कटिहार डीआरएम के उठाए गए कदम, दुकानदारों में दहशत, रेलवे प्रशासन की कार्रवाई, पीड़ितों के बयान तथा मंत्री शंकर घोष की सफाई इत्यादि संकेत बताते हैं कि सिलीगुड़ी का रेल गेट अब उस स्थिति में आ गया है, जहां उसके वजूद को बनाए रखना कठिन साबित हो रहा है. आधिकारिक स्तर पर बैठक चल रही है.
रेल गेट के आसपास के दुकानदारों को कम से कम क्षति हो सके तथा रेल प्रोजेक्ट का काम भी निर्विघ्न संपन्न हो सके, ऐसे वैकल्पिक मार्ग की तलाश के लिए शीघ्र ही मंत्री शंकर घोष, डीआरएम व जिला शासक आदि की प्रशासनिक स्तर की बैठक होने वाली है. कोई आश्चर्य नहीं होगा, जब किसी दिन सिलीगुड़ी की सुर्खियां बने सिलीगुड़ी का बहुचर्चित रेल गेट इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगा!
इन दिनों सिलीगुड़ी का रेल गेट सुर्खियों में है. तीन-चार दिन पहले यह खबर सामने आई थी कि सिलीगुड़ी का बहुचर्चित रेल गेट बंद होने जा रहा है. इस खबर को सुनकर अनेक लोग हतप्रभ रह गए. खासकर ऐसे लोग, जिनकी पुरानी यादें इस रेल गेट से जुड़ी हैं.
रेल गेट के आसपास कई दशकों से दुकानदारी कर रहे दुकानदार संकट में हैं. इन दुकानदारों का संकट रेलवे के ultimatum तथा भेजे गए नोटिस से तो बढ़ा ही है, रेलवे प्रशासन उन्हें अब किसी तरह से और झेलने की स्थिति में नहीं है. साफ संदेश दे दिया गया है कि उन्हें हर हालत में रेलवे की जमीन खाली करनी होगी. इस बार रेलवे प्रशासन सीधा दो दो हाथ करने के लिए तैयार है. दुकानदारों को किसी तरह की मोहलत नहीं मिलने वाली है. अब उन्हें एकमात्र मंत्री डॉक्टर शंकर घोष तथा कोर्ट पर भरोसा है.
लेकिन डॉक्टर शंकर घोष के बयान से पता चलता है कि वह भी व्यापारियों और दुकानदारों के लिए कुछ विशेष करने की स्थिति में नहीं है. वे नहीं चाहते हैं कि रेलवे प्रोजेक्ट का काम अधर में लटके. वह स्थानीय विपक्षी नेताओं पर बरसते हुए दुकानदारों को सचेत करना चाहते हैं कि वह उनके किसी भी बहकावे में न आएं.
वह यह भी नहीं चाहते हैं कि यहां के दुकानदार और व्यापारियों को ज्यादा नुकसान हो सके. इसलिए वह विकल्प की बात कर रहे हैं. एक ऐसा विकल्प जहां व्यापारी को कम से कम नुकसान हो और रेलवे का काम भी नहीं रुके. इस संबंध में उन्होंने व्यापारियों के साथ भी अलग-अलग बैठक की है और उनके सुझावों को ऊपर तक पहुंचाने का आश्वासन दिया है.
समय-समय पर रेलवे की भूमि पर कब्जा करके बैठे लोगों से उनके मकान और दुकान छीनने की रेलवे की कार्रवाई कोई नई नहीं है. सिलीगुड़ी जंक्शन से लेकर सिलीगुड़ी टाउन रेलवे स्टेशन तक आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं, जहां एक तरफ दुकानदार तो दूसरी तरफ रेलवे प्रशासन तनकर खड़े हो जाते हैं. बृहस्पतिवार को सिलीगुड़ी जंक्शन तथा रेल गेट के नजदीक बसे लगभग 200 दुकानदारों को मिले ताजा नोटिस के बाद उन्होंने अपनी दुकान बंद करके रेलवे प्रशासन के फरमान का विरोध जताया.
