मीडिया खबरों में रोगी पक्ष की ओर से दावा किया जा रहा है कि सिलीगुड़ी के निकट एक निजी अस्पताल में रोगी का बैंडेज, एक्स-रे और टांके लगाने जैसी चिकित्सा सेवाओं के लिए निजी अस्पताल प्रबंधन की ओर से मरीज के परिवार को 1,28000 का बिल दिया गया. दूसरी तरफ अस्पताल प्रबंधन की ओर से दावा किया गया है कि मरीज का ऑपरेशन हुआ. यह ऑपरेशन 4 घंटे तक चला और इस चिकित्सा के आधार पर बिल 1,28000 का बनाया गया.
अब सवाल यह है कि रोगी पक्ष सही बयान दे रहा है या फिर अस्पताल प्रबंधन की ओर से जो कहा जा रहा है, वही सही है. हालांकि यह जांच का विषय है और माटीगाड़ा थाना की पुलिस मामले की जांच कर रही है. आपको बताते चलें कि पिछले दिनों इस अस्पताल में सड़क दुर्घटना में घायल एक युवक को इलाज के लिए लाया गया था. यह युवक उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल का कर्मचारी है. परंतु उसने अपनी चिकित्सा सरकारी अस्पताल में ना करा कर निजी अस्पताल में कराई .कारण क्या है, यह तो वही जाने.
परंतु एक सवाल जरूर उठ रहा है कि क्या सरकारी अस्पतालों में बदइंतजामी है या फिर मरीज के इलाज में लापरवाही होती है. क्या सरकारी अस्पतालों में आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था के नाम पर सिर्फ खाना पूरी होती है या वास्तव में संसाधन होते ही नही हैं. जबकि दूसरी तरफ निजी अस्पतालों में रोगी की चिकित्सा सरकारी अस्पतालों के मुकाबले अच्छी और देखभाल भी अच्छी होती है. क्योंकि वहां आपसे पैसे लिए जाते हैं. सरकारी अस्पतालों में मरीज से पैसे नहीं लिए जाते.इसलिए वहां अमूमन इलाज के नाम पर लापरवाही अधिक देखी जाती है.
निजी अस्पतालों के महंगे इलाज को लेकर रोगी और प्रबंधन पक्ष के बीच अक्सर तकरार होती रहती है. आरोप लगते रहते हैं कि प्रबंधन पक्ष की ओर से अनाप-शनाप बिल बनाए जाते हैं. उनकी तरफ से इलाज के खर्च के हिसाब में कोई पारदर्शिता नहीं रखी जाती और औसत बिल बना कर मरीज के रिश्तेदार को पकड़ा दिया जाता है. कभी-कभी तो यह बिल मरीज की सामाजिक स्थिति और जेब को देखकर बनाया जाता है.
एक अमीर और धनवान व्यक्ति निजी अस्पतालों के भारी भरकम बिल का तो आसानी से भुगतान कर देता है. परंतु एक गरीब व्यक्ति के लिए यह काफी कठिन होता है. और तब प्रबंधन पक्ष और मरीज पक्ष के बीच कहा सुनी और लड़ाई झगड़े शुरू हो जाते हैं.
कई बार निजी अस्पताल रोगी को भर्ती करते समय रोगी पक्ष से एक मोटी रकम अग्रिम भुगतान के नाम पर जमा कर लेते हैं. हालांकि यह वैधानिक नहीं होता है. कानून इसकी कतई इजाजत नहीं देता. अगर मरीज के पास पैसे नहीं हो तो क्या इलाज नहीं होगा? दरअसल बाद में प्रबंधन और रोगी पक्ष के बीच मामला बिगड़ ना जाए, यह देखते हुए निजी अस्पताल प्रबंधन रोगी के परिवार से पैसे जमा कर लेता है.
यह सही है कि निजी अस्पतालों में इलाज सरकारी अस्पतालों के मुकाबले अच्छा होता है और वहां मरीज की अपेक्षाकृत अधिक देखभाल की जाती है. रोगी पक्ष के लोग यही उम्मीद रखते हैं कि निजी अस्पताल प्रबंधन जब बिल बनाए तो उनका बिल तर्क संगत और यथार्थ पूर्ण हो. ना कि मनमाना बिल बनाकर रोगी पक्ष को परेशान किया जाए.
मरीज या मरीज के परिवार को अधिकार है कि वह इलाज की फीस और अन्य खर्चो का अस्पताल प्रबंधन से सही-सही हिसाब ले. अस्पताल प्रबंधन का दायित्व है कि वह मरीज के रिश्तेदार को कन्वींस करे. अगर ऐसा होता है तो मरीज पक्ष और अस्पताल प्रबंधन के बीच कभी झगड़े वाली बात ही नहीं बनेगी. क्योंकि मरीज पक्ष भी जानता है कि निजी अस्पतालों में इलाज महंगा होता है पर इतना महंगा नहीं कि उसे दिया ही नहीं जा सके.
कुछ निजी अस्पताल इलाज के नाम पर जब महंगा डोज देने लगते हैं तो स्थिति खराब होने लगती है. मरीज और अस्पताल प्रबंधन के बीच अच्छे संबंध बहाल हो, इसके लिए निजी अस्पतालों को अच्छी सेवा तथा वाजिब बिल बनाने की जरूरत है. कुछ रोगी या रोगी के रिश्तेदार इस स्थिति में नहीं होते कि वह अस्पताल का महंगा बिल भुगतान कर सकें. ऐसे में निजी अस्पतालों को लचीला रूख अपनाना चाहिए और मरीज के रिश्तेदार को परेशान नहीं करना चाहिए.
वहीं सरकारी अस्पतालों में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए कि रोगी का भरोसा कायम हो सके. अगर रोगी पक्ष तथा अस्पताल प्रबंधन दोनों ही जिम्मेदारी पूर्ण व्यवहार करें तो भविष्य में किसी भी तरह की अनहोनी घटनाओं से बचा जा सकता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में सिलीगुड़ी में इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति कम से कम हो सके. इसके लिए सरकार और स्वास्थ्य प्रशासन को भी आगे आने की जरूरत है.
