पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए यह परीक्षा की घड़ी है. राज्य में टीएमसी नेताओं पर हमले बढ़ गए हैं. उनकी जमीन हाथ से निकलती जा रही है. पार्टी के विधायक बगावत पर उतर गए हैं. वे पार्टी आलाकमान का फैसला नहीं मानने को जैसे मन बन चुके हैं. ममता बनर्जी 2 जून को रानी रश्मोनी रोड पर धरना प्रदर्शन का व्यापक कार्यक्रम बना रही है.
लेकिन उनकी ही पार्टी के विधायक उनसे दूरी बना रहे हैं. अब ममता बनर्जी ने अपनी ही पार्टी के बागी विधायकों को पार्टी से निकालना शुरू कर दिया है. सोमवार को उन्होंने दो टीएमसी विधायकों को पार्टी से निकाल बाहर किया. इस बीच ममता बनर्जी पर मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने एक और मुसीबत खड़ी कर दी है. विधानसभा के भीतर टीएमसी के फर्जी हस्ताक्षर कांड को लेकर सुवेंदु अधिकारी ने सीआईडी जांच का आदेश दे दिया है. शुभेंदु अधिकारी की प्रेस कांफ्रेंस के तुरंत बाद टीएमसी ने अपने दो विधायकों ॠतव्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से बाहर कर दिया.
दरअसल टीएमसी में विपक्ष के नेता पद को लेकर तकनीकी भूल सामने आ रही है. 6 मई को ममता बनर्जी को नेता चुनने का अधिकार दिया गया था. लेकिन तकनीकी तौर पर विधानसभा ने इस फैसले को खारिज कर दिया. इसके बाद 19 मई को बैकडेट में विधायकों के हस्ताक्षर लेने का खेल शुरू हुआ. पार्टी से निष्कासित विधायकों ने विधानसभा के अध्यक्ष से लिखित शिकायत की थी कि हाजिरी बही के हस्ताक्षरों को प्रस्ताव का समर्थन मान लिया गया. इसी शिकायत के आधार पर हेयर स्ट्रीट थाने में मामला दर्ज हुआ था.
रविवार को चुनाव बाद हुई हिंसा में मारे गए टीएमसी कार्यकर्ता के परिवार से मिलने जा रहे अभिषेक बनर्जी पर हमला हुआ. उसके बाद कल्याण बनर्जी पर भी हमला हुआ. रविवार को ममता बनर्जी ने अपने निवास पर पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई थी. लेकिन इस बैठक में 80 में से 60 विधायक पहुंचे ही नहीं. इससे पहले 20 मई को भी ऐसा ही हुआ था, जब कोलकाता में चुनाव के बाद हिंसा और अवैध हाकर्स को हटाने के अभियान के खिलाफ टीएमसी विधायकों का धरना था. लेकिन बैठक में टीएमसी के केवल 35 विधायक ही पहुंचे थे.
विधानसभा चुनाव में टीएमसी की करारी हार ने ममता बनर्जी को भी हैरान कर दिया है. लेकिन वह अपनी हार की निराशा पार्टी विधायकों और कार्यकर्ताओं पर प्रगट होने देना नहीं चाहती है. ममता बनर्जी चाहती है कि मुसीबत की घड़ी में पार्टी में एकजुटता दिखे. तभी अगले विधानसभा चुनाव में टीएमसी भाजपा का एक सशक्त विकल्प बन सकेगी. लेकिन जैसे-जैसे उनका प्रयास इस दिशा में बढ़ रहा है, पार्टी विधायक ही उनसे दूरी बनाने लगे हैं और उन पर तथा अभिषेक बनर्जी पर कई तरह के आरोप लगा रहे हैं. पानी सिर से ऊपर होते देखकर आज ममता बनर्जी ने दो विधायकों को पार्टी से बाहर कर दिया.
टीएमसी के समक्ष जिस तरह की चुनौतियां खड़ी हुई हैं, ऐसी स्थिति में टीएमसी को संभालना कठिन प्रतीत होता नजर आ रहा है. टीएमसी में जैसे बगावत देखी जा रही है. इसके कुछ उदाहरण सामने हैं. पूर्व मंत्री कृष्णनेंदु नारायण चौधरी ने चुनाव में टीएमसी की हार के लिए अभिषेक बनर्जी को जिम्मेदार ठहराया था. उन्होंने ममता बनर्जी को धृतराष्ट्र कहा था, जो सब कुछ देखते हुए भी अभिषेक बनर्जी की तानाशाही नहीं देख रही थी. टीएमसी के वरिष्ठ नेता असित मजूमदार पहले ही कह चुके हैं कि अहंकार और प्रशासनिक निष्क्रियता ने टीएमसी को डुबोया. पूर्व विधायक खगेशवर राय तो मीडिया के सामने कह चुके हैं कि पार्टी में टिकट के बदले पैसे मांगे जाते हैं.
20 मई को टीएमसी सांसद काकोली घोष ने पहले बारासात जिला अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दिया. फिर टीएमसी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया. चुनाव कैंपेन में आईपैक के बढ़ते दखल पर सवाल उठाते हुए काकोली घोष ने कहा था कि पार्टी में अनिर्वाचित लोगों का प्रभाव बढ़ रहा है. टीएमसी में बढते असंतोष का ही यह परिणाम है फलता चुनाव नतीजा आने के बाद उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिलों की सात नगर पालिकाओं में से 100 से ज्यादा पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया है.
जहांगीर खान पहले ही अभिषेक बनर्जी का साथ छोड़ चुके हैं. कई बार ममता बनर्जी को बागी नेताओं को चेतावनी देते हुए भी सुना गया है. जिसको जाना है, वह जा सकते हैं. वह किसी को जबरदस्ती रोककर रखने में यकीन नहीं रखती है. लेकिन ममता बनर्जी के इतना कुछ कह देने मात्र से नहीं होगा. इसके लिए उन्हें अपने पुराने अवतार में लौटने की आवश्यकता होगी. पार्टी के अधिकांश विधायक अभिषेक बनर्जी को पसंद नहीं करते हैं. ममता बनर्जी को पार्टी नेताओं की शिकायत पर गौर करने की जरूरत होगी.
इसके अलावा पार्टी के असंतुष्ट नेता जिन सवालों को उठा रहे हैं, उस पर उन्हें ध्यान देना होगा. हार के बाद जमीनी सच को स्वीकार करने की आदत डालनी होगी. सच को स्वीकार करने और सबके साथ इंसाफ की नीति पर चलना होगा. 2 जून को ममता बनर्जी धरना देने जा रही है. उस दिन उन्हें यह साबित करना होगा कि उनकी भविष्य की रणनीति क्या होगी और टीएमसी को एक जुट रखने के लिए वह कितना त्याग कर सकती हैं. अगर ममता बनर्जी को अपनी पार्टी बचाना है तो उन्हें कुछ ठोस, कठोर और सैद्धांतिक फैसले लेने की जरूरत है.अन्यथा इस पार्टी का भी हाल कांग्रेस और वामपंथ की तरह ही हो जाएगा.