सिलीगुड़ी में रेलवे की जमीन में बसे दुकानदार और मकान मालिक इन दिनों बड़ी मुसीबत में हैं. जब राज्य में वाम मोर्चा तथा तृणमूल कांग्रेस की सरकार थी, तब भी रेलवे के द्वारा जगह खाली करने का अभियान चलाया जाता रहा था. तब ऐसे दुकानदारों और मकान मालिकों को कहीं ना कहीं सरकार का समर्थन प्राप्त था. इसलिए उन्हें विश्वास रहता था कि ज्यादा से ज्यादा रेलवे उनका आंशिक नुकसान कर सकता है. लेकिन दुकान या मकान से उन्हें हटा नहीं सकता है.
इस बार यह स्थिति नहीं है. राज्य में भाजपा की सरकार है. केंद्र में भी भाजपा गठबंधन वाली सरकार है. रेलवे के द्वारा की जा रही कार्रवाई का विरोध कर रहे दुकानदारों को सरकार का समर्थन प्राप्त नहीं है. इसलिए वह घबराए हुए हैं. उनका हमेशा की तरह एक ही कथन है कि 50 सालों से वे रेलवे की जमीन पर दुकान लगा रहे हैं. उनकी रोजी-रोटी दुकान से चलती है. अगर उनकी दुकान को बंद किया जाता है तो फिर वे कहां जाएंगे. पहले उन्हें पुनर्वास चाहिए फिर दुकान खाली करेेंगे.
सवाल यह है कि क्या उनकी फरियाद सुन ली जाएगी? ऐसा लगता नहीं है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि भारतीय रेलवे ने सिलीगुड़ी जंक्शन, सिलीगुड़ी टाउन स्टेशन समेत एनजेपी को विश्व स्तरीय स्टेशन बनाने का फैसला किया है. इस महत्वाकांक्षी योजना को अमली जामा पहनाने के लिए रेलवे को पर्याप्त जमीन चाहिए. पर स्थिति तो यह है कि वाम मोर्चा के शासनकाल में रेलवे की जमीन पर बसे दुकानदार या मकान मालिक 50 साल पहले जहां थे, आज भी वहीं पर पहले से काफी अधिक मजबूत स्थिति में हैं.
रेलवे के द्वारा ऐसे दुकानदारों को हमेशा ही नोटिस दिया जाता रहा है. दुकानदारों अथवा मकान मालिकों के द्वारा हमेशा एक ही बात कही जाती है कि उन्होंने रेलवे की जमीन पर अनधिकृत कब्जा जरूर किया है पर उस समय रेलवे क्या कर रहा था? जब उन्होंने रेलवे की जमीन पर अपना बसेरा खड़ा किया? अब उन्होंने दुकान जमा ली है, तो रेलवे उनसे दुकान खाली करने के लिए कह रहा है!
महावीर स्थान के निकट रेल गेट अंग्रेजों के जमाने का है. इस रेल गेट से सिलीगुड़ी के हजारों लोगों की यादें जुड़ी है. रेल गेट के आजू-बाजू में रेलवे की जमीन पर सैकड़ो छोटी बड़ी दुकान देख सकते हैं. जिस तरह से रेलवे की योजना है, अगर उसका निर्धारित स्वरूप में विस्तार किया जाता है, तो इस स्थिति में रेल गेट के आसपास की सारी दुकानों को वहां से हटाना होगा.
यह कुछ इस तरह से होगा जैसे वर्धमान रोड फ्लाईओवर निर्माण के क्रम में झंकार मोड़ के पुराने बाजार को वहां से हटाकर विवेकानंद रोड पर स्थानांतरित कर दिया गया. रेलवे विस्तार के क्रम में रेल गेट को भी हमेशा के लिए बंद किया जा सकता है. हालांकि उससे पहले रेलवे की जिला शासक के साथ बैठक होने वाली है. इस बैठक में विकल्प तलाश किया जाएगा. दुकानदारों को मुआवजा या पुनर्वास की भी बात हो सकती है.
जो भी हो, ऐसा लगता है कि झंकार मोड बाजार की तरह ही सिलीगुड़ी का रेल गेट और यहां का सैकड़ो साल पुराना मार्केट इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगा!

