March 24, 2026
Sevoke Road, Siliguri
प्रमुख हेडलाइंस और अपडेट्स

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का अल्पसंख्यक दुर्ग कितना मजबूत!

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उत्तर बंगाल दौरे पर हैं. पहले एस आई आर और अब हुमायूं कबीर की पार्टी आम जनता उन्नयन पार्टी तथा असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ए आई एम आई एम ने उनकी टेंशन बढ़ा दी है. हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी का गठबंधन चुनाव लड़ रहा है. हुमायूं कबीर इनमें से लगभग 100 सीटों पर अल्पसंख्यक उम्मीदवार उतार रहे हैं. यही ममता बनर्जी के लिए टेंशन का कारण है तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी की उत्साह बढ़ाने वाली खबर है.

बंगाल में लगभग 30% अल्पसंख्यक समुदाय है, जिनका वोट टीएमसी को जाता रहा है. ममता बनर्जी पूर्व के चुनाव तक आश्वस्त रहती आई है कि अल्पसंख्यक वोट उनकी पार्टी को जाएगा. परंतु इस बार अल्पसंख्यक किधर जाएंगे, यकीन के साथ कुछ कहा नहीं जा सकता है. क्योंकि मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में छोटे अल्पसंख्यक संगठनो की सक्रियता बढ़ गई है. उधर कांग्रेस ने भी जोरदार वापसी की है. पूरे बंगाल की 294 सीटों में से 114 सीटों पर अल्पसंख्यक निर्णायक भूमिका में रहते हैं.

भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी अपने भाषणों में कहते फिर रहे हैं कि ममता बनर्जी का अल्पसंख्यक दुर्ग लगातार दरक रहा है अर्थात इस बार के चुनाव में पश्चिम बंगाल का अल्पसंख्यक वर्ग उनका साथ नहीं देगा. अल्पसंख्यकों को एक विकल्प मिल गया है. ओवैसी, हुमायूं और नौशाद लगातार टीएमसी पर हमले कर रहे हैं. वे कहते हैं कि टीएमसी अल्पसंख्यकों को सिर्फ दूध देने वाली गाय समझती है. उसने मुसलमानों को वास्तविक विकास से दूर रखा है. इस गठबंधन ने दावा किया है कि अगर बंगाल में त्रिशंकु सरकार बनती है तो सरकार में मुस्लिम उपमुख्यमंत्री का प्रस्ताव रखा जाएगा.

राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि इस बार के चुनाव में छोटे दलों की उपेक्षा नहीं की जा सकती है. दक्षिण 24 परगना की भांगढ़ विधानसभा सीट से नौशाद सिद्दीकी युवा मुस्लिम मतदाताओं के बीच पैठ बना रहे हैं. जबकि हुमायूं कबीर बाबरी मस्जिद से सुर्खियों में आए हैं और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का भरोसा जीतने में लगे हैं. उन्हें सफलता भी मिल रही है. उधर ओवैसी भी पूरी मेहनत कर रहे हैं और अल्पसंख्यक वर्ग के अधिकार की लड़ाई लड़ने का दावा कर रहे हैं.

फिररहद हकीम जो पश्चिम बंगाल में मंत्री भी हैं, वे पूरे आत्मविश्वास के साथ कहते हैं कि बंगाल के अल्पसंख्यक अच्छी तरह जानते हैं कि केवल टीएमसी ही उनके हितों की रक्षा कर सकती है. ISF अथवा AJUP जैसे संगठन केवल भाजपा की मदद कर रहे है. अल्पसंख्यक हमेशा तृणमूल का साथ देंगे. All बंगाल माइनॉरिटी यूथ फेडरेशन के महासचिव मोहम्मद कमरुज्जमा का विश्लेषण है कि जिन सीटों पर भाजपा थोड़ी कमजोर है, कुछ मतदाता छोटे अल्पसंख्यक गठबंधन अथवा कांग्रेस या वाम मोर्चा की ओर जा सकते हैं. इससे विरोधी वोट बंट सकते हैं और टीएमसी का पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट कुछ क्षेत्रों में नुकसान पहुंचा सकता है.

कांग्रेस नेता अधिरंजन चौधरी का आत्मविश्वास बुलंद है. वह कहते हैं कि 2023 में सागर दिघी उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस को हरा चुके हैं. इस बार भी हराएंगे.अल्पसंख्यक नेताओं और छोटे संगठनों की हलचल को देखते हुए ही सुबेंदु अधिकारी दावा करते हैं कि इस बार के चुनाव में अल्पसंख्यक वोट पूरी तरह ब॔ट जाएगा. हालांकि कुछ राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि ममता बनर्जी के खिलाफ इस तरह की रणनीति पहले भी बनाई जा चुकी है. परंतु विपक्ष को सफलता नहीं मिली.

हां कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक समय था जब अल्पसंख्यक मतदाता टीएमसी के पीछे खड़े रहते थे. यह भाजपा के कारण था. पर अब स्थितियां बदल चुकी है. कुछ छोटे और नए दलों के जमीनी स्तर पर उभरने से छोटे स्तर पर हलचल जरूर पैदा हुई है. पर यह हलचल कितनी बड़ी है, समय आने पर पता चल जाएगा. इतना तो तय है कि अल्पसंख्यक क्षेत्र में मुकाबला त्रिकोणात्मक होने वाला है. वैसे ममता बनर्जी राजनीति की चतुर खिलाड़ी है. उन्हें पता है कि कब कैसे राजनीति की दिशा बदलनी होती है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *