सिलीगुड़ी से लेकर कोलकाता और पूरे बंगाल में राजनीतिक सरगर्मी शीर्ष पर है. सिलीगुड़ी में विभिन्न दलों के उम्मीदवार जनसंपर्क, रैलियां, रोड शो के साथ ही अपनी-अपनी जीत और सरकार बनाने के दावे कर रहे हैं. हालांकि बंगाल में मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच है. परंतु कांग्रेस भी अपनी जीत ही नहीं, बल्कि राज्य में सरकार बनाने का दावा भी कर रही है. चाय चर्चा में इस पर एक अच्छा खासा मजाक बन जाता है.
उम्मीदवार, नेताओं और राजनीतिक दलों के दावे अपने अपने हैं. पर जो लोग उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला करते हैं, उनकी बात कोई नहीं सुनता है. ऐसे लोगों को प्रभावित करने के लिए राजनीतिक दलों की ओर से योजनाएं, भविष्य में किए जाने वाले काम और लाभ गिनाए जा रहे हैं. लेकिन चाय की दुकानों पर आम लोगों की होने वाली चर्चा राज्य में बनने वाली नई सरकार की दिशा में बहुत कुछ संकेत देती है. बस उनके दिल की धड़कन सुनने की जरूरत होती है.
सिलीगुड़ी में ही नहीं, बल्कि पूरे बंगाल में, छोटे बड़े शहर, कस्बे, बस्ती में रोजाना सुबह शाम चाय की दुकानों पर चाय की चुस्कियों और मोबाइल के बीच लोगों का एक ही सवाल रहता है कि आखिर राज्य में सरकार किसकी बनेगी. बीजेपी या टीएमसी? सिलीगुड़ी में सुबह-सुबह चाय स्टाल पर कुछ अखबार, मोबाइल, दो चार दस लोग, भट्टी और कांच के गिलासों के बीच और कोई चर्चा हो या नहीं हो, यह चर्चा अवश्य सुनी जा सकती है कि उनके उम्मीदवार, नेता या दल, उनके वादे, उनका काम कितने विश्वसनीय हैं.
क्या उनके वादों पर भरोसा किया जा सकता है? और भी बहुत कुछ चुनावी मुद्दे होते हैं. उनका भी हिसाब किताब लोगों के बीच एक बहस के रूप में शुरू होती है, जो कभी कभी उग्र भी होती जाती है. कई बार चाय वाले को भी हस्तक्षेप करना पड़ता है. चाय की चुस्की कभी-कभी एक तीखा विवाद भी उत्पन्न कर देती है. कुछ पार्टी समर्थक होते हैं तो कुछ लोग किसी पार्टी के नहीं होते. ऐसे लोग माहौल देखकर बात करते हैं या फिर चुपचाप उठकर चले जाते हैं.
पूरे बंगाल में हर जगह चाय की दुकानों पर चुनाव में चर्चा का माहौल परिवर्तन से लेकर स्थायित्व, गरम, जीवंत और तीखा होता जा रहा है. सिलीगुड़ी के जलपाई मोड में एक चाय की दुकान पर सुबह सवेरे 6:00 बजे ही चर्चा शुरू हो जाती है. अखबार टेबल पर होते हैं. कुछ लोग बैठकर चाय पी रहे होते हैं. मोबाइल भी देखते हैं, क्या ताजा समाचार है और फिर चर्चा शुरू होती है.
कई लोग बेरोजगार युवा भत्ता की बात करते हैं तो कई लोग नौकरी की बात करने लगते हैं. बेरोजगारी भत्ता जरूरी है या नौकरी? शिक्षा जरूरी है या शिक्षा के वादे? बस यहीं से बात शुरू होती है. कुछ देर के बाद चाय की चुस्की समाप्त कर लोग अपने-अपने गंतव्य को लौट जाते हैं. उनके मन में अनिश्चितता चल रही है. जैसे किसी भी बिल को पास कराने के लिए संसद में चर्चा होती है. इसी तरह से राज्य में किस पार्टी की सरकार बने, चाय की दुकानों पर राजनीतिक मुद्दों को लेकर हिसाब किताब पर चर्चा होती है.
कुछ लोग कहते हैं कि बंगाल में उद्योग धंधे नष्ट हो गए हैं. पलायन बढा है. इसका जिम्मेदार कौन है? कुछ लोग यह भी कहते हैं कि आखिर बेरोजगारों को भत्ता तो मिल ही रहा है. सवाल उठाया जाता है कि नौकरी जरूरी है या भत्ता? पर नौकरी कौन देगा? क्या परिवर्तन से बंगाल की समस्या का समाधान हो जाएगा? जवाब किसी के पास नहीं होता है.
कुछ लोग राजनीतिक दलों के वादों पर भी भरोसा नहीं करते. कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि चुनाव में नोटा का प्रयोग किया जाए. लोगों के लिए विकास जरूरी है ना कि आफर. बंगाल में सरकारी अस्पतालों की स्थिति में गिरावट आई है. स्थानीय और भी कई समस्याएं हैं. उनकी भी चर्चा होती है और यह भी चर्चा होती है कि उनके सांसद या विधायक ने क्या किया? या किया भी तो कितना किया?
बिजली, पानी, जल भराव, राशन, सरकारी योजनाएं, सड़क पर चर्चा होती है और फिर एक ही सवाल? आखिर 5 साल किस दल को दें? फिलहाल लोग तय नहीं कर पा रहे हैं. जैसे-जैसे मतदान की तिथि नजदीक आती जाएगी, चाय की दुकानों पर गणित का काम भी पूरा हो चुका होगा और इसके बाद मतदाताओं का फैसला सामने आएगा कि उनके लिए कौन सबसे ज्यादा भरोसेमंद है.
