क्या आपने कभी गौर किया है कि सिलीगुड़ी के सरकारी अस्पतालों में गंभीर स्थिति में लाए गए अधिकतर रोगियों की मौत हो जाती है. कई बार निजी अस्पतालों पर भी चिकित्सा में लापरवाही के आरोप लगते हैं. कल ही सिलीगुड़ी के सेवक रोड के एक चर्चित अस्पताल में एक रोगी की मौत हो गई. इलाज में लापरवाही का आरोप लगा. और इसे लेकर भारी हंगामा भी हुआ.
सिलीगुड़ी का एक सबसे चर्चित सरकारी अस्पताल है, जहां सिलीगुड़ी, पहाड़ और आसपास के क्षेत्रों से मरीज इलाज के लिए आते हैं. यह सिलीगुड़ी का सबसे बड़ा अस्पताल है, जहां गंभीर मामलों के रोगियों को भी लाया जाता है. यहां तक कि इस अस्पताल में मालदा, उत्तर दिनाजपुर आदि जिलों के रोगी इलाज के लिए भेजे जाते हैं. लेकिन क्या आपको पता है कि इस बड़े अस्पताल में चिकित्सा अधिकतर मेडिकल छात्रों के द्वारा की जाती है.
क्योंकि चर्चा है कि अस्पताल में योग्य चिकित्सक अक्सर छुट्टी पर रहते हैं या फिर हफ्ते में तीन-चार दिन बाहर ही रहते हैं. कुछ लोगों का आरोप तो यह भी है कि चिकित्सक अस्पताल में उपस्थिति दर्शाकर और राउंड लगाकर चले जाते हैं. कुछ रोगियों को आवश्यकता पड़ने पर देख तो लेते हैं, दवाइयां भी लिख देते हैं और फिर उनका दर्शन ही नहीं होता है. ऐसे में यह अस्पताल मेडिकल स्टूडेंट चिकित्सकों के भरोसे ही चलता है.
सिलीगुड़ी के कुछ निजी अस्पतालों में भी ऐसे डॉक्टरों को देख सकते हैं जो क्वालिफाइड भी है और उनके पास बड़ी-बड़ी डिग्रियां भी है. लेकिन अनुभव नहीं है. जटिल मामलों में जैसे ऑपरेशन आदि के मामलों में केवल डिग्रियां काफी नहीं होती है. बल्कि डॉक्टर का तजुर्बा काफी महत्वपूर्ण होता है. अक्सर देखा जाता है कि बड़ी-बड़ी डिग्रियों वाले डॉक्टर से चूक हो जाती है.
कई बार तो कुछ निजी अस्पतालों में कंपाउंडर या नर्स ही डॉक्टर बनकर रोगी की देखभाल करने लगते हैं. ऐसे में रोगी के इलाज में लापरवाही की भारी गुंजाइश रहती है. कुछ समय पहले यह भी सुना गया था कि एक अस्पताल में नर्स ने गलती से रोगी को बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया, जिसके बाद रोगी उठा ही नहीं.
रोगियों की शिकायत है कि जब वे सरकारी बड़े अस्पताल में ट्रीटमेंट के लिए ओपीडी में जाते हैं या इमरजेंसी सेवा के लिए रोगियों को यहां लाया जाता है, तो डॉक्टर से मुलाकात होना एक बड़ी बात होती है. चाहे ओपीडी हो या इमरजेंसी, रोगी का सामना अक्सर स्टूडेंट चिकित्सक से ही होता है. जिसे intern चिकित्सक कहते हैं. ये मेडिकल पढ़ाई करने वाले छात्र होते हैं जो सीनियर डॉक्टर की निगरानी में मरीज की देखरेख करते हैं और अनुभव प्राप्त करते हैं.
लेकिन जब सीनियर डॉक्टर ही उनके साथ नहीं होते तो ऐसे में उनके द्वारा रोगियों की चिकित्सा किस तरह से होती होगी, यह आसानी से समझा जा सकता है. जानकार और भुक्तभोगी लोगों के अनुसार यही कारण है कि सरकारी अस्पतालों में मरीज के इलाज में लापरवाही और मरीज की मौत की घटनाएं अक्सर घटती रहती हैं. अगर चिकित्सक अपनी पूरी ड्यूटी करें तो अस्पताल में रोगियों का अच्छा ट्रीटमेंट होता!
