सोमवार यानी 29 जून पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया तूफान खड़ा होने वाला है. राज्य सरकार की ओर से इसकी तैयारी तेज हो गई है तो दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियों की ओर से हंगामा और विरोध की रणनीति तैयार की जा रही है. दरअसल राज्य की शुभेंदु अधिकारी सरकार एक ऐसा विधेयक लाने जा रही है जो देश की आजादी के बाद कांग्रेस से लेकर वाममोर्चा और टीएमसी तक किसी का साहस नहीं हो सका.
राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा सरकार ने अपने संकल्प पत्र की घोषणाओं पर अमल करना शुरू कर दिया है तो दूसरी तरफ राज्य में सभी स्तरों का बदलाव की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है. एक महीने से अधिक हुई इस सरकार ने ताबड़तोड़ फैसले लेने शुरू कर दिए हैं. भ्रष्टाचार पर अंकुश के साथ ही दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई, शासन व्यवस्था को सुदृढ़ करने, पारदर्शी बनाने और कानून का राज स्थापित करने की दिशा में कई बड़े बदलाव किए गए हैं. अब इस सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लेने का साहस दिखाया है.
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने फैसला किया है कि राज्य में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू किया जाएगा. 29 जून को इसी सत्र में सरकार विधेयक ला सकती है. सरकार का मानना है कि अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानून के स्थान पर एक समान नागरिक कानून लागू होने से न्यायिक व्यवस्था अधिक पारदर्शी और प्रभावी बन सकेगी. इसके साथ ही महिलाओं को समान अधिकार प्रदान करने की दिशा में भी यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा. इससे राज्य में बदलाव आएगा और चहुमुखी विकास होगा.
हालांकि राजनीतिक विश्लेषक आने वाले तूफान की ओर इशारा कर रहे हैं. उनका मानना है कि यह विधेयक बंगाल में एक तूफान खड़ा कर सकता है. भाजपा एक तरफ जहां महिलाओं के अधिकार, समान कानून और सुशासन से जोड़कर जनता के सामने रखने का प्रयास करेगी तो दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियां इसे धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का मुद्दा उठाकर पुरजोर विरोध कर सकती है. राज्य में टीएमसी के कमजोर होने के बाद कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के द्वारा इसका तीव्र विरोध किया जा सकता है. भाजपा की ओर से कहा जा रहा है कि समान नागरिक संहिता किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है.
अगर राज्य विधानसभा में यह विधेयक पारित होता है तो ऐसा करने वाला बंगाल देश का चौथा राज्य बन जाएगा. आपको बताते चलें कि उत्तराखंड, गुजरात और असम में समान नागरिक संहिता यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू हो चुका है. भारतीय जनता पार्टी सरकार की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि इस कानून से विवाह, तलाक, उत्तराधिकार ,गोद लेने और ऐसे कई संबंधित मामलों में सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित हो सकेगी और इससे महिलाओं का आत्मविश्वास तथा उनके अधिकार सुरक्षित होंगे. लैंगिक समानता को भी मजबूती मिलेगी.
लेकिन अगर बंगाल की सामाजिक संरचना, धर्म और संस्कृति के दृष्टिकोण से प्रदेश का अध्ययन करें तो इस प्रदेश में असम की तरह ही कुछ विशेष जनजातीय समुदाय हैं, जहां उनके लिए धर्म, पारंपरिक अधिकार और संस्कृति सर्वोपरि है. प्राचीन काल से चली आ रही कुछ मान्यताएं उनके जीवन का सत्य बन गई है. ऐसे में अगर सरकार समान नागरिक संहिता कानून बनाकर लागू करती है तो इन इलाकों में सामाजिक व्यवस्था और अधिकारों पर बड़ा असर पड़ सकता है. उदाहरण के लिए बंगाल में जंगल महल के कुछ जनजातीय इलाके हैं. इसी तरह से दार्जिलिंग पहाड़ में भी कुछ जनजातीय इलाके हैं, जहां की सामाजिक व्यवस्था और संस्कृति को सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती है.
सूत्र बता रहे हैं कि बंगाल सरकार ऐसे जनजातीय बहुल इलाकों के लिए विशेष प्रावधान कर सकती है. उन्हें कुछ विशेष छूट दी जा सकती है. जो भी हो, बंगाल एक संवेदनशील राज्य है. सरकार को यहां की डेमोग्राफी की व्यापक तैयारी और समीक्षा के बाद ही इस दिशा में सोच समझकर कदम उठाने की जरूरत है. जल्दबाजी में विधेयक लाने और कानून बनाने से बात बिगड़ भी सकती है. बहरहाल भाजपा सरकार को ही अंतिम निर्णय लेना है. अब सबकी नजर सोमवार पर टिकी है.
