एक तरफ दार्जिलिंग, समतल और Dooars के कुछ भागों में अलग राज्य गोरखालैंड को लेकर दबी जुबान से चर्चा चल रही है. इसमें सिक्किम को भी शामिल करने की अफवाह उड़ायी जा रही है. हालांकि ना तो किसी अधिकृत या जिम्मेदार नेता की ओर से इस तरह का कोई बयान सामने आया है और ना ही भाजपा अथवा भाजपा के सहयोगी दलों की ओर से स्पष्ट रूप से कुछ कहा गया है. हां, पहाड़ के कुछ छुटभैये नेता उस आग को जरूर सुलगाने में लगे हैं ,जिसकी बरसों पहले उठी चिंगारी की लपटों में अनेक जान माल तबाह हो गए थे.
गोरखा लैंड का आंदोलन काफी पुराना है. सर्वप्रथम गोरखाओं ने पहचान और प्रशासनिक अलगाव को लेकर 1907 में आवाज उठाई थी. तब राज्य में अंग्रेजी सरकार थी. अखिल भारतीय गोरखा लीग तथा दूसरे संगठनों ने ब्रिटिश शासकों के समक्ष यह मांग उठाई थी. 1947 में भारत की आजादी के साथ ही पश्चिम बंगाल के अंतर्गत दार्जिलिंग को शामिल किया गया. इसके बाद ऑल इंडिया गोरखा लीग ने भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को अलग गोरखालैंड राज्य को लेकर ज्ञापन सौंपा.
1980 का दशक आया. तब सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के बैनर तहत गोरखालैंड आंदोलन शुरू हुआ. कहा जाता है कि यह आंदोलन काफी उग्र था. लंबे संघर्ष और हिंसक प्रदर्शनों के बाद सन 1988 में केंद्र, पश्चिम बंगाल सरकार और गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ, जिसके तहत दार्जिलिंग में दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद का गठन किया गया.
सन 2007 में गोरखा जन मुक्ति मोर्चा के नेता विमल गुरुंग गोरखालैंड के आंदोलन में कूद पड़े. उसी समय गोरख जन मुक्ति मोर्चा का उदय हुआ. विमल गुरुंग के नेतृत्व में गोरखालैंड को लेकर लंबा आंदोलन चला था. 2011 में पश्चिम बंगाल की तत्कालीन सरकार के साथ एक समझौता हुआ, जिसके बाद दार्जिलिंग में जीटीए का गठन हुआ. हालांकि गोरखालैंड को लेकर आंदोलन लगातार चलता रहा है.
पहाड़ में लगभग सभी राजनीतिक दलों का जन्म गोरखालैंड की बुनियाद पर हुआ है. पहाड़ में आप किसी भी गोरखा नेता से पूछिए तो उनका एक ही जवाब होगा, गोरखालैंड राज्य होना चाहिए. गोरखालैंड राज्य होगा या नहीं होगा और होगा तो कब होगा, इस बारे में ना तो राज्य सरकार और ना ही केंद्र सरकार की ओर से कोई पहल की गई है. विधानसभा चुनाव के दौरान भी भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं ने गोरखालैंड के स्थान पर गोरखाओं के हित में स्थाई राजनीतिक समाधान की बात कही थी और भाजपा ने इसे अपने संकल्प पत्र में तरजीह भी दी थी.
राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद भाजपा ने अपने संकल्प पत्र को पूरा करने की दिशा में पहल शुरू कर दी है. केंद्र सरकार ने मध्यस्थ वार्ताकार की नियुक्ति कर दी है. बृहस्पतिवार को दार्जिलिंग में हुई एक बैठक में केंद्रीय गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव, बंगाल सरकार के गृह सचिव और केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त वार्ताकार पंकज कुमार सिंह शामिल हुए. गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष विमल गुरुंग और उनके कई सहयोगी भी इस बैठक में शामिल हुए थे.
इस बैठक में गोरखा जन मुक्ति मोर्चा प्रतिनिधि मंडल ने तराई और Dooars से जुड़े विभिन्न मुद्दों के साथ 396 मौजा, 11 जाति को जनजाति का दर्जा देने तथा सीमा से संबंधित संवैधानिक समाधान के मुद्दे को सरकार के समक्ष रखा था. दरअसल इन क्षेत्रों के लोग सिर्फ यह नहीं चाहते हैं कि उनकी क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान हो बल्कि इसके साथ-साथ उनकी सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक पहचान भी उजागर होनी चाहिए. इन दोनों पहलुओं को ध्यान में रखकर ही स्थाई राजनीतिक समाधान ढूंढा जाना चाहिए. केंद्र सरकार के अधिकारियों ने इस पर गंभीरता पूर्वक विचार भी किया है.
भविष्य में भी इस तरह की बैठक होती रहेगी. क्योंकि यह एक सतही मुद्दा नहीं है. बल्कि गोरखा की पहचान, सामाजिकता, संविधान और गोरखा भविष्य से जुड़ा हुआ है. ऐसे में स्थाई राजनीतिक समाधान का मुद्दा एक-दो दिन में हल होने वाला नहीं है. इसमें काफी समय लगेगा. इन क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति, सामाजिक परिवेश, समग्र विकास और क्षेत्रीय मुद्दों को जांच परखे और समझे बगैर किसी भी तरह से स्थाई राजनीतिक समाधान नहीं हो सकता.
अगर जल्दबाजी में फैसला लिया जाता है तो वह टिकाऊ नहीं होगा. पहाड़ में गोरखा भी यही चाहते हैं. उन्हें लगता है कि अगर गोरखालैंड मिल गया तो उनका सपना जल्दी साकार हो जाएगा. लेकिन यह एक संवैधानिक मसला है. केंद्र सरकार संविधान के अंतर्गत ही यह मसला उठा सकती है. इसके लिए कई तरह की प्रक्रिया अपनाई जाती है. पात्रता तथा अन्य जरूरी योग्यताएं व इंफ्रास्ट्रक्चर साबित करनी पड़ती है.
कुल मिलाकर वर्तमान स्थितियों में अलग राज्य गोरखालैंड तो आसान नहीं है. पर केंद्र सरकार की जो योजना है, अगर वह साकार हो जाती है, तो इसमें जरा भी संदेह नहीं है कि पहाड़ के गोरखाओं की स्थिति बदल जाएगी. वर्तमान स्थितियों में गोरखालैंड से ज्यादा जरूरी स्थाई राजनीतिक समाधान है और यह व्यावहारिक भी है. अगर यह जमीन पर उतरता है तो गोरखालैंड का एहसास तो प्राप्त किया ही जा सकता है.