दरअसल intern चिकित्सक तो पढ़ाई करने वाले छात्र होते हैं. जब वे मरीज को देखते हैं तो उस समय सीनियर डॉक्टर का मौजूद रहना जरूरी होता है, जिनके निर्देश पर ही छात्रों को मरीज की चिकित्सा करनी होती है. काफी समय से अस्पताल में यही सब चल रहा है. लोग बताते हैं कि कई बार यहां योग्य चिकित्सकों की मौजूदगी की मांग को लेकर धरना प्रदर्शन किया गया. लेकिन बात नहीं बनी. इस अस्पताल में ज्यादातर कोलकाता के डॉक्टरों की नियुक्ति की गई है. आरोप है कि जब ये डॉक्टर वापस कोलकाता जाते हैं तो, कभी भी समय पर नहीं लौटते हैं.
ऐसे में अस्पताल के सभी विभागों की सेवाएं मेडिकल छात्रों तथा intern चिकित्सक के भरोसे चलती है. कई बार इन छात्रों को 18 से 20 घंटे तक की ड्यूटी करनी पड़ती है. ऐसे में उनकी पढ़ाई और प्रशिक्षण पर भारी असर पड़ता है. भरपूर नींद की कमी और थकान के चलते ऐसे छात्रों की जीवन शैली भी प्रभावित होती है.intern चिकित्सकों के एक वर्ग ने आरोप लगाया है कि उनसे लगातार 12 से 16 घंटे तक ड्यूटी कराई जा रही है.
इन intern चिकित्सकों से सर्जरी, ENT,ऑर्थोपेडिक, नेत्र रोग, ऑपरेशन थिएटर सभी जगह सेवाएं ली जाती है. उनके लिए समय निर्धारित होता है.लेकिन चिकित्सकों की कमी या उनके छुट्टी पर रहने के कारण ही उनकी जगह उन्हें काम करना पड़ता है. यहां तक कि मरीज के ऑपरेशन में भी उनकी सेवा ली जाती है. कई बार ऑपरेशन के समय वरिष्ठ चिकित्सक intern चिकित्सक को समझा कर चले जाते हैं या फिर मरीज के ऑपरेशन पर ज्यादा ध्यान नहीं देते.
ऐसी स्थिति में intern चिकित्सक ही मरीज का ऑपरेशन संचालन करते हैं. आप समझ सकते हैं कि एक सीखने वाला छात्र ऑपरेशन प्रक्रिया को किस तरह अंजाम देता होगा. जाहिर है कि इसमें चूक होगी ही. ऐसी स्थिति में डॉक्टर का तो कुछ नहीं जाता. लेकिन अगर रोगी की मौत हो जाती है तो उसके परिवार पर क्या बीतता होगा. सिलीगुड़ी के सरकारी और गैर सरकारी कई अस्पतालों और नर्सिंग होम पर मरीज की चिकित्सा में लापरवाही के आरोप लगते रहे हैं.
चाहे उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज अस्पताल हो या सिलीगुड़ी जिला अस्पताल या फिर सिलीगुड़ी के नर्सिंग होम या निजी अस्पताल हो, जहां योग्य चिकित्सकों के अभाव में सहायक चिकित्सकों तथा नर्सों के भरोसे ट्रीटमेंट का कार्य संचालन हो, वहां चूक होना तो स्वभाविक ही है. अभी कल ही सिलीगुड़ी के एक चर्चित निजी अस्पताल में एक मरीज की गलत चिकित्सा के कारण लापरवाही से उसकी मौत को लेकर काफी हंगामा हुआ था. इससे पहले सिलीगुड़ी जिला अस्पताल और उत्तरबंग मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भी ऐसी घटनाएं घट चुकी है.
सिलीगुड़ी के लोग सरकार और स्वास्थ्य प्रशासन से अपेक्षा रख रहे हैं कि सरकार बदली है तो व्यवस्था भी बदलनी चाहिए.अब तक जो चल रहा था, उसे नहीं चलना चाहिए. चाहे निजी अस्पताल हो या सरकारी अस्पताल ,मरीज की चिकित्सा में लापरवाही नहीं हो, इसके लिए सरकार के स्वास्थ्य विभाग के द्वारा एक मजबूत गाइडलाइंस जारी किया जाना चाहिए और सभी सरकारी तथा गैर सरकारी अस्पतालों को उनका पालन के लिए मजबूर किया जाना चाहिए.
