सोशल मीडिया में एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है. इसमें एक व्यक्ति जो अपनी निजी गाड़ी में सवार है, उसे एक पुलिस अधिकारी रोकता है और कहता है कि आप थाने चलिए. आपकी गाड़ी को चुनाव कार्य के लिए जब्त किया जाएगा. इस पर वह व्यक्ति (गाड़ी मालिक) कानून का हवाला देता है और कहता है कि मैं अपना वाहन स्वयं के लिए इस्तेमाल करता हूं. इसलिए इस पर मेरा हक बनता है. मैं यह चुनाव कार्य के लिए नहीं दे सकता. ऐसा कोई कानून नहीं है. इसी मुद्दे पर दोनों ओर से बहस होती है.
यह बहस का विषय भी बन गया है. चुनाव कार्यो के लिए ढेर सारी गाड़ियों की आवश्यकता होती है. चुनाव कार्य में लगे लोगों के एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने ,सामान को पहुंचाने और दूसरे तरह के कार्यों के लिए गाड़ियों की आवश्यकता होती है. प्रशासनिक अधिकारी गाड़ियों की अपेक्षित संख्या में पूर्ति के लिए निजी वाहन चालकों पर निर्भर रहते हैं और उनकी गाड़ियों को चुनाव पूरा होने तक जब्त कर लेते हैं. हालांकि वाहन मालिक को प्रशासन के नियमों के तहत उचित दैनिक हिसाब से मुआवजा भी दिया जाता है.
अब सवाल यह है कि आखिर प्रशासनिक अधिकारी सड़क पर चलने वाली किन गाड़ियों को रोक सकते हैं? क्या निजी वाहनों को वाहन मालिक की मर्जी के बगैर ले सकते हैं? इस संदर्भ में नियम क्या है? क्या इस बार नए नियम बनाए गए हैं अथवा 2006 के नियम ही लागू रहेंगे? सिलीगुड़ी के गाड़ी मालिक डरे हुए हैं कि पता नहीं कब पुलिस अधिकारी उनकी गाड़ी को जब्त कर लें. जैसे-जैसे चुनाव निकट आता जा रहा है, उनकी बेचैनी और घबराहट भी बढ़ती जा रही है. खासकर ऐसे वाहन चालक जो भाड़ा कमा रहे हैं. उनकी गाड़ी को कभी भी पुलिस चुनाव कार्य के लिए अपनी कस्टडी में ले सकती है?
इस बार पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों को चुनाव आयोग से क्या निर्देश मिला है? चुनाव आयोग के नियम क्या है? पुलिस किस तरह की गाड़ियों को चुनाव कार्यो के लिए इस्तेमाल कर सकती है? यह जानना जरूरी है. इस वीडियो ने कई वाहन मालिकों को डरा दिया है. क्या पुलिस सभी तरह की गाड़ियां उठा सकती है? अगर 2006 के पुराने दिशा निर्देश पर विचार करें तो उसमें साफ कहा गया है कि जिला मजिस्ट्रेट के लिखित आदेश के बिना किसी भी निजी वाहन को पुलिस वाहन मालिक से जबरदस्ती नहीं ले सकती.
2006 के दिशा निर्देशों के अनुसार किसी भी निजी वाहन को चुनावी कार्य में लगाने से पहले संबंधित जिला प्रशासन की अनुमति के अलावा वाहन मालिक को निर्धारित प्रक्रिया के तहत नोटिस देना भी अनिवार्य है. इसके बाद वैधानिक कागजी प्रक्रिया पूरी करने के बाद ही ऐसी गाड़ियों का प्रशासन इस्तेमाल कर सकता है. आखिर निजी वाहन मालिक चुनाव कार्य के लिए अपनी गाड़ियों को देना क्यों नहीं चाहते हैं?
इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि प्रशासन के द्वारा गाड़ी मालिकों को बहुत ही कम मुआवजा दिया जाता है, जो ऊंट के मुंह में जीरे के समान होता है. यही कारण है कि निजी वाहन मालिक अपनी गाड़ियों को चुनाव ड्यूटी में देने से कतराते हैं. परंतु एक अच्छी खबर उनके लिए हो सकती है, क्योंकि राज्य सरकार के परिवहन विभाग ने निजी वाहनों को कस्टडी में लेने से पहले उनके दैनिक किराए की दरों में बढ़ोतरी कर दी है. अर्थात चुनावी कार्यों के लिए ली जाने वाली गाड़ियों का दैनिक या मासिक मुआवजा बढ़ा दिया गया है, जो शायद निजी वाहन मालिकों को अच्छा लगे.
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि इस बार 2006 के नियम और निर्देश चलेंगे या फिर पुराने नियमों को बदला जाएगा. जो भी हो, सिलीगुडी के वाहन मालिकों के हृदय की धड़कनें बढ़ती जा रही है. अगर उनकी गाड़ी को जब्त किया जाता है तो वह क्या करेंगे? कई वाहन मालिकों ने तो अभी से ही अपनी गाड़ियों को गैरेज में ही रखना शुरू कर दिया है.
निजी वाहन मालिकों से बातचीत करने से पता चला कि सवाल सिर्फ मुआवजे के पैसे का नहीं होता है. सवाल प्रबंधन का है. उनकी नजर में पुलिस प्रशासन निजी वाहनों को अपनी कस्टडी में लेने के बाद उसे लावारिस स्थिति में रखती है. पैसा कम और गाड़ियों की धुनाई ज्यादा होती है. 10-15 दिन में ही गाड़ियों की हालत खराब हो जाती है. यही कारण है कि वाहन मालिक अपनी गाड़ियों को देने से बचना चाहते हैं.
