का सर्वांगीण विकास और सुरक्षा के लिए केंद्र हर संभव कदम उठा रहा है. केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि नेपाल, भूटान और बांग्लादेश की सीमा से लगे होने के कारण दार्जिलिंग क्षेत्र की समस्या के संवैधानिक हल के लिए केंद्र पश्चिम बंगाल सरकार के साथ समन्वय में कदम उठाएगा.
जो मंतव्य निकल कर सामने आए हैं, अब उसके अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं. इसमें कई पेच भी हैं तो कई सरल रास्ते भी हैं. पहाड़ के नेता हालांकि बैठक के विस्तार में जाना नहीं चाहते. परंतु जिस तरह से बिमल गुरुंग अपने भाषणों में कहते फिर रहे हैं, उससे जीटीए में जरूर हडकंप मच गया है. विमल गुरुंग ने कहा कि केंद्र सरकार जीटीए को संविधान की छठी अनुसूची के तहत लाकर प्रशासनिक व्यवस्था बदलने पर विचार कर रही है. यह कुछ इस तरह से होगा जैसे असम में बोडोलैंड प्रादेशिक परिषद का गठन हुआ था.
बिमल गुरुंग ने बताया कि जीटीए की नई व्यवस्था से न केवल 11 गोरखा जनजातियों को आदिवासी का दर्जा मिलेगा, बल्कि एक-एक गोरखा का व्यक्तिगत जीवन उपलब्धियां से भरा होगा. अगर छठी अनुसूची का दर्जा मिलता है तो निश्चित रूप से गोरखाओं की पुरानी मांग पूरी होने वाली है. छठी अनुसूची से सीधा आदिवासी आबादी को फायदा मिलने वाला है. अतीत में गोरखा नेशनल लिबरेशन front के संस्थापक सुभाष घीसिंग ने भी छठी अनुसूची के तहत जीटीए को लाने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.
बिमल गुरुंग एक ऐसे नेता हैं जो किसी समय इस सिद्धांत का विरोध किया करते थे. 2007 में उन्होंने गोरखाओं के लिए गोरखालैंड के नारे को बुलंद किया था. 2012 में जीटीए पर समझौते के लिए तैयार हुए. अब एक बार फिर से विमल गुरुंग जीटीए की कार्य शैली पर असंतोष जता चुके हैं और केंद्र से उम्मीद लगाए बैठे हैं कि कुछ ऐसा किया जाए कि जीटीए का यहां से वजूद ही मिट जाए. उन्हें लगता है कि गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन की नई व्यवस्था होने से गोरखाओं की एक-एक समस्या का हल निकलेगा. हालांकि अभी यह सब दूर की कौड़ी है. परंतु पहाड़ में बयार बह रही है और इस बयार में हर नेता बयार की दिशा में अपनी पीठ करने में जुटा है.
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