सिलीगुड़ी के इतिहास में कदाचित यह पहला मामला है, जो एक सस्पेंस थ्रिलर की तरह कानून और न्याय को ही डराने लगा है. इस केस का क्लाइमेक्स क्या होगा, यह कोई नहीं जानता है. खुद पीड़ित पक्ष के लोग भी नहीं जानते हैं. मृतक पक्ष इस केस से हाथ खींच चुका है. इसलिए यह केस खुद ही कमजोर पड़ गया है.अब तो एक अन्य पीड़ित पक्ष के भरोसे ही केस को आगे बढ़ाया जा सकता है. पर आखिर कब तक?
यह सवाल इसलिए उठ रहा है, क्योंकि जिस बहन ने अपने मृतक भाई की आत्मा को इंसाफ दिलाने के लिए आरोपी को सजा दिलाने का बीड़ा उठाया था, वही खुद कमजोर पड़ चुकी है. न केवल कमजोर पड़ चुकी है, बल्कि उसने केस से ही हाथ वापस खींच लिया है. तर्क दे रही है कि वह गर्भवती है. गरीब है. शारीरिक और मानसिक परेशानी झेल रही है. वह अदालत का चक्कर लगाना नहीं चाहती है. इसलिए केस से हाथ वापस खींच रही है.
लेकिन क्या यह गले से उतर रहा है? हर कोई चकित है. आखिर रातों-रात ऐसा क्या हो गया? उस मोहल्ले से लेकर, जहां मृतक पक्ष के लोग रहते हैं, कोर्ट तक सब सन्नाटे में है. अपने जिन शुभचिंतकों की भीड़ को लेकर महिला अदालत में पहुंच जाती थी, उन्हें भी यह ठीक नहीं लगा. उनका भी न्याय, इंसानियत और इंसाफ पर से भरोसा उठने लगा है.
यह वही बहन है, जो प्रत्येक तारीख को अपने शुभचिंतकों के साथ कोर्ट परिसर में धरना देने लग जाती थी. आरोपी को फांसी दिलाने की मांग करती थी. मीडिया में चीखकर इंसाफ की दुहाई देती थी. लेकिन पिछले दिनों उसने कोर्ट में आकर न्यायाधीश के सामने अपने हलफनामे के जरिए कह दिया कि अब वह केस नहीं लडेगी. उसके अचानक इस बड़े फैसले के बाद तो उसका वकील भी भौंचक रह गए. क्योंकि उन्होंने आरोपी को जमानत नहीं देने के लिए ऑब्जेक्शन पेपर सबमिट किया था.
अदालत में कार्रवाई चल ही रही थी कि अचानक फिल्मी से अंदाज में यह घटना घट गई. उसने ना तो अपने वकील से कोई बात की और ना ही सलाह ली. बस आयी और फैसला सुना दिया. कोई देखे नहीं अथवा कोई डिस्टर्ब ना करे, उसने अपने चेहरे पर मास्क लगा रखा था. सवाल है कि आखिर मनु छेत्री ने यह कदम क्यों उठाया? उसके इस फैसले को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई है, जो समाज, कानून तथा न्याय के पक्ष में अच्छा नहीं है.
कानून के जानकार मानते हैं कि मृतक की बहन के केस से हाथ वापस खींच लेने से यह केस कमजोर हो गया है. भले ही दूसरा पीड़ित पक्ष अभी तक इंसाफ की उम्मीद में है, लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि कल इस केस का कोई और टर्निंग प्वाइंट सामने आ जाए. घायल काजल राई अभी भी अपना इलाज करा रही है. उसने इस केस को जीवित रखा है.
देवांशु पाल चौधरी की भले ही जमानत अस्वीकृत हो गई है, लेकिन जब वह अगली पेशी पर अदालत में हाजिर होगा तो उसे खुद ही एहसास हो जाएगा कि बेल मिलने में अब ज्यादा वक्त नहीं लगेगा. कुछ वकीलों का भी यही कहना है कि यह केस अब कमजोर पड़ गया है. हालांकि सिलीगुड़ी कोर्ट के वकील भी चकित हैं और मानते हैं कि मृतक की बहन मनु छेत्री का यह कदम कहीं ना कहीं काफी संदिग्ध है.
वकीलों और बुद्धिजीवों ने कहा है कि कानून और इंसाफ को जीवित रखने के लिए पुलिस को इस पूरे मामले की और गहराई से जांच करने की जरूरत है. पुलिस को यह भी जांच करनी चाहिए कि आखिर मनु छेत्री ने इस केस से हाथ क्यों खींच लिया. क्या उसे जान से मारने की धमकी दी गई थी या फिर कुछ और बात थी?
आपको बता दें कि यह मामला 19 फरवरी की देर रात की है. पानी टंकी मोड़ के नजदीक सेवक रोड पर एक तेज रफ्तार वाली कार ने सड़क पर चलते प्रेमी युगल को कुचल दिया था. इस हादसे में शंकर छेत्री की मौके पर ही मौत हो गई. जबकि युवती काजल राई गंभीर रूप से घायल हो गई और अभी भी अस्पताल में चिकित्सारत है.
दुर्घटना के बाद चालक देवांशु पाल चौधरी फरार हो गया था. उसने अपनी कार को सेवक रोड स्थित एक कार शोरूम के सर्विस सेंटर में छिपा दिया था. अगले दिन पुलिस ने दुर्घटना के सीसीटीवी फुटेज और तकनीकी सबूत के आधार पर सर्विस सेंटर से कार बरामद करने में सफलता पायी. इसके बाद पुलिस ने देवांशु पाल चौधरी को गिरफ्तार कर लिया था.
