जब ठंड ठिठुराने वाली हो तो बरबस मुंह से निकलता है कि उफ! यह ठंड तो जान ही ले लेगी! अब तक इस तरह की ठंड का एहसास भले ही आपको हुआ हो, लेकिन इस बार शायद आप यह नहीं कह सकेंगे कि उफ! यह ठंड तो जान ही ले लेगी!
पिछले कुछ वर्षों से सिलीगुड़ी में सर्दी का एहसास धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. कभी यहां लहू को जमा देने वाली ठंड पड़ती थी. बारिश भी उसी तरह से होती थी. सिलीगुड़ी के लोग बताते हैं कि किसी समय सिलीगुड़ी में नवंबर उत्तरार्द्ध से ही कयामत की ठंड शुरू हो जाती थी. लोग अलाव से चिपक कर रह जाते थे. कई कई दिनों तक शीतलहरी चलती थी, तो ऐसा लगता था जैसे शरीर में दौड़ रहा खून जम गया हो.
जनवरी महीने में तो ठंड एक नया रिकॉर्ड बना देती थी. बच्चों को घर से बाहर नहीं निकाला जाता था. कई बुजुर्ग लोगों की ठंड नहीं सहने के चलते मृत्यु हो जाती थी. हर घर में ठंड का असर पड़ता था. बड़े बुजुर्ग, बीमार, वृद्ध लोगों की ठंड से जनवरी-फरवरी में मौत हो जाती थी. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ना तो वैसी ठंड देखी गई और ना ही बारिश और अब खासकर इस साल आपको कदाचित भीषण ठंड की अनुभूति नहीं होगी.
जानते हैं ऐसा क्यों हो रहा है? दरअसल अल-नीनो लगातार मजबूत होता जा रहा है. इसने मौसम को प्रभावित करना शुरू कर दिया है. रिपोर्ट बताती है कि दिसंबर महीने में जब ठंड अपने चरम की ओर बढ रही होती है, उस समय यहां अल-नीनो सबसे मजबूत स्थिति में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकता है. यानी दिसंबर महीने में भीषण ठंड का सामना सिलीगुड़ी के लोगों को नहीं करना पड़ सकता है.
वैज्ञानिकों ने चेताया है कि प्रशांत महासागर का तापमान रिकॉर्ड तोड़ने वाला है. इससे दुनिया के कई हिस्सों में भीषण गर्मी बढ़ जाएगी. गर्मी बढ़ने से बारिश का पैटर्न भी बदलेगा.इस स्थिति में या तो बाढ़ आएगी या फिर भीषण सूखा पड़ सकता है. WMO की रिपोर्ट बताती है कि कम से कम अल नीनो फरवरी 2027 तक बना रह सकता है. इस स्थिति में इस साल ठंड पड़ने के आसार कम नजर आ रहे हैं.
हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि ठंड पड़ेगी ही नहीं. बल्कि यह कहना सही रहेगा कि ठंड तो पड़ेगी, लेकिन मुंह से यह नहीं निकलेगा कि उफ! ऐसी ठंड तो कभी पड़ी ही नहीं! कम से कम मैदानी क्षेत्रों में तो इस तरह की भीषण ठंड नहीं पड़ेगी. मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि इस साल भारत में ठंड कम पड़ने का अनुमान है.
आपको बताते चलें कि अल-नीनो के कारण समुद्र और हवा के बीच गर्मी या तापमान का लेन देन बदल जाता है. इससे मौसम प्रभावित होता है. बारिश के पैटर्न पर भी असर पड़ता है. हालांकि यह भूखंड और स्थिति पर निर्भर करता है. हालांकि वैज्ञानिकों की तरफ से अभी अध्ययन किया जा रहा है, इसलिए निष्कर्ष के रूप में इसे नहीं देखना चाहिए. हालांकि मोटे तौर पर यह एक अनुमान है कि इस साल भारत में ठंड कम पड़ेगी.
आपको बताते चलें कि अल नीनो प्रशांत महासागर में उत्पन्न होने वाली एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक हो जाता है. अल-नीनो को बेहतर तरीके से समझने के लिए यह कह सकते हैं कि इसके कारण वैश्विक स्तर पर मौसम चक्र प्रभावित होता है.
सामान्य दिनों में पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली व्यापारिक पवन प्रशांत महासागर के गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती है. दक्षिण अमेरिका के तट पर नीचे से ठंडा पानी ऊपर आता है, जिससे वहां का तापमान संतुलित रहता है. अल नीनो के काम करने का यही तरीका है.
