पश्चिम बंगाल सरकार ने जिस तरह का कदम उठाया है व जिस तरह का अपना लक्ष्य तय किया है, अगर उस तरह से काम होता है तो आने वाले समय में दार्जिलिंग, कर्सियांग, कालिमपोंग समेत अन्य पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ, भूस्खलन, भूकंप आदि से होने वाले जान माल के नुकसान को न केवल कम किया जा सकता है, बल्कि इन पहाड़ी इलाकों का सौंदर्यीकरण, मजबूत संवेदनशील सुरक्षा और शहर विस्तार को एक नई गति मिलने वाली है.
दार्जिलिंग, कर्सियांग, कालिमपोंग से लेकर उत्तर बंगाल के हिमालय से सटे पर्वतीय क्षेत्रों के शहरों तथा कस्बों की सुरक्षा तथा प्राकृतिक आपदाओं में निबटने और कम से कम जोखिम के प्रभाव को बढ़ाने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार के उठाए कदमों स्वागत किया जा रहा है का एक बड़ा कदम उठाया है. पश्चिम बंगाल भाजपा के डिप्टी प्रदेश अध्यक्ष राजू बिष्ट ने मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी को पहाड़ में भूस्खलन, बाढ़ तथा जान माल की हानि की संभावना को न्यूनतम करने के दृष्टिकोण से जो मार्ग सुझाया था, वह मुख्यमंत्री को पसंद आ गया है.
मुख्यमंत्री के निर्देश पर पश्चिम बंगाल सरकार ने दार्जिलिंग तथा अन्य पर्वतीय शहरों में जान माल की हिफाजत और प्राकृतिक जोखिम को कम करने के इरादे से एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है. बरसात में पहाड़ी इलाकों में बाढ़, भूस्खलन समेत अन्य तरह की प्राकृतिक आपदाएं एक अवश्यंभावी घटना बन जाती है. पहाड़ के लोग हमेशा इसके शिकार होते रहे हैं. समस्या के स्थाई समाधान को ध्यान में रखकर राजू बिष्ट ने राज्य सरकार को एक पत्र लिखा और राज्य सरकार को वह इतना पसंद आ गया कि मुख्यमंत्री ने विशेषज्ञ समिति का गठन कर डाला है.
हिमालय से सटे पर्वतीय इलाकों की संवेदनशीलता किसी से छिपी नहीं है. विशेषज्ञ पहले ही दार्जिलिंग और कालिमपोंग को लेकर अपनी चिंता व्यक्त कर चुके हैं. विशेषज्ञ समिति इसका संपूर्ण अध्ययन करेगी और समस्या के स्थाई समाधान का मार्ग प्रशस्त करेगी. विशेषज्ञ समिति की सफलता की उम्मीद इस बात से की जा सकती है कि समिति में पर्वतीय क्षेत्रों के विशेषज्ञ और वैज्ञानिक शामिल होंगे.
मिल रही जानकारी के अनुसार पद्मश्री सम्मानित डॉक्टर एकलव्य शर्मा को समिति का अध्यक्ष बनाया गया है. समिति में दार्जिलिंग और कालिमपोंग के जिला अधिकारी, राज्य आपदा प्रबंधन विभाग, भारतीय भू वैज्ञानिक सर्वेक्षण, शहरी विकास, नगर पालिका मामलों के विभाग, पर्यावरण, वन तथा सिंचाई विभाग, जल मार्ग विभाग आदि के प्रतिनिधि, रिसर्च संस्थानों के विशेषज्ञ तथा अनुभवी लोग शामिल होंगे.
राजू बिष्ट ने अपने पत्र में ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड, भारी बारिश, बादल फटने, भूस्खलन के साथ ही पहाड़ में पुरानी ड्रेनेज व्यवस्था इत्यादि समस्याओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया था. उनका विचार था कि अगर इन समस्याओं पर विशेषज्ञों की सलाह ली जाए तो पहाड़ को न केवल बचाया जा सकता है, बल्कि उसका विस्तार और सौंदर्यीकरण में भी मदद मिलेगी. जिस विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया है, उसमें शामिल विशेषज्ञ इस तरह का सिस्टम विकसित करेंगे ताकि प्राकृतिक आपदा से पहले ही जान माल की सुरक्षा बेहतर ढंग से हो सके.
उदाहरण के लिए ग्लेशियर पिघलने और अचानक बाढ़ आने की स्थिति में लोगों को पहले से सजग कर लेने से जान माल के नुकसान को कम से कम किया जा सकता है. अगर सरकार की यह योजना प्रभावी होती है तो पहाड़ी शहरों के विकास और विस्तार को एक नया आयाम मिलेगा. क्योंकि मजबूत बुनियाद पर तैयार की गई इमारत के जमींदोज होने का खतरा कम रहता है. विशेषज्ञ समिति को भविष्य की रूपरेखा तय करने के साथ ही इन पहाड़ी इलाकों की भौगोलिक स्थिति का सूक्ष्म अध्ययन करना जरूरी होगा.
पहाड़ में बाबा आदम के जमाने की जल निकासी और सीवरेज व्यवस्था है. लेकिन तब से अब तक बहुत बदलाव हुए हैं. शहरों का लुक बदला है. आबादी बढ़ने से शहरों का विस्तार हुआ है. लेकिन आज भी ड्रेनेज और सीवरेज की व्यवस्था पुरानी है, जिसको बदलते समय और आवश्यकता को ध्यान में रखकर मॉडिफाई करने की जरूरत है. विशेषज्ञ समिति इसका भी पता लगाएगी और यह देखेगी कि इसमें और क्या बदलाव किया जा सकता है.
सबसे बड़ी बात तो यह है कि जिस तरह से यहां बारिश का पैटर्न बदलता है, उसको ध्यान में रखते हुए ही यहां तकनीकी व्यवस्था को मजबूत करना होगा. ये कुछ बुनियादी बातें हैं जिन्हें समिति को ध्यान में रखकर भविष्य की योजनाओं को गति देनी होगी. उम्मीद की जा रही है कि अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो पहाड़ी इलाकों में आपदा प्रबंधन और शहरी योजना विस्तार को एक नई और ठोस गति मिलेगी.

