August 8, 2026
Sevoke Road, Siliguri
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सिलीगुड़ी में रेलवे की जमीन खाली होगी या बढ़ेगी ‘रार’?

सिलीगुड़ी में एनजेपी रेलवे स्टेशन का आधुनिकीकरण किया जा रहा है. इसके साथ ही सिलीगुड़ी जंक्शन का भी आधुनिकीकरण होगा. सिलीगुड़ी टाउन स्टेशन का भी कायाकल्प किया जाएगा. जाहिर सी बात है कि रेलवे के द्वारा आधुनिकीकरण और विस्तार की योजनाओं को जमीन पर उतारने के लिए रेलवे को अधिक से अधिक जगह की जरूरत है. क्योंकि जब तक रेलवे के पास जगह पर्याप्त नहीं होगी, कोई भी रेलवे विकास परियोजना मूर्त रूप नहीं ले सकती है.

जब सिलीगुड़ी एक छोटा सा कस्बा और वीरान इलाका था तो यहां आबादी और व्यापार बढाने के लिए उस समय की वाममोर्चा सरकार ने व्यापारियों और आम आदमी को पूरी छूट दे दी. सरकारी प्रोत्साहन के बाद अनेक लोगों ने रेलवे की जमीन पर घर और दुकान बसाना शुरू कर दिया. लेकिन तब ना तो सरकार को और ना ही लोगों को लगा था कि एक दिन सिलीगुड़ी विकसित शहरों की श्रेणी में शुमार होगा.

किसी ने सोचा नहीं था कि सिलीगुड़ी में रेलवे स्टेशन के साथ-साथ रेल संसाधनों का विकास होगा. आज समय के साथ सिलीगुड़ी शहर आधुनिक स्वरूप लेता जा रहा है. आबादी बढी है. सुख सुविधाओं के साथ ही विलासिता भी बढी है. आबादी बढ़ने के साथ ही वर्षों पहले रेलवे की जमीन पर बनाए गए मकान और दुकान लोगों की रोजी-रोटी और बस्ती के रूप में विकसित हो गये है.

अब रेलवे चाहता है कि लोग उसकी जमीन खाली करें ताकि रेलवे सुरक्षा, परियोजना और यात्री सुविधाओं का विस्तार किया जा सके. दूसरी तरफ रेलवे की जमीन पर बसे सिलीगुड़ी के लोगों का कहना है कि उन्हें रेलवे विकास से कोई आपत्ति नहीं है. वे खुद चाहते हैं कि यहां रेल परियोजनाओं का विकास हो. परंतु रेलवे को भी यह ध्यान रखना होगा कि वर्षों पहले यहां बसे लोगों को उनके हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता है. पहले उन लोगों का पुनर्वास हो, इसके बाद रेलवे यहां विकास कार्य करे, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी.

भारतीय रेलवे के पास इसका कोई जवाब नहीं है. रेलवे की एक ही रट है कि लोग उसकी भूमि से बेदखल हो जाए. स्थानीय लोग यह मानने को तैयार नहीं है. उन्हें पहले पुनर्वास चाहिए. फिर वे रेलवे की जमीन को खाली करेंगे. इसी बात को लेकर सिलीगुड़ी में पिछले कई दिनों से रेलवे पुलिस और स्थानीय लोगों के बीच रार चल रही है. रेलवे पुलिस और आरपीएफ के लोग जबरन रेलवे की जमीन से लोगों को हटाना चाहते हैं. इसी के विरोध में पिछले कुछ दिनों से सिलीगुड़ी में हंगामा चल रहा है.

अब तो रेलवे प्रशासन के द्वारा सिलीगुड़ी और आसपास की जमीन पर बने अवैध कब्जे और निर्माण के खिलाफ नोटिस अभियान शुरू कर दिया गया है. रेलवे प्रशासन ने रेल की जमीन पर बने मकान और दुकानों के मालिकों को नोटिस जारी कर दिया है. इससे हजारों परिवारों और व्यवसाईयों को सुरक्षा की चिंता सताने लगी है. इस मामले में कुछ राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के कूदने से यह पूरा मामला राजनीतिक स्वरूप लेता जा रहा है.

पिछले दिनों सिलीगुड़ी जंक्शन रेलवे स्टेशन के समीप एक नंबर इलाके में उस समय तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई, जब रेलवे सुरक्षा बल की टीम अवैध निर्माण हटाने के लिए मौके पर पहुंची. स्थानीय लोगों ने भारी विरोध किया. रेलवे पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन किया. परिणाम स्वरूप आरपीएफ को बिना कार्रवाई किए ही वापस लौटना पड़ा. इस प्रदर्शन का नेतृत्व पूर्व पार्षद संजय पाठक कर रहे थे. उधर भाजपा एक नंबर वार्ड के कोऑर्डिनेटर कन्हैया पाठक भी स्थानीय लोगों के साथ खड़े नजर आ रहे हैं.

उन्होंने साफ कहा है कि किसी का भी घर टूटने नहीं देंगे. बहरहाल इस पर राजनीति खूब हो रही है. विरोधी नेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहे हैं तो भाजपा ने भी स्थानीय लोगों का साथ देकर अपनी राजनीतिक पैठ बनाना शुरू कर दिया है. अब सवाल है कि रेलवे प्रशासन रेलवे की जमीन पर बसे लोगों के पुनर्वास की तत्काल व्यवस्था नहीं कर सकती तो दूसरी तरफ स्थानीय लोग अपना घर बार दुकान छोड़ने के लिए तैयार नहीं है. ऐसे में रेलवे विकास परियोजनाओं का क्या होगा?

क्या रेलवे प्रशासन चुपचाप बैठा रहेगा या फिर अपनी परियोजनाओं को मूर्त रूप देने के लिए बल का प्रयोग करेगा? स्थानीय प्रशासन और रेलवे अधिकारियों के सामने कानून व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ मानवीय पहलुओं को संतुलित करने की भी बड़ी चुनौतियां हैं. स्थानीय लोगों की अपनी समस्याएं है.उनकी मांग भी उचित है. अगर रेलवे प्रशासन ने शुरू में ही कार्रवाई की होती तो आज यह स्थिति नहीं आती.

दूसरी तरफ रेलवे की जमीन में बसे लोगों का तर्क भी अपनी जगह सही है पिछले 30-40 वर्षों में रेलवे या राज्य सरकार को कभी सुध नहीं आई. अब उन्हें अपने मकान और दुकान से वंचित करने के लिए दबाव दिया जा रहा है, तो वह जाएं कहां? इस स्थिति में रेलवे को उनके पुनर्वास की व्यवस्था को लेकर मानवीय दृष्टिकोण से विचार करना चाहिए. बहर हाल देखना होगा कि स्थानीय लोगों और रेलवे प्रशासन के बीच चला आ रही रार का क्या अंत होता है.

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